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"अज्ञात के सम्मुख मैं"

"अज्ञात के सम्मुख मैं"

पंकज शर्मा
जब विषाद
अंतरतम की देहरी तक
आ पहुँचता है,
मैं किसी देववाणी की प्रतीक्षा नहीं करता—
अपने भीतर
एक प्रश्न की तरह
उतरता हूँ।


कौन हूँ मैं,
जो अपने ही जीवन को
दूर खड़े होकर देखता है?
यह देह मेरी है,
या मैं केवल
इस क्षण का एक
अनाम साक्षी हूँ?
उत्तर आता नहीं—
संशय ही
मेरे साथ बैठा रहता है।


मैं अपने भीतर
जितना गहरा जाता हूँ,
उतना ही
स्वयं से अपरिचित होता जाता हूँ।
जिसे कल सत्य समझा था,
आज उसकी सीमाएँ दिखती हैं;
शायद सत्य
कोई निष्कर्ष नहीं,
बल्कि निरंतर खुलता हुआ
एक प्रश्न है।


मेरे भय,
मेरी आकांक्षाएँ,
मेरी असफलताएँ—
सब अपने-अपने भार से
मुझे बाँधना चाहते हैं।
मैं उन्हें पकड़ना छोड़ देता हूँ।
जो छूट सकता है,
वह मेरा था ही कहाँ?
और जो सचमुच मेरा है,
उसे थामने की आवश्यकता क्यों?


फिर एक क्षण
ऐसा आता है
जब भीतर
न सुख बचता है,
न दुःख;
न पाने की आकांक्षा,
न खोने का भय।
केवल चेतना की
एक निर्वाक उपस्थिति—
जो किसी प्रमाण के बिना
अपने होने को
स्वीकार कर लेती है।


मैं नहीं जानता
इस अस्तित्व का आदि क्या है,
न यह कि अंत के पार
कुछ है भी या नहीं।
पर इतना जानता हूँ—
अज्ञात के सम्मुख खड़ा होकर भी
मैं अपने होने से
विमुख नहीं हूँ।
शायद यही
मनुष्य होने का सबसे गहरा रहस्य है—
उत्तरहीन रहकर भी
जीवन के पक्ष में
खड़ा रहना।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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