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हो गये वर्ष उन्तालिस

हो गये वर्ष उन्तालिस, साथ चलते- लडते झगडते,

बीते उम्र यूँ नौक झौंक में, कुछ लड़ते ज्यादा हँसते।
रहो उम्र भर युवा, तुम स्वस्थ रहकर मुस्कुराती रहो,
चलते रहें संग, परिवार बगिया को निरखते निरखते।

तुमसे ही तो प्यार पुष्प, अपनी बगिया में खिल पाये,
तुमसे ही रिश्ते- नातों के, नये समीकरण जुड़ पाये।
माना विचार नहीं मिलते, दो ध्रुव बन हम दोनों रहते,
यह भी सच है एक दुजे बिन, कभी नहीं हम रह पाये।

मुझको पड़ी तुम्हारी आदत, तुम बिन घर सूना लगता,
पूर्ण समर्पण करना तेरा, घर जिस कारण घर बनता।
घर के सारे काम खत्म कर, तुम देर रात तक सोती हो,
जल्दी उठकर पूजा करती, पूजा से घर मन्दिर बनता।

जन्म दिवस के शुभ अवसर, यही कामना है हमारी,
इच्छाएँ जो भी हों मन में, सब पूरी हों जायें तुम्हारी।
दुःख सुख जीवन के दो पहलू, दोनों को जी भर जीयें,
तुम जीवन की नैया मेरे, मैं बना रहूँ पतवार तुम्हारी।।

डॉ अ कीर्ति वर्धन
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