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आर्य समाज ने मनाई शहीद भगत सिंह की जयंती : कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने किया है शहीद भगत सिंह के चरित्र का हनन : डॉ आर्य

आर्य समाज ने मनाई शहीद भगत सिंह की जयंती : कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने किया है शहीद भगत सिंह के चरित्र का हनन : डॉ आर्य

ग्रेटर नोएडा। यहां पर आर्य समाज चूहड़पुर में आर्य उप प्रतिनिधि सभा जनपद गौतम बुद्ध नगर के तत्वावधान में शहीद भगत सिंह की 119 वीं जयंती के अवसर पर तीन दिन के यजुर्वेद पारायण यज्ञ का आयोजन किया गया। अंतिम दिवस कार्यक्रम में गुरुकुल पौंधा के प्राचार्य आचार्य धनंजय मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित हुए। मुख्य वक्ता के रूप में बोलते हुए उत्तर प्रदेश आर्य प्रतिनिधि सभा उत्तर प्रदेश की न्याय सभा के प्रधान न्यायाधीश व जिला प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष डॉ राकेश कुमार आर्य ने कहा कि कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने देश के इतिहास का बेड़ा गर्क करते हुए हिंदू इतिहास और हिंदू वैभव का विनाश करने का निर्णय लिया।
इसी के चलते शहीद भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों द्वारा भारत वैभव के लिए किए गए कार्यों की भी मनमानी व्याख्या की गई। उनके बारे में झूठ फैलाया गया कि वह नास्तिक से और कम्युनिस्ट विचार धर्म विश्वास रखते थे।
जबकि शहीद भगत सिंह का सीधा संबंध आर्य समाज से था। उनके पिता, उनके दादा ,उनके चाचा आदि सभी आर्य समाज के लिए जीवन भर काम करते रहे। रूस की क्रांति से वह प्रभावित थे। परंतु वह नीरो और चंगेज खान को भगवान भी कहते थे। क्योंकि उन्होंने आतंकवादी शक्तियों का विनाश किया था । उन्हीं के काम को भगत सिंह भारत में दोहराना चाहते थे।
उन्होंने कहा कि महात्मा बुद्ध ने कभी कहा था कि वह उस वेद को नहीं मानते जो वेद पशुओं की हिंसा को बढ़ावा देते हुए उन्हें यज्ञों की वेदी में फेंकने का काम करता हो। इसी प्रकार कभी अंबेडकर जी ने भी कहा था कि वह उस मनुस्मृति को नहीं मानते जिसमें शूद्रों की उपेक्षा की गई है। इसका अभिप्राय यह नहीं था कि महात्मा बुद्ध वेदों के विरोधी थे और डॉ अंबेडकर मनुस्मृति के विरोधी थे। जैसे महात्मा बुद्ध वेदों के समर्थक थे और कहते थे कि वेदों में पशु हिंसा निषेध है, वैसे ही डॉ अंबेडकर भी मनुस्मृति के संबंध में आर्य समाज के दृष्टिकोण से सहमत और संतुष्ट थे। वैसे ही अमर क्रांतिकारी भगत सिंह ने भी जब यह कहा कि वे नास्तिक हैं और उस भगवान को नहीं मानते जो भगवान मेरे देश के करोड़ों लोगों पर हो रहे अन्याय से उनको मुक्ति नहीं दिला पाता तो इसका अभिप्राय यही था कि देश के जन-जन को वह झंकृत कर रहे थे कि उठ खड़े होओ और अपने भगवान अपने आप बन जाओ। यह कुछ वैसे ही था जैसे श्री कृष्ण जी ने अर्जुन को गीता का उपदेश देते हुए युद्ध के लिए तैयार किया था।
उन्होंने कहा कि भारत के इतिहास का विकृतिकरण करते हुए कम्युनिस्ट लोगों ने जानबूझकर यह तथ्य स्थापित किया कि भारत की संस्कृति का शुभारंभ मोहनजोदड़ो से होता है। जो कि ईसा से लगभग 3500 साल पुरानी सभ्यता है। जबकि सच यह है कि हमारी संस्कृति का शुभारंभ सरयू नदी के किनारे से होता है। जहां बैठकर कभी मनु महाराज ने मनुस्मृति का निर्माण किया था और संसार को सबसे पहला मानव निर्मित संविधान अर्थात मनुस्मृति प्रदान की थी। इसी प्रकार कम्युनिस्टों ने ध्यान भंग करने के लिए हमें यह भी पढ़ाया कि अलाउद्दीन खिलजी ने मंगोल आक्रांताओं को रोका था, जबकि मुगलों को हिंदुओं का गुलाम बनाने वाले मैराथन के इतिहास को भुला दिया जाता है। किसी सोच के अंतर्गत कम्युनिस्ट इतिहासकारों ने सम्राट मिहिर भोज और बप्पा रावल के उस प्रयास को भी उपेक्षित कर दिया जिसके अंतर्गत उन्होंने इस्लाम के आक्रमणकारियों को भारत पर आक्रमण करने से 300 साल के लिए रोक दिया था। इस सोच के अंतर्गत उन्होंने इतिहास को लिखा ।परंतु क्रांतिकारी भगत सिंह ने कहीं भी उनके इस प्रकार के प्रयास का समर्थन नहीं किया।
मुख्य अतिथि आचार्य धनंजय ने कहा कि शहीद भगत सिंह के साथ कम्युनिस्टों ने यह अन्याय केवल इसलिए किया है कि भारत की युवा पीढ़ी को भ्रमित किया जा सके। आज इस प्रकार के षड्यंत्र का पर्दाफाश करने का समय आ गया है । जिसे आर्य समाज को अपने हाथों में लेना चाहिए। उन्होंने वेद के एक मंत्र की सुंदर व्याख्या करते हुए राष्ट्र के लिए आवश्यक तत्वों का निर्धारण करके महान क्रांतिकारी भगत सिंह का उस मंत्र की व्याख्या के साथ समन्वय स्थापित कर लोगों को आनन्दित कर दिया। उन्होंने कहा कि जिस देश के पास अमर क्रांतिकारी भगत सिंह जैसे युवा क्रांतिकारी होंगे, वह देश कभी किसी भी शक्ति का गुलाम नहीं रह सकता। यह और बड़ी बात है कि इन क्रांतिकारियों को तैयार करने में आर्य समाज के प्रणेता महर्षि दयानंद का विशेष योगदान था। आचार्य श्री ने कहा कि आज शिक्षा संस्कारों में जिस प्रकार की गिरावट देखी जा रही है, वह देश की युवा पीढ़ी को बिगाड़ रही है। इसलिए समय की आवश्यकता है कि युवा वर्ग को वेद की शिक्षा के साथ जोड़ा जाए। क्योंकि वेद की शिक्षा ही बालमन में देशभक्ति का संचार कर सकती है। आज हम राष्ट्र की दुर्गति केवल इसलिए देख रहे हैं कि शिक्षा रोजगार प्रधान हो गई है । इसको संस्कार प्रधान करना हमारे लिए बड़ी चुनौती है। तभी हम भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों का निर्माण कर पाएंगे।
उन्होंने कहा कि यह वेद की शिक्षा का ही परिणाम था कि भगत सिंह का पूरा परिवार राष्ट्र भक्तों का परिवार था। क्योंकि वेद ही राष्ट्रभक्त, समाज भक्त, देशभक्त, संस्कृति भक्त और धर्म भक्त नागरिकों का निर्माण करता है।
भाषा प्रचारिणी सभा के जिला अध्यक्ष ब्रह्मचर्य आर्य सागर ने कार्यक्रम का सफल संचालन करते हुए कहा कि कम्युनिस्ट भारतीय संस्कृति और भारतीय वैदिक धर्म से जन्मजात शत्रुता रखते हैं। इसीलिए वह भारत के युवा वर्ग को पथभ्रष्ट कर भारत में खूनी क्रांति की बुनियाद रखना चाहते हैं। जबकि आर्य समाज ऐसे किसी भी षड्यंत्र को सफल नहीं होने देगा । उन्होंने क्रांति की वेद संगत व्याख्या करते हुए कहा कि इसका अभिप्राय खून बहाने से नहीं है। बल्कि यह निरंतर प्रगतिशीलता की सूचक है । जिसमें इस बात का पूरा प्रबंध किया जाता है कि किसी भी वर्ग, समुदाय, समाज या व्यक्ति के साथ किसी भी प्रकार का अन्याय न होने पाए और यह तभी संभव है जब देश में शांति हो। इस प्रकार शांति और क्रांति दोनों का गहरा मेल है।
ब्रह्मचारी आर्य सागर ने कहा कि आर्य समाज भारत के वास्तविक गौरवपूर्ण इतिहास में विश्वास रखता है, जिसे अब वह हर युवा को पढ़ाने के लिए वह संकल्पित हो चुका है। उन्होंने कहा कि भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों के जीवन से हमें यही प्रेरणा लेनी चाहिए कि हम देश पर मर मिटने वाले आर्य समाज के पुराने संस्कारों को जीवित करेंगे। यह परंपरा रुकनी नहीं चाहिए। यदि हमने आर्य समाज की इस परंपरा को रोक दिया तो देश मिट जाएगा। सनातन मिट जाएगा।
इस कार्यक्रम में देव मुनि जी महाराज, प्राचार्य गजेंद्र सिंह आर्य, आचार्य दशरथ कुमार,सुप्रसिद्ध भजनोपदेशिका बहन सुलभा आर्या, उमेश अधिवक्ता, वेद मुनि जी ने भी अपने विचार व्यक्त किये और शहीद भगत सिंह को याद किया।
कार्यक्रम में वेद प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष विजेंद्र सिंह आर्य, चमन शास्त्री, महाशय रंगलाल आर्य, शिव मुनि जी महाराज, प्रिंसिपल नरपत सिंह,हेमसिंह आर्य, गजराज सिंह आर्य, रामप्रसाद आर्य ,महावीर सिंह आर्य, महेंद्र सिंह आर्य , राजेंद्र सिंह आर्य, महेश आर्य, यशपाल आर्य ,यशपाल आर्य, नेत्रपाल आर्य, धर्मेंद्र भाटी, प्रवेश भाटी, रघुराज भाटी, रामे भाटी, रामनिवास आर्य, परमानंद कुशवाहा, पवन आर्य, किशन लाल आर्य, अजीत नागर,बेगराज आर्य, अशोक आर्य आदि आर्यजन उपस्थित रहे।
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