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जब भगवान विष्णु को एक कमल कम मिला...

जब भगवान विष्णु को एक कमल कम मिला...

लेखक आनंद हठिला
तब उन्होंने ऐसा निर्णय लिया जिसने स्वयं भगवान शिव को तत्काल प्रकट होने पर विवश कर दिया...

जब अधर्म का अंधकार तीनों लोकों पर छाने लगा, दैत्यों के अत्याचार से देवता भी भयभीत हो उठे। अनेक प्रयासों के बाद भी उन्हें कहीं आशा की किरण दिखाई नहीं दी। अंततः सभी देवता भगवान विष्णु की शरण में पहुँचे।

किन्तु उस दिन स्वयं भगवान विष्णु ने ऐसा मार्ग चुना, जिसने संसार को सच्ची भक्ति और पूर्ण समर्पण का अमर उदाहरण दे दिया।

आइए जानते हैं श्री शिव महापुराण की यह प्रेरणादायक कथा।

दैत्यों का बल दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा था। यज्ञ बाधित हो रहे थे, ऋषि-मुनियों का तप अशांत हो चुका था और देवताओं का तेज भी क्षीण पड़ने लगा था। तब सभी देवताओं ने भगवान विष्णु से अपनी रक्षा की प्रार्थना की। भगवान विष्णु ने उन्हें आश्वस्त किया और भगवान शिव की आराधना करने का संकल्प लिया।


इसी संकल्प के साथ भगवान विष्णु कैलास के समीप स्थित पवित्र हरीश्वरलिङ्ग के दर्शन हेतु पहुँचे। उन्होंने शास्त्रविहित विधि से हरीश्वरलिङ्ग की आराधना आरम्भ की। यज्ञाग्नि प्रज्वलित हुई, वैदिक मंत्रों का घोष होने लगा और सम्पूर्ण वातावरण शिवमय हो उठा।


भगवान विष्णु ने दीर्घकाल तक हरीश्वरलिङ्ग की आराधना, मंत्रजप और स्तुति की, किन्तु भगवान शिव प्रकट नहीं हुए। तब उन्होंने शिवसहस्रनाम का पाठ आरम्भ किया और प्रत्येक नाम के साथ एक-एक कमल भगवान शिव को अर्पित करने लगे। एक-एक नाम के साथ एक-एक कमल अर्पित होता गया, पर उनकी एकाग्रता और श्रद्धा तनिक भी विचलित नहीं हुई।


उधर भगवान शिव शांत भाव से अपने परम भक्त की आराधना को निहार रहे थे।


भगवान शिव ने अपने परम भक्त की अटल निष्ठा की परीक्षा लेने के लिए एक कमल अपनी माया से अदृश्य कर दिया।


जब अंतिम नाम का उच्चारण हुआ और अंतिम कमल अर्पित करने का समय आया, तब भगवान विष्णु ने देखा कि एक कमल कम है।


उन्होंने उस अंतिम कमल को बहुत खोजा, किन्तु वह कहीं नहीं मिला। क्षणभर के लिए समय मानो ठहर गया। यदि अंतिम अर्पण अधूरा रह गया, तो उनका सहस्रनाम-पूजन भी अपूर्ण रह जाएगा।


तभी भगवान विष्णु को स्मरण हुआ कि संसार उन्हें 'कमलनयन' कहकर पुकारता है।


उन्होंने बिना किसी संकोच के निश्चय किया—यदि कमल उपलब्ध नहीं है, तो अपना ही नेत्र भगवान शिव को कमल के रूप में अर्पित कर दूँगा। उनके लिए अपना नेत्र भी तुच्छ था, परन्तु भगवान शिव की आराधना अधूरी रह जाए, यह उन्हें स्वीकार नहीं था।


जैसे ही भगवान विष्णु अपना नेत्र अर्पित करने लगे, उसी क्षण सम्पूर्ण दिशाएँ दिव्य प्रकाश से आलोकित हो उठीं।


भगवान शिव स्वयं उनके सामने प्रकट हो गए।


महादेव ने भगवान विष्णु की भक्ति, अडिग श्रद्धा और पूर्ण समर्पण से प्रसन्न होकर उन्हें रोक लिया। उन्होंने कहा कि उनकी भक्ति से वे अत्यंत संतुष्ट हैं और उनसे वर माँगने को कहा।


भगवान विष्णु ने अपने लिए कुछ नहीं माँगा। उन्होंने विनम्रता पूर्वक निवेदन किया कि दैत्यों के अत्याचार से देवता और समस्त लोक अत्यंत पीड़ित हैं। उनके अस्त्र भी उन दैत्यों का अंत करने में असमर्थ हो रहे हैं। अतः धर्म की रक्षा के लिए उन्हें ऐसा दिव्य अस्त्र प्रदान किया जाए, जिससे अधर्म का नाश हो सके।


भगवान शिव ने प्रसन्न होकर भगवान विष्णु को दिव्य सुदर्शन चक्र प्रदान किया। वह चक्र अद्भुत तेज से प्रकाशित था और अधर्म का विनाश करने में समर्थ था।


सुदर्शन चक्र प्राप्त करने के बाद भगवान विष्णु ने दैत्यों का संहार किया। देवताओं का भय समाप्त हुआ, धर्म की पुनः स्थापना हुई और तीनों लोकों में शांति लौट आई।


तभी से यह प्रसंग भगवान विष्णु की अनन्य शिवभक्ति, अटूट श्रद्धा और पूर्ण समर्पण के दिव्य उदाहरण के रूप में स्मरण किया जाता है।


विपरीत परिस्थितियाँ मनुष्य के धैर्य और विश्वास की परीक्षा लेती हैं। जो कठिन समय में भी अपने संकल्प और श्रद्धा से नहीं डिगता, उसके लिए असंभव प्रतीत होने वाले मार्ग भी ईश्वर स्वयं प्रशस्त कर देते हैं।


📚 ग्रंथ-संदर्भ :


श्री शिव महापुराण — कोटिरुद्र संहिता


यह प्रसंग श्री शिव महापुराण की कोटिरुद्र संहिता में वर्णित भगवान विष्णु द्वारा भगवान शिव के हरीश्वरलिङ्ग की आराधना, उनकी भक्ति की परीक्षा तथा भगवान शिव से सुदर्शन चक्र प्राप्त करने की कथा पर आधारित है। विभिन्न संस्करणों में नामों, शब्दों और विवरणों में कुछ भिन्नता संभव है। प्रस्तुत चित्र केवल भावात्मक एवं कलात्मक प्रस्तुति है। इसका उद्देश्य प्रसंग का दृश्यात्मक अनुभव कराना है, न कि वास्तविक स्वरूप का सटीक चित्रण।

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