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मां मदालसा की दिव्य जीवन की साधना

मां मदालसा की दिव्य जीवन की साधना

डॉ राकेश कुमार आर्य
मार्कंडेय पुराण में वर्णित माता मदालसा और राजा ऋतुध्वज के पुत्रों का संन्यास ग्रहण करने का वृत्तांत आता है। माता मदालसा ने अपने दिव्य जीवन की साधना को अपने बच्चों के जीवन में उतारने का सफल और सार्थक प्रयास किया। उन्होंने यह दिखाया कि यदि माता विदुषी है, संस्कारवान है तो निश्चय ही वह दिव्य संतति का निर्माण करने में सक्षम हो सकती है। उनका आदर्श जीवन भारतीय सनातन संस्कृति में ज्ञान ,वैराग्य और मातृत्व की पराकाष्ठा का सबसे दिव्य और उत्तम उदाहरण है। विशेष रूप से आज की उन माताओं के लिए उनका जीवन बहुत ही अनुकरणीय और आदर्श है जो अपने बच्चों को टी.वी. संस्कृति के माध्यम से बिगाड़ने का काम कर रही हैं और जो बच्चों से अपना पल्ला झाड़ने के लिए थोड़ी-थोड़ी देर में उन्हें टीवी कार्टूनों में व्यस्त कर देती हैं या झूठे खिलौने देकर उनका मन बहला कर अपने लिए मोबाइल पर व्यस्त रहने के लिए समय निकालने का काम करती हैं। जिनका स्वयं का भौतिक दृष्टिकोण उनके बच्चों पर हावी प्रभावी होता जा रहा है और जिसके चलते उनके बच्चे संसार के लिए बोझ बनकर रह गए हैं।
माताएं अपने बच्चों को सांसारिक सुख ,ऐश्वर्य, राजपाट की ओर धकेलने का काम करती हैं। परंतु भारतीय वैदिक परंपरा में ऐसी अनेक माता के दर्शन होते हैं जिन्होंने अपने बच्चों को विवेक और वैराग्य का मार्ग सुझाया। क्योंकि वह जानती थीं कि विवेक और वैराग्य के माध्यम से ही संसार की सद्गति को संभाला जा सकता है।
ब्रह्मवादिनी माता मदालसा ने अपने बच्चों को पालने में ही मानवता का पाठ पढ़ाना आरंभ कर दिया था। आजकल हम बच्चों को लोरियां ( ज्ञानोपदेश ) सुनाने का काम करते हैं। लोरी शब्द के बारे में हमने सोचा है कि यह शब्द हमारे लिए पश्चिमी जगत की देन है। जबकि ऐसा नहीं है, हमारी माताएं प्राचीन काल से लोरियां सुनाकर बच्चों को आगे बढ़ने की प्रेरणा दिया करती थीं। यह ध्यान रखना चाहिए कि पश्चिम के लोगों ने हमारी परंपराओं का अनुकरण किया है। दुर्भाग्य की बात है कि आज उनकी जूठन को खाकर हमें आनंद की अनुभूति होती है। लोरी सुनाकर बच्चों को दिव्य जीवन की साधना के लिए प्रेरित करने का चिंतन शुद्ध भारतीय चिंतन है। माता मदालसा ने अपने बच्चों को ऐसी लोरियां सुनाईं कि उनका जीवन ही बदल गया। समय आने पर उन्होंने राजपाट त्याग दिया और संन्यास ग्रहण कर आत्म कल्याण के लिए वनों की ओर चले गए।

मुमुक्षु बन वन को गए राजपाट दिया त्याग।
कल्याण मार्ग को चुन लिया मिट गई भौतिक आग।।

कौन थीं माता मदालसा ?

मदालसा गंधर्वराज विश्वावसु की पुत्री थीं। बचपन से ही उनका जीवन आध्यात्मिकता से रंगा हुआ था। उनके भीतर वैराग्य के भाव स्थान प्राप्त कर चुके थे। इसलिए संसार में वह असंग भाव से रहने लगी थीं। असंग भाव से रहना दिव्यता को प्राप्त करना होता है। दिव्यता की साधना में लीन हो जाना होता है। ऐसी ब्रह्मवादिनी माता मदालसा का विवाह राजा शत्रुजित के प्रतापी पुत्र राजकुमार ऋतुध्वज के साथ हुआ था। प्रतापी राजकुमार ऋतुध्वज के साथ विवाह हो जाने के उपरांत भी रानी के ऊपर राजसिक वृत्तियों का रंग नहीं चढ़ा। वह अपनी सात्विक वृत्ति में पूर्ववत जीवन यापन करती रहीं। क्योंकि वह जानती थीं कि संसार का भौतिक ऐश्वर्य आत्मिक ऐश्वर्य के समक्ष कुछ भी नहीं है। वह स्वाभाविक रूप से ब्रह्मवादिनी, योगिनी और तत्वज्ञानी थीं।
उनका स्वयं से स्वयं ही संवाद चलता रहता था। इसलिए वह आत्म तत्व की खोज में लगी रहती थीं। तत्व दर्शन उनके जीवन का अनिवार्य अंग बन चुका था। यही कारण था कि उन पर संसार के राजभवनों का कोई प्रभाव नहीं हुआ। असार में उनको सार नहीं दिखता था। क्योंकि वह सारतत्व को समझ चुकी थीं।


राजा ऋतुध्वज का दृष्टिकोण बनाम मदालसा का दर्शन


जब मदालसा और ऋतुध्वज का गृहस्थ जीवन आरंभ हुआ तो परमात्मा की कृपा से उनको कई संतानें प्राप्त हुईं। राजा का दृष्टिकोण भौतिक था। उनकी इच्छा थी कि उनके पुत्र पौत्रादिक उनके राज्य का विस्तार करने वाले हों। दिग्दिगंत तक उनके यश और कीर्ति का विस्तार हो। उनके पुत्र ऐसे हों जिनके समक्ष संसार की बड़ी से बड़ी शक्तियां झुक जाएं। यही कारण था कि राजा अपने पुत्रों को महान राजा बनाना चाहते थे। जबकि ब्रह्मवादिनी माता मदालसा अपने पति से यहां असहमत थीं। मदालसा चाहती थीं कि उनकी संतानें जन्म-मरण के इस चक्र (माया) से मुक्त होकर अपने वास्तविक स्वरूप ‘आत्मज्ञान’ को पहचानें। वह स्वयं तत्वदर्शी थीं। इसलिए संतान के बारे में उनकी सोच थी कि उनकी संतान भी तत्वदर्शी हो।

तत्व दर्शन-आत्मदर्शन की
खोज निरंतर चलती हो।
माता का मंतव्य यही था
संतान इसी पर चलती हो।।

राजा अपने पुत्रों का वीरता सूचक नाम रखते थे। जबकि रानी को राजा के इस प्रकार के मोह को देखकर भीतर ही भीतर हंसी आती थी। शालीनता और मर्यादा का पालन करते हुए वह अपने पति से कुछ नहीं कहती थीं। यद्यपि वह जानती थीं कि राजा भौतिक सुखों की खोज में मिट्टी के शरीर को सुंदर-सुंदर नामों की पहचान देकर अपने मिथ्या ज्ञान का परिचय दे रहे हैं।

पालने से ही वैराग्य की दीक्षा: मदालसा उपदेश (लोरी)


मदालसा के बच्चों के संन्यास लेने का सबसे मुख्य कारण था—बाल्यकाल के संस्कार। माता मदालसा भली प्रकार जानती थीं कि संतान का पालन पोषण किस प्रकार किया जाता है ? मदालसा ने अपने बच्चों को ज्ञान देने के लिए उनकी उसे अवस्था का चयन किया जब उनका अंतःकरण (मन) सर्वथा कोरा था। अपने रोते हुए शिशुओं को शांत करने के लिए वह आज की माता की भांति उन्हें जीवन नाशक मोबाइल नहीं पकड़ाती थीं। न ही उन्हें टीवी के सामने बैठ कर कार्टून देखने की प्रेरणा दिया करती थीं और न ही उन्हें किसी प्रकार का झूठा खिलौना देकर उनके बाल मनोविज्ञान के साथ किसी प्रकार का खिलवाड़ किया करती थीं। जिस समय बच्चों के मन मस्तिष्क में अनेक प्रकार की कल्पनाओं का सृजन होता है और वह अनेक प्रकार के जिज्ञासा भरे प्रश्न उठाकर अपने ज्ञान का विस्तार करने की चेष्टा कर रहा होता है, उस समय उसके बालमन को मोबाइल के माध्यम से या टीवी की अश्लीलता के माध्यम से या कार्टूनों के माध्यम से भ्रमित करना उसके साथ सबसे बड़ा अन्याय करना होता है। इस सच्चाई को समझकर माता मदालसा अपने बच्चों को संस्कृत के श्लोक सुनाती थीं जो उनके स्वयं के रचे हुए होते थे।
वह कहती थीं :-

शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरंजनोऽसि, संसारमाया परिवर्जितोऽसि।
संसारस्वप्नं त्यज मोहनिद्रां, मदालसावाक्यमुवाच पुत्रम्॥


इस अमृतमयी लोरी का अर्थ है:-
"हे पुत्र! तुम स्वरूप से सर्वथा शुद्ध हो, तुम साक्षात चैतन्य रूप (बुद्ध) हो, तुम दोषरहित और निरंजन हो। इस संसार की माया से तुम्हारा कोई वास्तविक संबंध नहीं है। तुम इस संसार रूपी स्वप्न को त्याग दो और इस मोह रूपी गहरी नींद से जाग जाओ।"
वे बच्चे को सुलाने का नहीं बल्कि जगाने का प्रबंध करती थीं अर्थात उसके चित्त पर पड़े विकारों को हटाकर उसे निर्मल बनाने का प्रयास करती थीं। बालमन निर्मल हो जाए और निर्मल जीवन धारा के मार्ग पर चल पड़े, यही बच्चों को जागृत करना होता है। सजग, सचेत और जागरूक करना होता है। इस दिशा में माताएं विशेष काम करती थीं। माता मदालसा भी अपने बच्चों के साथ ऐसा ही कर रही थीं। वह बच्चों की चेतना को नया स्वरूप देने का काम कर रही थीं।
बच्चों को दुग्धपान कराते समय वह कहती थीं कि:-
" यह भौतिक शरीर अन्न और जल से बना एक नाशवान आवरण है, तुम यह शरीर नहीं बल्कि अजर-अमर आत्मा हो। संसार के रिश्ते-नाते (माता, पिता, पुत्र, स्त्री) पंचभूतों के संयोग मात्र हैं, जो समय आने पर बिखर जाएंगे। इसलिए संसार के भौतिक रिश्तों में अपने आप को उलझाना मूर्खता है। इनसे पार निकलने की आवश्यकता है। जो इनसे पराजित हो गया, इनमें बंध गया, वह भंवरजाल में फंस जाता है और जो इनकी निसारता को समझ जाता है, वह भवसागर के पार चला जाता है।

तीनों बड़े पुत्रों का संन्यास गमन

माता मदालसा के गर्भ से एक-एक करके तीन पुत्रों ने जन्म लिया: - दिन में सबसे बड़े का नाम था -विक्रांत (जिसका अर्थ है महापराक्रमी) दूसरे पुत्र का नाम था -सुबाहु (सुंदर और शक्तिशाली भुजाओं वाला) जबकि तीसरे पुत्र का नाम था - शत्रुमर्दन (शत्रुओं का नाश करने वाला)।
राजा ऋतुध्वज ने अपने तीनों पुत्रों को जिस भावना के साथ पालने का प्रयास किया था,उनकी वह भावना फलीभूत होती हुई दिखाई नहीं दे रही थी। क्योंकि बच्चों की प्रथम शिक्षिका उनकी मां होती है और मां के दिए गए संस्कार बच्चों पर स्पष्ट दिखाई देने लगे थे। उनकी राजपाट में तनिक भी रुचि नहीं थी। मां के संस्कारों का ही प्रभाव था कि बच्चों पर संसार के संबंधों के बारे में सोचने तक का भी समय नहीं था। संसार के प्रति उनकी तनिक भी रुचि नहीं थी। उनके लिए सारे राजकीय आकर्षण नि:सार थे। उन्हें राजकीय सुख, राजभवन, दास दासी, धन संपदा, हीरे, मोती मणि माणिक्य तनिक भी आकर्षित नहीं कर रहे थे। यही कारण था कि तीनों राजकुमार ही जब यौवन की दहलीज पर पहुंचे तो वह वन जाने के लिए आतुर दिखाई देने लगे। उचित समय आते ही तीनों भाई राजपाट को त्याग कर अपने माता-पिता को प्रणाम कर घने जंगलों की ओर चल पड़े। आत्म साधना और तपस्या ही अब उनके जीवन का लक्ष्य बन गया था। मां का तीर सही निशाने पर लगा था। इसलिए माता को प्रसन्नता हो रही थी कि अपनी संतान को लेकर वह जिस प्रकार का निर्माण करना चाह रही थी, आज उनकी वह साधन बोल उठी है।

राजा ऋतुध्वज की चिंता और चौथे पुत्र 'अलर्क' की कथा


जब तीन पुत्र राजपाट छोड़कर संन्यासी बन गए, तो राजा ऋतुध्वज अत्यंत चिंतित और दुखी हो गए। उनकी चिंता इसलिए भी बढ़ती जा रही थी कि उनके विशाल साम्राज्य को संभालने के लिए उनके पास एक भी उत्तराधिकारी नहीं था।
उनको इस बात को लेकर भी चिंता थी कि उनके महान वंश को आगे बढ़ाने का काम अब कौन करेगा ? इतने विशाल साम्राज्य में रहने वाली प्रजा की रक्षा कौन करेगा और इतने विशाल साम्राज्य का संचालन कौन करेगा ? राजा की भावना कुछ और थी और माता की भावना कुछ और थी।
यह चिंतन का टकराव नहीं था। विचारों की लड़ाई भी नहीं थी। इसमें बहुत ऊंचा आदर्श छिपा हुआ था। जिसे रानी समझ रही थी। राजा अपनी सांसारिक अज्ञानता के कारण समझने का प्रयास नहीं कर रहे थे।
जब मदालसा ने चौथे पुत्र को जन्म दिया, तो राजा ऋतुध्वज ने व्याकुल होकर मदालसा से प्रार्थना की कि: -
"हे देवी! कृपा कर इस चौथे पुत्र को बख्श दो। इसे निवृत्ति मार्ग (संन्यास) की दीक्षा मत दो। इसे संसार में रहने दो ताकि यह बड़ा होकर प्रजा का पालन कर सके और हमारा वंश चला सके।"
मदालसा मर्यादा का पालन करना जानती थीं। उनके लिए पति परमेश्वर का रूप थे। इसलिए उन्होंने अपने पति की हार्दिक इच्छा का स्वागत करते हुए उनको इस बात का वचन दिया कि इस बार वह अपने आने वाले पुत्र को किसी प्रकार के वैराग्य की शिक्षा नहीं देंगी। इसलिए रानी मदालसा ने पति की आज्ञा और राजा के धर्म का सम्मान करते हुए उनकी बात स्वीकार कर ली। जमीन के चौथे पुत्र ने जन्म लिया तो राजा ने मदालसा से कहा कि इस बार तुम ही इसका नामकरण करो। मदालसा ने निरर्थकता को दर्शाने के लिए इस बालक का नाम 'अलर्क' (जिसका एक अर्थ 'अलर्क कुत्ता' या मदोन्मत्त भी निकाला जाता है) रख दिया।
वास्तव में हम सभी की स्थिति संसार में रहकर पागल कुत्ते की सी बनी रहती है। संसार में रहकर हम कुत्तों की भांति स्वजाति द्रोह करते हैं। निज बंधुओं के साथ द्रोह करते हैं। कुत्तों की तरह उन पर भोंकते रहते हैं। उनकी थाली में रखी रोटी को लेकर झगड़ते हैं। धन संपत्ति को लेकर उनके साथ झगड़ा करते हैं। इसलिए ही रानी मदालसा ने अपने चौथे पुत्र का नाम अलर्क रखा।

अलर्क को प्रवृत्ति मार्ग (राजधर्म) की शिक्षा:


मदालसा ने अपने पति को दिए गए वचन के अनुसार अलर्क को वैराग्य की लोरी नहीं सुनाई। इसके स्थान पर उन्होंने उसे एक आदर्श क्षत्रिय, नीतिवान राजा और प्रजापालक बनने की शिक्षा दी। जिसे राजा बनना था, उसे राजा बनाने के लिए ही रानी ने तैयारी करनी आरंभ कर दी। माता निर्माता भवति... के सूत्र वाक्य पर काम करते हुए रानी ने चौथे बच्चे के निर्माण के लिए भी अपने आप को समर्पित कर दिया।
माता के दिए हुए दिव्य संस्कारों का ही परिणाम था कि राजा का यह चौथा पुत्र बड़ा हुआ तो राजकीय आकर्षण ने उस पर वैसा ही प्रभाव डाला ,जैसा एक राजा बनने वाले युवराज पर राजकीय आकर्षण अपना प्रभाव डाला करते हैं।
माता मदालसा ने अलर्क को राजनीति, अर्थशास्त्र, न्याय और युद्धकला का संपूर्ण ज्ञान देने का प्रयास किया था। अब वह राजनीति ,अर्थशास्त्र, न्याय और युद्धकला में पूर्णतया पारंगत हो चुका था। यही कारण था कि जब उसने अपने पिता ऋतु ध्वज के सेवानिवृत होने के उपरांत राज्य का कार्य भार संभाला तो वह एक अत्यंत न्यायप्रिय राजा सिद्ध हुआ।


मां की अंतिम विदाई और जादुई अंगूठी (दिव्य रहस्य)


जब अलर्क राजा बन गया और माता मदालसा तथा राजा ऋतुध्वज वानप्रस्थ आश्रम (जंगल) के लिए प्रस्थान करने लगे, तब मदालसा ने अपने पुत्र अलर्क को बड़े प्रेम से गले लगाया। उन्हें भली प्रकार ज्ञान था कि एक समय ऐसा आएगा जब इस पुत्र के समक्ष कई प्रकार के संकट आकर इसे घेर लेंगे। जिसका परिणाम यह होगा कि राजा मानसिक अशांति और शत्रु भय या घोर संकट मैं ऐसा घिर जाएगा कि उसे निकलने का रास्ता दिखाई नहीं देगा।
इसलिए विदा होते समय मदालसा ने अलर्क को एक सोने की अंगूठी दी और कहा: -
"पुत्र! यह राजपाट और सांसारिक जीवन कांटों से भरा है। जब जीवन में ऐसा समय आए जब तुम चारों तरफ से संकटों से घिर जाओ, कोई रास्ता न सूझे, मंत्रियों और सेना पर से भरोसा उठ जाए और तुम्हारा मन अत्यंत अशांत और दुखी हो, तब इस अंगूठी के भीतर छिपे पत्र को खोलकर पढ़ना। उससे पहले इसे मत खोलना।"


अलर्क का संकट और संन्यास:


माता-पिता के संन्यस्त होने के उपरांत वर्षों तक अलर्क ने सफलता पूर्वक शासन किया। उसके राज्य में प्रजा में सुख शांति थी। लोग अपने राजा की प्रशंसा करते हुए थकते नहीं थे। राजा भी अपनी प्रजा से असीम प्रेम करता था। कहा जाता है कि सदा दिन एक जैसे नहीं रहते हैं। कालचक्र घूमता रहता है। समय का चक्र बदला और एक बार पड़ोसी राजा ने राजा अलर्क के राज्य पर आक्रमण कर दिया। अलर्क की सेना ने शत्रु का सामना करने में किसी प्रकार की कमी नहीं छोड़ी। परंतु सच यही था कि अलर्क चारों ओर से शत्रुओं से घिर गए थे। उनका राजकोष रिक्त होने लगा और वे भयंकर मानसिक तनाव में आ गए। अवसाद के उस क्षण में उन्हें अपनी माता मदालसा की बात याद आई। उन्होंने अंगूठी को खोलकर उसके अंदर का सूक्ष्म पत्र निकाला। उस पत्र पर माता मदालसा ने लिखा था: -


सङ्गः सर्वात्मना त्याज्यः स चेत् त्यक्तुं न शक्यते।
स सद्भिः सह कर्तव्यः सन्तो हि तस्य भेषजम्॥

इसका अर्थ था:-

"यदि स्वयं को सुखी और शांत देखना चाहते हो, तो इस संसार के प्रति आसक्ति (मोह) को पूरी तरह से त्याग दो। और यदि पूरी तरह त्याग नहीं सकते, तो संतों और सत्पुरुषों का संग करो, क्योंकि महापुरुषों का संग ही सांसारिक मानसिक रोगों की एकमात्र अचूक दवा है।"

माता के दिव्य उपदेश ( लोरी ) ने राजा पर चमत्कारिक प्रभाव किया। माता के दिव्य संस्कार ने राजा के भीतर क्रांति के भाव उत्पन्न कर दिए। उसकी आत्मा में एक अजीब प्रकार की झंकार उठ खड़ी हुई। उसकी आत्म चेतना जाग उठी। सांसारिक विषय भोगों में फंसकर जिस प्रकार उसकी मति भांग सी हो गई थी, वह अपने सही ठिकाने पर आ गई।
उन्होंने इस बात की सच्चाई को समझ लिया कि जीत-हार, राजपाट सब नश्वर हैं। उन्होंने तुरंत अपना राज्य एक योग्य उत्तराधिकारी को सौंप दिया और भगवान दत्तात्रेय के आश्रम में जाकर दीक्षा ली और अंततः आत्मज्ञान प्राप्त कर संन्यासी बन गए।

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