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"मौन का सत्य"

"मौन का सत्य"

पंकज शर्मा
शब्द मुखर होते हैं,
अर्थ मौन रहता है;
ध्वनि बाहर बहती है,
सत्य भीतर रहता है।


आलोचना जब निर्मल हो,
दर्पण बन जाती है;
चेहरे से अधिक तब,
अंतर को दिखलाती है।


हर कथन के पीछे
एक अनकहा सत्य है;
जिसे सुनने के लिए
मौन ही श्रेयस्कर है।


सत्य कभी चिल्लाता नहीं,
स्वयं को नहीं जताता;
मौन की गहरी तह में
धीरे-धीरे मुस्काता।


जो मौन को रिक्त समझे,
अर्थ कहाँ वह पाए;
शब्दों के कोलाहल में
सत्य दूर हो जाए।


आलोचना का सौंदर्य
कहने में नहीं रहता;
जो मौन जगा दे भीतर—
वही सत्य कहता है।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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