काश पापी पेट न रुलाता
मानव मानव को नहीं समझे ,अन्य जीव कहाॅं फिर भाता ।
आलीशान तब महल बनाकर ,
परिवार तज कहाॅं वह जाता ।।
किंतु मानव है पीड़ित पेट से ,
पीड़ित पेट ही उसे सताता ।
भर न पाता कभी यह क्षूधा ,
निज क्षुधा ही सहने न पाता ।।
संग जुड़ा उससे ये इंसानियत ,
परिजन जुड़े उसके साथ में ।
परिजनों का ये पालन पोषण ,
जीवन मरण उसके हाथ में ।।
पेट कारण ही स्वार्थ परमार्थ ,
पेट हेतु मानव कहीं ध्याता ।
पेट कारण मानव यह त्रस्त ,
व्यस्त का आधार विधाता ।।
धरा पर कोई न होता दुःखी ,
जीव जो पेट नहीं यह पाता ।
न होता कोई तन में बीमारी ,
काश ! पापी पेट न रुलाता ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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