Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

गया जी में पितृपक्ष का महात्म्य

गया जी में पितृपक्ष का महात्म्य

  • पितरों के प्रति श्रद्धा, कृतज्ञता और मोक्ष की सनातन परंपरा

डॉ. अनमोल कुमार
गया जी को पितरों की मोक्ष-भूमि कहा जाता है। पुराणों के अनुसार यहाँ स्वयं भगवान विष्णु पितृ-रूप में निवास करते हैं।

गया का इतना महत्त्व क्यों है?

विष्णु के चरण: यहाँ फल्गु नदी के किनारे विष्णुपद मंदिर है, जहाँ भगवान विष्णु के चरण-चिन्ह हैं। मान्यता है कि यहाँ पिंडदान करने से पितरों को सीधे विष्णु लोक प्राप्त होता है।

गयासुर की कथा:एक राक्षस गयासुर ने कठोर तपस्या कर वरदान माँगा कि उसके दर्शन मात्र से लोगों को मोक्ष मिल जाए। देवताओं के कहने पर भगवान विष्णु ने उसे अपनी गदा से दबाकर इस भूमि को पवित्र किया। इसलिए इस नगर का नाम गया पड़ा और वरदान दिया कि यहाँ जो भी श्राद्ध करेगा उसके पितर मुक्त हो जाएँगे।

फल्गु नदी और अक्षयवट: गया में फल्गु नदी के तट और अक्षयवट के नीचे किया गया पिंडदान कभी निष्फल नहीं जाता। अक्षयवट वह बरगद है जो कभी नष्ट नहीं होता।

पितृपक्ष में विशेष फल:साल भर तो यहाँ पिंडदान होता ही है, पर पितृपक्ष के 16 दिनों में इसका फल 100 गुना बढ़ जाता है। इस दौरान लाखों लोग देश-विदेश से यहाँ आते हैं। कहा जाता है - _"गया में श्राद्ध करने के बाद फिर श्राद्ध करने की आवश्यकता नहीं रहती।"_

जगह पिंडदान अनिवार्य माना जाता है:

1. फल्गु नदी पर

2. विष्णुपद मंदिर में

3. अक्षयवट के नीचे

इसलिए पितृपक्ष में गया जी में पिंडदान करना पितरों के लिए अंतिम मुक्ति का द्वार माना जाता है।

हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ