इश्क़ की पराकाष्ठा
डॉ अ कीर्ति वर्द्धनइश्क़ की पराकाष्ठा, ‘मैं’ का ख़त्म होना,
तुम ‘हम’ बन गयी, तो मैं भी कब ‘मैं’ रहा।
मिट गया वजूद, सब ‘हम’ में सिमट गया,
हम भी कब ‘हम’ रहे, हम भी निपट गया।
प्रथम दृष्टया देखकर, जिसकी बढ़ती चाह,
प्रेम की पराकाष्ठा, नैन ढूँढते नैनों में थाह।
प्रेम तो अहसास है, बिके कभी न हाट,
रिश्तों का आधार है, टूटे फिर भी आस।
ढूँढिए मुझमें, क्या ढूँढना है आपको,
प्यार की पराकाष्ठा, जाँचना है आपको।
जानिए खुद की वफ़ा को, आप पहले,
गर मेरी वफ़ा को, जानना है आपको।
झूठे भिलनी बेर खा, पुलकित होते राम,
प्रेम की पराकाष्ठा, तब दर्शाते राम।
भेजो पाती प्रेम की, बिना लिखे कुछ बात,
गिरधर भूखे प्रेम के, समझें बस जज्बात।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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