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बिहार की गौरवशाली विरासत को विकास की शक्ति बनाने पर मंथन

बिहार की गौरवशाली विरासत को विकास की शक्ति बनाने पर मंथन

  • भारत विकास परिषद, दक्षिण बिहार प्रांत की कार्यशाला में विरासत, ज्ञान-परंपरा और युवाओं की भूमिका पर हुआ विस्तृत संवाद

पटना, 27 सितंबर 2026। बिहार की समृद्ध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक विरासत को आधुनिक विकास की शक्ति में परिवर्तित करने तथा विकसित भारत @ 2047 के लक्ष्य में बिहार की प्रभावी भूमिका सुनिश्चित करने को लेकर रविवार को राजधानी पटना में गंभीर और व्यापक विचार-विमर्श हुआ। भारत विकास परिषद, दक्षिण बिहार प्रांत की ओर से ए.एन. सिन्हा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल स्टडीज, गांधी मैदान, पटना में “गौरवशाली बिहार–विरासत से विकास, विकसित बिहार–विकसित भारत @ 2047 में युवाओं की भूमिका” विषय पर कार्यशाला, संवाद एवं विचार-विमर्श कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

कार्यक्रम में न्याय, शिक्षा, प्रशासन, पुलिस, इंजीनियरिंग, उद्योग-व्यवसाय, सामाजिक सेवा और स्वयंसेवी संगठनों सहित विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े लगभग 70 प्रबुद्ध नागरिकों एवं विशेषज्ञों ने भाग लिया। आयोजन का उद्देश्य केवल बिहार के गौरवशाली अतीत की चर्चा करना नहीं, बल्कि उसकी ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक चेतना, ऐतिहासिक उपलब्धियों और सामाजिक विरासत को वर्तमान समय की विकास आवश्यकताओं से जोड़ने के संभावित मार्गों पर विचार करना था।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि भारत विकास परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल थे। न्यायमूर्ति गोयल राष्ट्रीय हरित अधिकरण के पूर्व अध्यक्ष भी रह चुके हैं। उन्होंने अपने संबोधन तथा प्रतिभागियों के साथ हुए संवाद के दौरान बिहार की प्राचीन ज्ञान-परंपरा और सांस्कृतिक विरासत के महत्व को रेखांकित किया।

उन्होंने कहा कि बिहार का इतिहास केवल अतीत की गौरवगाथा नहीं है, बल्कि उसमें वर्तमान और भविष्य के निर्माण के लिए भी अनेक प्रेरणास्रोत मौजूद हैं। नालंदा और विक्रमशिला जैसी विश्वप्रसिद्ध ज्ञान परंपराएं बिहार की बौद्धिक विरासत की पहचान रही हैं। इसी धरती ने आर्यभट्ट जैसे महान विद्वान को जन्म दिया और ज्ञान, चिंतन, आध्यात्मिकता तथा सामाजिक चेतना की ऐसी परंपराओं को विकसित किया, जिनका प्रभाव भारत की सीमाओं से बाहर तक रहा।

संवाद के दौरान इस बात पर भी चर्चा हुई कि बिहार की विरासत को केवल स्मारकों, ऐतिहासिक स्थलों अथवा पुस्तकों तक सीमित रखने के बजाय उसे शिक्षा, पर्यटन, अनुसंधान, संस्कृति, कौशल विकास, उद्यमिता और युवा नेतृत्व जैसे क्षेत्रों से जोड़ा जा सकता है। विरासत के संरक्षण के साथ-साथ उससे नए अवसरों का सृजन कैसे हो, इस दिशा में भी प्रतिभागियों ने अपने विचार साझा किए।

कार्यशाला में “विरासत से विकास” की अवधारणा को व्यापक संदर्भ में देखा गया। बिहार के प्राचीन विश्वविद्यालयों, वैज्ञानिक परंपरा, साहित्य, लोकसंस्कृति, कला, स्थापत्य, आध्यात्मिक केंद्रों, ऐतिहासिक स्थलों और सामाजिक चेतना को आधुनिक तकनीक तथा नवाचार से जोड़ने की संभावनाओं पर विमर्श हुआ। प्रतिभागियों ने इस बात पर जोर दिया कि बिहार की पहचान केवल उसके अतीत से नहीं, बल्कि उस विरासत को भविष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप विकसित करने की क्षमता से भी निर्धारित होगी।

कार्यक्रम में युवाओं की भूमिका को विशेष महत्व दिया गया। विकसित भारत @ 2047 के लक्ष्य की चर्चा करते हुए यह विचार सामने आया कि देश और बिहार के भविष्य के निर्माण में युवा पीढ़ी की भागीदारी निर्णायक होगी। युवाओं को अपनी ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने के साथ-साथ उन्हें आधुनिक शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, कौशल, उद्यमिता और सामाजिक उत्तरदायित्व के क्षेत्र में आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर बल दिया गया।

कार्यक्रम में उपस्थित अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत भारत विकास परिषद की क्षेत्रीय अध्यक्षा श्रीमती सुमन सिंह ने किया। उन्होंने आयोजन की विषयवस्तु की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बिहार की विरासत को विकास की प्रक्रिया से जोड़ने के लिए समाज के विभिन्न वर्गों के बीच निरंतर संवाद आवश्यक है। उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों की सहभागिता को इस प्रकार के विमर्श के लिए महत्वपूर्ण बताया।

कार्यशाला के विषय की भूमिका प्रो. अनिल कुमार ने प्रस्तुत की। उन्होंने विकसित भारत @ 2047 के संदर्भ में बिहार की संभावित भूमिका और आगे की कार्ययोजना पर अपने विचार रखे। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि बिहार के विकास के लिए उसकी अपनी विशिष्ट ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए दीर्घकालिक सोच विकसित करने की आवश्यकता है।

विचार-विमर्श के दौरान प्रतिभागियों ने बिहार की ऐतिहासिक उपलब्धियों और वर्तमान चुनौतियों के बीच संबंध स्थापित करते हुए विभिन्न सुझाव भी सामने रखे। शिक्षा और ज्ञान-विज्ञान की पुरानी परंपराओं को आधुनिक शोध से जोड़ना, ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक स्थलों को बेहतर ढंग से विकसित करना, युवाओं में बिहार की विरासत के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा स्थानीय प्रतिभाओं और उद्यमशीलता को प्रोत्साहित करना जैसे विषय चर्चा के केंद्र में रहे।

कार्यक्रम का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी रहा कि इसमें अलग-अलग पेशे और सामाजिक क्षेत्रों से जुड़े लोगों को एक मंच पर संवाद का अवसर मिला। न्यायपालिका, प्रशासन, पुलिस, शिक्षा, इंजीनियरिंग, व्यवसाय और सामाजिक सेवा से जुड़े प्रतिभागियों की मौजूदगी ने विमर्श को बहुआयामी स्वरूप प्रदान किया। इससे बिहार के विकास को केवल सरकारी प्रयासों तक सीमित न रखकर समाज की सामूहिक भागीदारी से जोड़ने की आवश्यकता पर भी बल मिला।

कार्यक्रम के अंत में भारत विकास परिषद, पूर्वी क्षेत्र के क्षेत्रीय महासचिव डॉ. बाल्मीकि प्रसाद ने धन्यवाद ज्ञापन किया। उन्होंने मुख्य अतिथि न्यायमूर्ति आदर्श कुमार गोयल, विभिन्न क्षेत्रों से आए विशेषज्ञों, परिषद के पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं तथा सभी प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि कार्यक्रम के दौरान सामने आए विचारों को आगे भी निरंतर विमर्श और कार्ययोजना से जोड़ने का प्रयास किया जाएगा, ताकि संवाद केवल एक आयोजन तक सीमित न रहकर व्यापक सामाजिक पहल का आधार बन सके।

उन्होंने कहा कि बिहार की गौरवशाली विरासत को वर्तमान पीढ़ी तक पहुंचाना और उसे भविष्य की विकास यात्रा से जोड़ना सामूहिक जिम्मेदारी है। इतिहास से प्रेरणा लेकर वर्तमान की आवश्यकताओं को समझते हुए भविष्य के लिए ठोस दिशा तैयार करना ही इस प्रकार के संवादों की सार्थकता है।

कार्यक्रम को सफल बनाने में भारत विकास परिषद के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं की सक्रिय भूमिका रही। आयोजन एवं समन्वय में डॉ. बाल्मीकि कुमार, श्री उमेश कुमार विद्यार्थी, डॉ. सत्य प्रकाश तिवारी, श्री मुकेश कुमार, श्रीमती सुमन सिंह, प्रो. अनिल कुमार, श्री तोषण मैतिन, श्री अमित बैट्स, श्री जे.के. सिन्हा, श्रीमती डॉली सिंह, श्रीमती इंदु सिंघासानिया, श्रीमती मीनाक्षी स्वराज, श्री संजय, श्री राजेश, डॉ. मनोज, डॉ. बालकृष्ण सहाय सहित परिषद के अनेक पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता सक्रिय रहे।

इसके अतिरिक्त सत्यं, गार्गी और शास्त्रीनगर शाखाओं के पदाधिकारियों एवं स्वयंसेवकों ने भी आयोजन में सहयोग प्रदान किया। सभी के सामूहिक प्रयास से कार्यक्रम सफलतापूर्वक संपन्न हुआ।कार्यशाला से यह संदेश उभरकर सामने आया कि बिहार की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक विरासत को केवल गौरव के विषय के रूप में देखने के बजाय उसे ज्ञान, शिक्षा, शोध, पर्यटन, कौशल, युवा शक्ति और सामाजिक विकास से जोड़कर भविष्य की संभावनाओं का आधार बनाया जा सकता है। “विरासत से विकास” की अवधारणा इसी सोच को आगे बढ़ाने का एक प्रयास है, जिसमें अतीत की उपलब्धियों से प्रेरणा लेकर वर्तमान की आवश्यकताओं और भविष्य के लक्ष्यों के बीच एक सार्थक सेतु बनाने पर जोर दिया गया।
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