सरस्वती और लक्ष्मी के वरद पुत्र थे विद्यावाचस्पति पंडित रामदहिन मिश्र

लेखक : अमरेन्द्र कुमार मिश्र
ग्राम–पथार, पोस्ट-गड़हनी, जिला-भोजपुर, आरा, बिहार
स्वर्णिम अतीत में जिसे कभी ‘काशी का टुकड़ा’ कहा जाता था, वही पथार गांव आज भी अपने भीतर इतिहास, संस्कृति, शिक्षा और साहित्य की असंख्य स्मृतियों को संजोए हुए है। भोजपुर जिला मुख्यालय आरा से लगभग बीस किलोमीटर दक्षिण स्थित इस गांव की मिट्टी ने अनेक प्रतिभाओं को जन्म दिया, किंतु जिन विभूतियों ने अपनी प्रतिभा, कर्मठता, साहित्य-साधना और उद्यमशीलता से इस छोटे से गांव का नाम दूर-दूर तक पहुंचाया, उनमें विद्यावाचस्पति पंडित रामदहिन मिश्र का नाम अत्यंत सम्मान और श्रद्धा के साथ लिया जाता है। साधारण और आर्थिक रूप से विपन्न ब्राह्मण परिवार में जन्म लेने वाला एक बालक जब अपनी प्रतिभा, परिश्रम, धैर्य और अदम्य जिजीविषा के बल पर साहित्य, शिक्षा, पत्रकारिता, प्रकाशन, मुद्रण और पुस्तक व्यवसाय की दुनिया में विशिष्ट पहचान स्थापित करता है, तो वह जीवन-कथा केवल किसी एक व्यक्ति की सफलता की कहानी नहीं रह जाती, बल्कि वह आने वाली पीढ़ियों के लिए संघर्ष, साधना और आत्मनिर्भरता का प्रेरक आख्यान बन जाती है। पंडित रामदहिन मिश्र का जीवन इसी प्रेरक आख्यान का नाम है।
उनके व्यक्तित्व को समझने के लिए ‘सरस्वती और लक्ष्मी के वरद पुत्र’ की उपमा अत्यंत सार्थक प्रतीत होती है। एक ओर वे ज्ञान और साहित्य की साधना में निरंतर रत रहे, दूसरी ओर प्रकाशन, मुद्रण और पुस्तक व्यवसाय के क्षेत्र में उन्होंने ऐसी सफलता अर्जित की जिसकी कल्पना सामान्य परिस्थितियों में कठिन थी। वे विद्वान थे, लेखक थे, अध्यापक थे, संपादक थे, पत्रकार थे, प्रकाशक थे, मुद्रक थे और पुस्तक-विक्रेता भी थे। किंतु इन सभी भूमिकाओं के पीछे जो मूल शक्ति थी, वह थी उनका ज्ञान के प्रति अनुराग, कर्म के प्रति निष्ठा और समाज के प्रति दायित्व-बोध। उन्होंने अभावों को अपनी नियति नहीं बनने दिया। उन्होंने कठिन परिस्थितियों को चुनौती के रूप में स्वीकार किया और अपने जीवन को निरंतर आगे बढ़ाते हुए ऐसा मुकाम प्राप्त किया जहां साहित्य और व्यवसाय, ज्ञान और कर्म, विद्या और उद्यम एक-दूसरे के पूरक बन गए।
पंडित रामदहिन मिश्र के पिता श्री सिद्धेश्वर मिश्र डुमरांव राज में ज्योतिषी और कर्मकांडी पुरोहित के रूप में प्रतिष्ठित थे। स्वाभाविक रूप से घर का वातावरण धार्मिक, संस्कृतनिष्ठ और विद्या-साधना से जुड़ा हुआ था। बालक रामदहिन के मन पर पिता के विद्वतापूर्ण व्यक्तित्व और संस्कारों की गहरी छाप पड़ी। उनकी शिक्षा-दीक्षा का आरंभ संस्कृत माध्यम से हुआ। वह समय आज की तरह सुविधाओं से परिपूर्ण नहीं था। ग्रामीण बिहार में शिक्षा के साधन सीमित थे और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों के बच्चों के लिए उच्च शिक्षा प्राप्त करना विशेष रूप से कठिन था। ऐसे वातावरण में रामदहिन मिश्र ने ज्ञान की अपनी प्यास को कभी मंद नहीं होने दिया। पिता के साथ उन्होंने डुमरांव में शिक्षा ग्रहण की और इसके बाद आरा, पटना, टिकारी, काशी तथा अन्य स्थानों में रहकर अध्ययन किया। विभिन्न नगरों के शैक्षिक और सांस्कृतिक वातावरण ने उनके व्यक्तित्व को व्यापक बनाया। काशी जैसी विद्या और संस्कृति की नगरी के संपर्क ने उनके ज्ञान-क्षितिज को और विस्तृत किया और संस्कृत की परंपरागत शिक्षा के साथ-साथ हिंदी के प्रति उनकी रुचि भी निरंतर प्रगाढ़ होती गई। यही रुचि आगे चलकर उनके साहित्यिक व्यक्तित्व की आधारशिला बनी।
उनका कर्मपथ अध्यापन से प्रारंभ हुआ। संस्कृत अध्यापक के रूप में उन्होंने अपने व्यावसायिक जीवन की शुरुआत की, लेकिन उनकी दृष्टि केवल नौकरी तक सीमित नहीं थी। पटना में रहते हुए उन्हें पटना ट्रेनिंग कॉलेज से जुड़ने का अवसर मिला, जहां कॉलेज के अंग्रेज प्रिंसिपल श्री थी केट तथा प्रोफेसर श्री प्रेस्टन ने उन्हें हिंदी और संस्कृत के अध्यापक के रूप में नियुक्त किया। अंग्रेजी शासन के दौर में किसी भारतीय विद्वान का अपनी विद्वत्ता के आधार पर इस प्रकार सम्मानित होकर अध्यापन करना स्वयं में महत्वपूर्ण उपलब्धि थी। अध्यापन ने उन्हें विद्यार्थियों के मन और उनकी शैक्षिक आवश्यकताओं को समझने का अवसर दिया। कक्षा में प्रतिदिन बच्चों के साथ संवाद करते हुए उन्हें यह अनुभव हुआ कि विद्यार्थियों के लिए ऐसी पुस्तकों की आवश्यकता है जो उनकी आयु, पाठ्यक्रम और बौद्धिक क्षमता के अनुरूप सरल, सहज, उपयोगी और संस्कारपरक हों। यही अनुभव धीरे-धीरे उन्हें लेखन और पाठ्यपुस्तक निर्माण की दिशा में ले गया।
उन्होंने प्राथमिक कक्षाओं से लेकर प्रवेशिका स्तर तक विभिन्न विषयों की पाठ्यपुस्तकों के लेखन और निर्माण में योगदान दिया। उनके लिए पुस्तक केवल परीक्षा पास करने का साधन नहीं थी। वे पुस्तक को ज्ञान, संस्कार और व्यक्तित्व निर्माण का माध्यम मानते थे। अध्यापक के रूप में प्राप्त प्रत्यक्ष अनुभव ने उनके लेखक व्यक्तित्व को मजबूत किया और बाल मनोविज्ञान की समझ विकसित की। इसी कारण बाल साहित्य के प्रति उनका विशेष अनुराग पैदा हुआ। बच्चों के लिए लिखी जाने वाली सामग्री में वे सरलता, रोचकता, उपयोगिता और शिक्षाप्रदता को महत्व देते थे। उनका विश्वास था कि समाज के भविष्य का निर्माण केवल विद्यालय की चारदीवारी में नहीं होता, बल्कि बच्चों के मन में बोए गए संस्कारों और विचारों से होता है। इसलिए बाल शिक्षा और बाल साहित्य उनके जीवन के महत्वपूर्ण सरोकार बने रहे।
लेकिन पंडित रामदहिन मिश्र की प्रतिभा केवल अध्यापन और पाठ्यपुस्तक लेखन तक सीमित नहीं रही। वे मूलतः बहुआयामी प्रतिभा के धनी थे। उन्होंने साहित्यिक निबंध लिखे, पुस्तकों का लेखन किया, संपादन किया और प्रकाशन के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाई। उनके लिए साहित्य मनोरंजन या बौद्धिक विलास का साधन नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति की सेवा का माध्यम था। वे ज्ञान को अधिकाधिक लोगों तक पहुंचाना चाहते थे। लेखक के रूप में उनकी प्रतिभा का उल्लेख करते समय ‘पार्वती-परिणय’ के अनुवाद का विशेष रूप से उल्लेख किया जाता है। दूसरी ओर प्रकाशक के रूप में उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण साहित्यकारों की रचनाओं को पाठकों तक पहुंचाने का कार्य किया। राजा राधिकारमण, अयोध्या सिंह उपाध्याय और रामचरित उपाध्याय जैसे साहित्यकारों की पुस्तकों के प्रकाशन में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही। इस प्रकार वे स्वयं लिखने वाले लेखक ही नहीं थे, बल्कि दूसरे रचनाकारों की प्रतिभा को समाज तक पहुंचाने वाले साहित्य-सेवी प्रकाशक भी थे।
हिंदी भाषा और उसके व्यवस्थित अध्ययन के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय रहा। अंग्रेजी शासनकाल में हिंदी के स्वरूप, व्याकरण और रचना-पद्धति को व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत करने की आवश्यकता अनुभव की जा रही थी। इसी वातावरण में पंडित रामदहिन मिश्र की कृति ‘रचना विचार’ सामने आई। यह उनके भाषिक ज्ञान, हिंदी के प्रति गंभीर दृष्टिकोण और रचनात्मक चेतना का परिचायक थी। वे भाषा को केवल व्याकरण के नियमों का समूह नहीं मानते थे। उनके लिए भाषा अभिव्यक्ति का जीवंत माध्यम थी, जिसमें विचार, संस्कार, साहित्य और समाज सबका समावेश होता है। व्याकरण और साहित्य के बीच सहज संबंध स्थापित करने की उनकी दृष्टि उनके कार्य में दिखाई देती है। हिंदी को शिक्षण और साहित्य की सशक्त भाषा बनाने के लिए जिन विद्वानों ने अपने समय में श्रम किया, पंडित रामदहिन मिश्र उन्हीं महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों में गिने जाते हैं।
उनके जीवन का एक अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष यह भी था कि ज्ञान की साधना के साथ उन्होंने आर्थिक आत्मनिर्भरता को भी महत्व दिया। अक्सर साहित्य और व्यवसाय को एक-दूसरे का विरोधी समझा जाता है, किंतु पंडित रामदहिन मिश्र ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि ज्ञान, साहित्य और व्यवसाय यदि उद्देश्यपूर्ण ढंग से संचालित हों तो वे एक-दूसरे के पूरक बन सकते हैं। एक साधारण अध्यापक के रूप में जीवन आरंभ करने वाला व्यक्ति आगे चलकर प्रकाशन और पुस्तक व्यवसाय में लाखों-लाख रुपये के कारोबार को कुशलता से संचालित करने में सफल हुआ। इसके पीछे केवल आर्थिक महत्वाकांक्षा नहीं थी, बल्कि संगठन क्षमता, प्रबंधन कौशल, दूरदृष्टि और कठोर परिश्रम का समन्वय था। उन्होंने प्रकाशन को केवल व्यापार की वस्तु नहीं बनाया, बल्कि उसे साहित्य और ज्ञान के प्रसार का माध्यम बनाए रखा।
उनका व्यक्तित्व जितना कर्मठ था, स्वभाव उतना ही विनम्र। वे मितभाषी, हितभाषी और मृदुभाषी थे। कम बोलना और सार्थक बोलना उनके स्वभाव का हिस्सा था। उनकी वाणी में कठोरता के स्थान पर मधुरता थी। कर्मठता के साथ उनमें असीम धैर्य और अपरिमेय सहिष्णुता थी। जीवन की विषम परिस्थितियां, विघ्न-बाधाएं और विरोध उनके संकल्प को डिगा नहीं सके। वे जानते थे कि कोई भी बड़ा कार्य केवल प्रतिभा के सहारे नहीं होता; उसके लिए धैर्य, निरंतरता, संबंधों की गरिमा और मनुष्य के प्रति सम्मान भी आवश्यक है। यही गुण उन्हें साहित्यकारों, शिक्षकों, विद्यार्थियों, व्यापारियों और समाज के विभिन्न वर्गों से जोड़ते रहे।
उनकी साहित्यिक सेवाओं का मूल्यांकन उनके समकालीन साहित्यकारों ने भी सम्मानपूर्वक किया। रामवृक्ष बेनीपुरी ने उन्हें साहित्यकार, लेखक और प्रकाशक के रूप में स्मरण किया और उनके साहित्य-सेवी जीवन को महत्व दिया। आचार्य केशरी कुमार उन्हें साहित्य का ‘ऋषि’ कहा करते थे। यह संबोधन केवल प्रशंसा का शब्द नहीं था, बल्कि उनकी साहित्य-साधना की गहराई का संकेत था। जगदीश चंद्र माथुर, भगवती शरण उपाध्याय, देवराज उपाध्याय, जहूर बख्श, किशोरी दास बाजपेयी और हंसकुमार तिवारी जैसे साहित्यिक व्यक्तित्वों ने भी पंडित जी की प्रतिभा और सेवाओं का सम्मान किया। इससे स्पष्ट होता है कि उनका साहित्यिक संपर्क और प्रभाव किसी एक क्षेत्र या नगर तक सीमित नहीं था।
भारतीय हिंदी साहित्य के विकास में लेखकों के साथ प्रकाशकों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। रचनाकार अपने विचारों को शब्द देता है, लेकिन उन शब्दों को व्यापक समाज तक पहुंचाने के लिए प्रकाशक की भूमिका सामने आती है। पंडित रामदहिन मिश्र ने इस भूमिका को अत्यंत गंभीरता से निभाया। उन्होंने अनेक रचनाकारों की पुस्तकों का प्रकाशन किया, पाठ्यपुस्तकों को पाठकों तक पहुंचाया और मुद्रण व्यवस्था को विकसित किया। पटना में हिंदुस्तानी प्रेस के माध्यम से उनका प्रकाशन जगत में सक्रिय होना उस समय की दृष्टि से बड़ी उपलब्धि थी। मुद्रण तकनीक आज की तरह सरल और सुलभ नहीं थी। सीमित संसाधनों में प्रेस स्थापित करना, पुस्तकें तैयार करना, उनका प्रकाशन करना और फिर उन्हें पाठकों तक पहुंचाना श्रम, धैर्य और संगठन क्षमता की मांग करता था। पंडित जी ने इन सभी चुनौतियों को स्वीकार किया और प्रकाशन को अपनी कर्मभूमि बनाया।
उनका जीवन जितना पटना और काशी जैसी कर्मभूमियों से जुड़ा था, उतना ही गहरा रिश्ता अपनी जन्मभूमि पथार से भी था। सफलता प्राप्त करने के बाद बहुत से लोग अपनी जड़ों से दूर हो जाते हैं, किंतु पंडित रामदहिन मिश्र ने अपनी जन्मभूमि को कभी नहीं भुलाया। उन्होंने अपने गांव और आसपास के क्षेत्र में शिक्षा तथा सामाजिक सेवा की संस्थाओं के निर्माण और विकास में योगदान दिया। पथार में प्राथमिक विद्यालय, महादेव मंदिर, दातव्य औषधालय और संस्कृत विद्यालय जैसी संस्थाओं का निर्माण उनके सामाजिक सरोकारों को प्रकट करता है। उस समय ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा और स्वास्थ्य की सुविधाएं आज की तुलना में अत्यंत सीमित थीं। ऐसे वातावरण में विद्यालय और औषधालय की स्थापना केवल संस्था बनाना नहीं, बल्कि समाज के भविष्य को दिशा देना था।
गड़हनी के उच्च विद्यालय से उनका संबंध भी शिक्षा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता का प्रमाण है। उनका विश्वास था कि ग्रामीण समाज को वास्तविक रूप से आगे बढ़ाने का सबसे प्रभावी माध्यम शिक्षा है। गांव का एक बच्चा जब अच्छी शिक्षा प्राप्त करता है तो उसका लाभ केवल उसे नहीं, बल्कि उसके परिवार और पूरे समाज को मिलता है। इसी विचार के साथ उन्होंने शिक्षा के क्षेत्र में अपने कार्य को व्यापक बनाया। पटना में बालशिक्षा समिति जैसी संस्था से जुड़कर उन्होंने बाल शिक्षा को भी अपने सामाजिक दायित्व का महत्वपूर्ण हिस्सा बनाए रखा।
पंडित रामदहिन मिश्र का व्यक्तित्व केवल गंभीर विद्वान या कर्मठ व्यवसायी का ही नहीं था। उनमें जीवन के सहज और मानवीय पक्ष भी मौजूद थे। उन्हें नाटक और सिनेमा में रुचि थी। पनतुआ मिष्ठान के प्रति उनका प्रेम उनके व्यक्तित्व की सहजता को सामने लाता है। उनकी बहुआयामी प्रतिभा और व्यापक जीवन-दृष्टि ने ही उन्हें ‘विद्यावाचस्पति’ जैसी गरिमामयी उपाधि का अधिकारी बनाया। वे ज्ञान के साधक थे, किंतु जीवन से कटे हुए विद्वान नहीं थे। वे समाज, संस्कृति, शिक्षा, साहित्य और सामान्य जीवन के विविध रंगों से जुड़े हुए थे।
यदि उनके पूरे जीवन को किसी एक शब्द में व्यक्त करना हो तो वह शब्द होगा—कर्मठता। उन्होंने परिस्थितियों के अनुकूल होने की प्रतीक्षा नहीं की, बल्कि उपलब्ध परिस्थितियों में ही अवसर खोजे। गरीबी उनके सामने थी, लेकिन उन्होंने उसे अपनी नियति नहीं माना। सीमित साधनों में शिक्षा प्राप्त की, अध्यापन किया, लेखन किया, प्रकाशन शुरू किया, प्रेस स्थापित किया, पुस्तक व्यवसाय को विकसित किया और सामाजिक संस्थाओं के निर्माण में योगदान दिया। यह यात्रा बताती है कि मनुष्य की वास्तविक शक्ति उसके पास उपलब्ध साधनों में नहीं, बल्कि उन साधनों के उपयोग की क्षमता में निहित होती है। दृढ़ इच्छाशक्ति, निरंतर श्रम, धैर्य और दूरदृष्टि के बल पर सीमित संसाधनों को भी बड़ी उपलब्धियों का आधार बनाया जा सकता है।
उनका समय आज की तुलना में कहीं अधिक कठिन था। संचार के साधन सीमित थे, मुद्रण तकनीक जटिल थी, शिक्षा के अवसर कम थे और आर्थिक संसाधन भी सहज उपलब्ध नहीं थे। ऐसे समय में एक व्यक्ति का शिक्षा, साहित्य, प्रकाशन और व्यवसाय जैसे अनेक क्षेत्रों में एक साथ सक्रिय रहना साधारण बात नहीं थी। उन्होंने एक-एक करके चुनौतियों का सामना किया। विरोध आए, विघ्न आए, परिस्थितियां कठिन हुईं, लेकिन उन्होंने अपने लक्ष्य से मुंह नहीं मोड़ा। यही कारण है कि उनका जीवन संघर्षों से बचने की नहीं, बल्कि संघर्षों को साधना में बदल देने की कहानी बन गया।
जीवन के अंतिम वर्षों में वे दमा, मधुमेह और मोतियाबिंद जैसी स्वास्थ्य समस्याओं से प्रभावित हुए, लेकिन उनकी साहित्यिक चेतना और कर्मशीलता का प्रभाव जीवन के अंतिम चरण तक बना रहा। पटना से वे वाराणसी स्थित अपने आवास गए और गंगा के तट से जुड़ी काशी की पवित्र भूमि उनके जीवन के अंतिम अध्याय की साक्षी बनी। 1 दिसंबर 1952 ईस्वी को ब्रह्ममुहूर्त में उन्होंने अंतिम सांस ली। एक ऐसे व्यक्तित्व की जीवनयात्रा का अवसान हुआ, जिसने अपने जीवन के लगभग प्रत्येक पड़ाव को शिक्षा, साहित्य और समाज के लिए समर्पित किया था।
उनके निधन का समाचार साहित्य और समाज के लिए महत्वपूर्ण था। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की ओर से भी शोक वक्तव्य जारी किया गया था। राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने भी उन्हें श्रद्धांजलि दी और उनके साहित्यिक योगदान को स्मरण किया। दिनकर के अनुसार वे कर्मठ साहित्यकार थे और काव्यशास्त्र पर उनकी छोड़ी हुई कृतियां उन्हें इतिहास में अमर बनाए रखेंगी। ऐसी श्रद्धांजलियां यह संकेत देती हैं कि पंडित रामदहिन मिश्र का योगदान केवल उनके जीवनकाल तक सीमित नहीं था, बल्कि उनके साहित्यिक कार्य ने व्यापक स्तर पर अपनी छाप छोड़ी थी।
उनके स्वर्गवास के बाद उनके इकलौते पुत्र देवकुमार मिश्र ने उनकी कृतियों और साहित्यिक विरासत को संजोकर रखने का कार्य किया। किसी साहित्यकार की मृत्यु के बाद उसकी रचनाओं और पांडुलिपियों का संरक्षण अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। समय बीतने के साथ पुस्तकें और दस्तावेज नष्ट हो सकते हैं और यदि उन्हें सुरक्षित न रखा जाए तो आने वाली पीढ़ियां उस विरासत से वंचित हो सकती हैं। इस दृष्टि से पंडित रामदहिन मिश्र की साहित्यिक परंपरा को सुरक्षित रखने का प्रयास उनके कार्यों को जीवित रखने की महत्वपूर्ण कड़ी है।
आज पथार गांव की चर्चा होती है तो पंडित रामदहिन मिश्र का नाम स्वाभाविक रूप से स्मरण आता है। एक ग्रामीण परिवेश से निकलकर राष्ट्रीय साहित्यिक जगत में अपनी पहचान बनाना अपने आप में असाधारण उपलब्धि है, लेकिन उससे भी बड़ी बात यह है कि उन्होंने अपनी सफलता को केवल निजी जीवन तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने जन्मभूमि के लिए विद्यालय, मंदिर, औषधालय और संस्कृत विद्यालय जैसी संस्थाओं की स्थापना में योगदान दिया। यह भावना आज के समय में और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, क्योंकि किसी व्यक्ति की वास्तविक महानता केवल इस बात से नहीं मापी जाती कि उसने स्वयं कितना अर्जित किया, बल्कि इससे भी मापी जाती है कि उसने समाज और आने वाली पीढ़ियों के लिए क्या छोड़ा।
पंडित रामदहिन मिश्र का जीवन आज की पीढ़ी के लिए अनेक प्रेरणाएं समेटे हुए है। अभावों के बीच शिक्षा प्राप्त करने की प्रेरणा, निरंतर सीखते रहने की प्रेरणा, ज्ञान को समाज तक पहुंचाने की प्रेरणा, साहित्य और व्यवसाय में संतुलन स्थापित करने की प्रेरणा और सबसे बढ़कर अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा। पटना और काशी जैसे नगरों में अपनी पहचान स्थापित करने के बाद भी उन्होंने पथार को नहीं भुलाया। यह तथ्य उनके व्यक्तित्व की उस गहराई को सामने लाता है जिसमें सफलता के साथ संस्कार और उपलब्धि के साथ दायित्व का भाव जुड़ा हुआ था।
उन्हें केवल साहित्यकार कहना उनके व्यक्तित्व को सीमित कर देना होगा। वे वास्तव में साहित्य और समाज के बीच एक सशक्त सेतु थे। अध्यापक के रूप में उन्होंने विद्यार्थियों तक ज्ञान पहुंचाया, लेखक के रूप में विचारों को शब्द दिए, संपादक के रूप में सामग्री को व्यवस्थित किया, प्रकाशक के रूप में रचनाकारों की प्रतिभा को पाठकों तक पहुंचाया, मुद्रक के रूप में पुस्तक निर्माण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया और पुस्तक-विक्रेता के रूप में उस ज्ञान को समाज तक पहुंचाया। इस दृष्टि से उनका पूरा जीवन ज्ञान के सृजन से लेकर उसके प्रसार तक की एक अखंड यात्रा दिखाई देता है।
किसी महान व्यक्ति की स्मृति में केवल प्रतिमा या स्मारक बना देना ही पर्याप्त नहीं होता। उससे अधिक महत्वपूर्ण वह संस्था होती है जो आने वाली पीढ़ियों की सेवा करती रहे। पंडित रामदहिन मिश्र ने अपने पीछे ऐसी ही संस्थागत विरासत छोड़ी। पथार का प्राथमिक विद्यालय, महादेव मंदिर, दातव्य औषधालय और संस्कृत विद्यालय, गड़हनी का उच्च विद्यालय, पटना का ग्रंथमाला कार्यालय, बालशिक्षा समिति और हिंदुस्तानी प्रेस—ये सभी उनके जीवन के विभिन्न पक्षों की स्मृति को जीवित रखने वाले चिरस्मारक हैं। इन संस्थाओं में उनके जीवन की विचारधारा और कर्मशीलता की प्रतिध्वनि सुनाई देती है।
आचार्य केशरी कुमार द्वारा उन्हें साहित्य का ‘ऋषि’ कहा जाना भी उनके व्यक्तित्व को समझने का एक महत्वपूर्ण सूत्र है। ऋषि केवल विद्वान नहीं होता; वह अपने ज्ञान को जीवन और समाज से जोड़ता है। पंडित रामदहिन मिश्र के जीवन में भी ज्ञान और कर्म का ऐसा ही अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। उन्होंने पुस्तकें लिखीं, लेकिन अपने ज्ञान को पुस्तकों तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने शिक्षा संस्थाओं को बढ़ावा दिया, लेकिन शिक्षा को केवल विद्यालय की सीमा में नहीं बांधा। उन्होंने प्रकाशन किया, लेकिन प्रकाशन को केवल व्यवसाय नहीं बनने दिया। उनकी साधना में साहित्य, शिक्षा, समाज और संस्कृति एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।
पथार की मिट्टी में जन्मा एक बालक जब आगे चलकर पटना और काशी के साहित्यिक संसार में अपनी पहचान बनाता है तो यह केवल एक व्यक्ति की सफलता नहीं होती, बल्कि यह ग्रामीण प्रतिभा की शक्ति का प्रमाण भी बन जाती है। प्रतिभा किसी नगर या महानगर की जागीर नहीं होती। वह गांव की मिट्टी में भी उसी प्रकार जन्म लेती है, जैसे किसी बड़े शहर में। आवश्यकता केवल अवसर, संस्कार, शिक्षा और परिश्रम की होती है। पंडित रामदहिन मिश्र का जीवन इसी सत्य का जीवंत उदाहरण है।
समय के साथ अनेक विभूतियां सार्वजनिक स्मृति से धीरे-धीरे ओझल हो जाती हैं। नई पीढ़ी को उनके योगदान की जानकारी नहीं मिल पाती। इसलिए ऐसे व्यक्तित्वों के जीवन और कार्यों को बार-बार स्मरण करना, लिखना और नई पीढ़ी तक पहुंचाना आवश्यक है। पंडित रामदहिन मिश्र के जीवन पर गंभीर शोध, उनकी प्रकाशित और अप्रकाशित कृतियों का संकलन, उनके प्रकाशकीय योगदान का दस्तावेजीकरण और उनकी जन्मभूमि से जुड़ी संस्थाओं तथा साहित्यिक सामग्री का संरक्षण भविष्य के लिए अत्यंत उपयोगी कार्य हो सकता है। यह केवल अतीत को बचाने का प्रयास नहीं होगा, बल्कि वर्तमान और भविष्य को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का माध्यम भी बनेगा।
विद्यावाचस्पति पंडित रामदहिन मिश्र का जीवन संघर्ष से सफलता, ज्ञान से कर्म और साहित्य से समाज तक की एक विलक्षण यात्रा है। गरीब ब्राह्मण परिवार में जन्म लेकर उन्होंने शिक्षा को अपना आधार बनाया, अध्यापन से जीवन प्रारंभ किया, लेखन को अपना साधन बनाया, साहित्य को अपनी साधना बनाया, प्रकाशन को कर्मक्षेत्र बनाया और समाजसेवा को जीवन का दायित्व समझा। वे उन विरले व्यक्तित्वों में थे जिनमें सरस्वती की साधना और लक्ष्मी की कृपा एक साथ दिखाई देती थी। किंतु उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि धन या यश नहीं, बल्कि वह साहित्यिक, शैक्षिक और सामाजिक विरासत है जिसे उन्होंने आने वाली पीढ़ियों के लिए छोड़ा। वे लेखक थे तो अच्छे प्रकाशक भी थे; प्रकाशक थे तो साहित्य की गहरी समझ रखने वाले संपादक भी थे; अध्यापक थे तो शिक्षा संस्थाओं के निर्माण के प्रति सजग समाजसेवी भी थे; व्यवसायी थे तो साहित्य के प्रति समर्पित साधक भी थे। उनका व्यक्तित्व प्रमाणित करता है कि मनुष्य यदि धैर्य, श्रम, विद्या, विनम्रता और दूरदृष्टि को जीवन-मंत्र बना ले तो साधारण परिस्थितियों से उठकर असाधारण ऊंचाई प्राप्त कर सकता है।
पंडित रामदहिन मिश्र की स्मृति पथार की मिट्टी में है, उनके द्वारा स्थापित संस्थाओं में है, उनकी पुस्तकों में है, उनके प्रकाशन कार्य में है और उन साहित्यकारों की स्मृतियों में है जिनकी रचनाओं को उन्होंने पाठकों तक पहुंचाया। उनका जीवन हमें यह संदेश देता है कि ज्ञान का वास्तविक अर्थ तभी है जब वह समाज के काम आए और प्रतिभा की वास्तविक सार्थकता तभी है जब वह आने वाली पीढ़ियों के लिए मार्ग प्रशस्त करे। ऐसे बहुआयामी, कर्मठ, मृदुभाषी और साहित्य-समर्पित व्यक्तित्व को शत-शत नमन। पंडित रामदहिन मिश्र केवल एक व्यक्ति नहीं, बल्कि उस समृद्ध साहित्यिक-सामाजिक परंपरा का नाम हैं जिसमें विद्या, श्रम, सेवा, उद्यम और संस्कार का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। उनकी स्मृति जितनी पुरानी होती जाएगी, उनके जीवन का महत्व उतना ही गहरा और व्यापक होकर सामने आएगा। पथार की धरती पर जन्मे इस विद्या-साधक की कर्मभूमि भले ही अलग-अलग रही हो, किंतु उनकी यशगाथा आज भी अपनी जन्मभूमि की मिट्टी से गहरे जुड़ी हुई है।
महान यशस्वी, सर्वायामी प्रतिभापुंज, विद्यावाचस्पति पंडित रामदहिन मिश्र को शत-शत नमन।
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