बंधन से मुक्ति, भक्ति और ज्ञान की युक्ति देती है भागवत कथा - आचार्य त्रिपुष्कर शास्त्री जी महाराज
- द्वारका मन्दिर में श्रीमदभागवत कथा विश्राम
- नौवें दिन छठी महोत्सव एवं भंडारा बुधवार को
द्वारिका मंदिर आनन्दपुरी बोरिंग केनाल रोड में आयोजित श्रीमदभागवत कथा के आठवे दिन व्यास पीठ पर कथा व्यास का पूजन सपत्नीक सपरिवार किया यजमान सुनील कुमम तिवारी ने ।
कथा के अंतिम सत्र के आरम्भ में श्री तिवारी ने कहा आज के समय में भी आसुरी शक्तियाँ दुष्ट बनकर दैवी शक्तियों को परेशान करने में लगे रहते हैं l किन्तु दैवी शक्तियों के सामने आसुरी शक्ति टिक नहीं पाती l दैवी शक्तियों की ही विजय होती है। इस भागवत कथा के आयोजन में भी आसुरी शक्तियों का उपद्रव हुआ, किन्तु भगवान अपने भक्तों पर सहाय होकर धर्मध्वज को झुकने नहीं दिया और भागवत कथा विश्राम तक पहुंचा। नौवें दिन बुधवार को छठी महोत्सव पार विशाल भण्डारा प्रभुश्री कृष्ण की सेवा मे होगा l
कथा व्यास आचार्य श्री त्रिपुष्कर शास्त्री जी महाराज ने आठवें दिन श्रीमदभागवत का सार संक्षेप बताया। भागवत माहात्म्य बताते हुए आचार्य श्री ने कहा श्रीमद्भागवत की महिमा सबसे अधिक पुण्यप्रद है। भगवान विष्णु ने श्री कृष्ण के कहने पर श्रीमदभागवत का पाठ किया और लक्ष्मी जी प्रेम से सुनने लगी। जब लक्ष्मी जी बोलती हैं तो भगवान विष्णु श्रोता बनकर सुनते हैं। भगवान विष्णु की कथा एक महीने में सम्पन्न होती थी किन्तु जब माँ लक्ष्मी कक्षा करती तो दो महीने तक होता रहता था।
उद्धव जी को भगवान श्रीकृष्ण से मित्रता भागवत की कृपा से ही हुई। उद्धव जी ने देव गुरु आचार्य वृहस्पति से उपदेशों को सुनकर संकल्प लिया और एक मास तक भागवत कथा का रसास्वादन किया। भगवान श्रीकृष्ण उद्धवजी के समर्पित भक्ति से उनके अनन्य प्रिय सखा बन गये। भागवत की महिमा अनन्त है। जरुरत इस बात की है कि हम जो भी सुने एकाग्र होकर सुने और सुने हुए ज्ञान को अपने लिए, परिवार के लिए और समाज के लिए प्रसारित करे । भागवत कथा का सार यही है कि जीवन में सांसारिक विषय विकारों के बंधन से मुक्ति दिलाने वाली भक्ति और ज्ञान भागवत से मिल जाती है l
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