दिमागी नक्सलवादियों की पहचान क्या है ?
डॉ राकेश कुमार आर्य
हमारे देश के प्रधानमंत्री मोदी जी ने लालकिले की प्राचीर से 'दिमागी नक्सलवाद ' का उल्लेख कर एक नई बहस को जन्म दे दिया है। इस पर आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल , कांग्रेस के पवन खेड़ा, पी चिदंबरम, दिग्विजय सिंह सहित अनेक विपक्षी नेताओं को मिर्ची लग गई है। 'चोर की दाढ़ी में तिनका ' वाली कहावत को सिद्ध करते हुए कई लोग अपने आप ही कहने लगे हैं कि मैं भी ' दिमागी नक्सलवादी हूं।' अब प्रश्न यह है कि प्रधानमंत्री श्री मोदी ने दिमागी नक्सलवादी कहा किसके लिए है ? इनकी पहचान बड़ी सरल है जब आपको टीवी चैनलों पर टुकड़े-टुकड़े गैंग का समर्थन करते हुए कुछ पैनलिस्ट दिखाई दें या आतंकवादियों को 'भटके हुए नौजवान ' कहकर उनका समर्थन या बचाव करते हुए दिखाई दें या देश में घटित होने वाली आतंकी घटनाओं में सम्मिलित किसी अपराधी का यह कहकर बचाव करते हुए दिखाई दें कि अभी यह व्यक्ति कोर्ट के द्वारा अपराधी सिद्ध नहीं हुआ है , इसलिए इसको पहले ही आतंकवादी कहना ठीक नहीं है या भारतीय संस्कृति को रूढ़िवादी कहकर उसका मजाक उड़ाते हुए दिखाई दें, सनातन को बदनाम करते हुए या सनातन के देवी देवताओं का मजाक उड़ाते हुए दिखाई दें या उपनिषदों और वेदों को रूढ़िवादी सनातनी हिंदुओं की मूर्खतापूर्ण बातों से भरी हुई ' किताब ' कहते हुए दिखाई दें या रामायण और महाभारत को महाकाव्य कहकर उनकी बातों को काल्पनिक कहकर हिंदू आस्था को नीलाम करते हुए दिखाई दें, गंगा जमुनी संस्कृति के नाम पर भारत की पवित्र सनातन परंपरा को उपेक्षित करते हुए दिखाई दें या भारत के हिंदू इतिहास को कूड़ेदान में फेंक कर प्रगतिशीलता के नाम पर मुगलों के इतिहास को सुंदरता से पेश करते हुए दिखाई दें या धर्मनिरपेक्षता और तुष्टीकरण के नाम पर हिंदू की उपेक्षा और मुस्लिम को गले लगाने की बात करते हुए दिखाई दें या हिंदू त्योहारों को फूहड़पन का प्रतीक कहते हुए दिखाई दें और अन्य अल्पसंख्यकों के धार्मिक सामाजिक त्योहारों को प्रगतिशीलता ,भाईचारे और शांति को बढ़ावा देने वाले कहते हुए दिखाई दें तब आप समझ लेना कि जिससे आपका पाला पड़ा है वह दिमागी नक्सलवादी है।
यही वह लोग होते हैं जो हथियार लेकर लड़ने वाले लोगों को पीछे से अपना बौद्धिक समर्थन देकर उन्हें समाज और देश की नजरों में नैतिक और न्यायशील सिद्ध करने का राष्ट्रद्रोही कृत्य करते हैं। जो लोग कानून के शिकंजे में फंस जाते हैं उनका ये 'कपिल सिब्बल' बनकर बचाव करते हैं। रात को न्यायालय के दरवाजे खटखटाते हैं और आपातस्थिति में न्यायालय को बैठने के लिए बाध्य करते हैं। यही वे लोग हैं जो किसी आतंकवादी के मरने पर छाती पीटते हैं और रात-रातभर सोते नहीं हैं। यह भारत माता को ' डायन ' कहने वालों का भाषण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की दुहाई देकर बचाव करते हैं। कश्मीर जैसे संवेदनशील प्रांत से हिंदुओं को थोक के भाव भगाने वालों को यह भटका हुआ नौजवान कहते हैं। हमारे सैनिकों पर पत्थरबाजी करने वाले लोगों को भी यह उनकी भूख की दुहाई देकर बचाने का प्रयास करते हैं।
हमें ध्यान रखना चाहिए कि आतंकवादियों के हाथों में हथियार होते हैं जिसके कारण उन्हें आसानी से पहचान लिया जाता है। परंतु दिमागी नक्सलवादी इतनी आसानी से नहीं पहचाने जाते उनके चेहरे चिकने चुपड़े होते हैं। उनके शब्दों का संतुलन ऐसा होता है जिससे आम आदमी धोखा खा जाता है। वास्तव में देश के आम नागरिक को धोखा देकर भ्रमित करना ही इनका उद्देश्य होता है। इसी से यह मैदान में लड़ने वाले वास्तविक नक्सलवादी का बचाव करने का प्रयास करते हैं। पीछे से हथियार वाला नक्सलवादी और दिमागी नक्सलवादी एक होते हैं, परंतु फ्रंट पर आकर दोनों का काम बदल जाता है। कई दिमागी नक्सलवादी आपको ऐसे मिलेंगे जो 40- 45 वर्ष की अवस्था में भी अपने आप को जेएनयू का स्टूडेंट कहते हैं। बताते हैं कि मैं यहां से अमुक विषय में पीएचडी कर रहा हूं। परंतु वास्तव में वह किसी विषय पर पीएचडी नहीं कर रहे होते, वह देश तोड़ने पर पीएचडी कर रहे होते हैं। ये चेहरे पर शांति के, गंभीरता के और दार्शनिकता के भाव लाने में भी कई बार सफल हो जाते हैं। जिससे आगे वाले को भ्रांति हो जाती है कि वास्तव में इनका दिमाग पहुंचा हुआ दिमाग है। जबकि सच यह है कि इनका दिमाग हमेशा शैतानी की हरकतों के बारे में ही सोचता रहता है। यह राष्ट्रद्रोही लोगों की सर्वथा निंदनीय हरकतों को भी राष्ट्रहित में किया गया नेक कार्य सिद्ध करने में सफल हो जाते हैं।
दिमागी नक्सली देश के आम नागरिकों की पवित्र सोच, उत्कृष्ट देशभक्ति और उनके आत्मसम्मान को मारने का काम करते रहते हैं। आपने शाहीन बाग को देखा, उस समय सरकार ने उन विदेशी घुसपैठियों के लिए एनआरसी और सीएए लागू किया था जो देश में आग लगाने का काम कर रहे थे। तब इन्होंने शाहीन बाग करा दिया था। शाहीन बाग के क्षेत्र के लोगों के पास उनके मकान की भूमि के विक्रयपत्रों के कागजात नहीं हैं । क्योंकि यह भूमि 1978 से पहले उत्तर प्रदेश की भूमि हुआ करती थी। 1978 की बाढ़ के बाद यह भूमि दिल्ली की तरफ चली गई, जो वीरान पड़ी रही। तब इस पर शाहीन बाग में रहने वालों ने अवैध कब्जा कर करके अपने मकान बना लिए। इस क्षेत्र में बस रहे लोगों को यह कहकर भ्रमित किया गया कि मोदी सरकार तुमसे इस जमीन के कागज देखना चाहती है। इसी प्रकार इन्होंने फर्जी किसानों को सड़कों पर उतारा। प्रधानमंत्री मोदी को पंजाब में मरवाने के लिए जाल बिछाया। प्रधानमंत्री के लिए अभद्र शब्दों का प्रयोग करने के लिए युवा वर्ग को उकसाया। लड़कियों से भी मोदी जी को गंदी-गंदी गालियां दिलवाईं।
इन दिमागी नक्सलियों का समूल विनाश करने के लिए शिक्षा नीति में आमूल चूल परिवर्तन करने की आवश्यकता है। केवल दिमागी नक्सली कह देने से काम नहीं चलेगा। इनको जहां से खुराक मिल रही है, खुराक के उस स्रोत को बंद करना होगा। यह खुराक इनको वर्तमान शिक्षा नीति से मिल रही है और जेएनयू जैसी उन सभी संस्थाओं से मिल रही है जो भारत विरोध के लिए जानी जाती हैं, जिनकी नींव ही भारत विरोध के लिए रखी गई थी। इनमें वे सारे मदरसे भी सम्मिलित हैं जिनमें एक मजहब विशेष की शिक्षा दी जाती है और उन सारी बातों को जायज घोषित किया जाता है जो काफिरों को मारने काटने की शिक्षा देती हैं। एक समान शिक्षा देश की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस शिक्षा में भी सनातन की उन मानवतावादी शिक्षाओं को स्थान दिया जाना आवश्यक है जो मनुष्य को मनुष्य से जोड़ने का काम करती हैं। किसी भी बड़ी सेना को पराजित करने के लिए उसकी सप्लाई काटना आवश्यक होता है। जब तक पीछे से सप्लाई आती रहती है तब तक किसी सेना को पराजित नहीं किया जा सकता।
( लेखक डॉ राकेश कुमार आर्य सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं )
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