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खुद ही मारते हैं, और मरने भी नहीं देते,

खुद ही मारते हैं, और मरने भी नहीं देते,

रूलाते भी हैं खुद ही, रोने भी नहीं देते।


कैसा दौर आया है, बेरूखी का उनकी,
बड़े जालिम सनम हैं, सोने भी नहीं देते।


सताते हैं इस कदर, आहें भर के रह जाते,
तन्हा हैं हम मगर, तन्हां होने भी नहीं देते।


चाहा था कभी हमने, मिटाना वुजूद ही अपना,
निगाहें हर कदम उनकी, मिटोने भी नहीं देते।


उनके इश्क का आलम, कुछ अलग सा है,
आँसुओं से आँख को, भिगोने भी नहीं देते।


सता कर हमको खुद भी, तन्हा आँसू बहाते,
दर्द अपने दिल का वह, संजोने भी नहीं देते।

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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