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आजादी बिना खड्ग बिना ढाल नहीं मिली, यह करोड़ों बलिदानों का परिणाम थी

आजादी बिना खड्ग बिना ढाल नहीं मिली, यह करोड़ों बलिदानों का परिणाम थी

लेखक : डॉ. राकेश दत्त मिश्र

हर वर्ष 15 अगस्त आता है। तिरंगा आसमान में लहराता है, राष्ट्रगान गूंजता है, विद्यालयों में बच्चे स्वतंत्रता सेनानियों की गाथाएं सुनाते हैं और देशभक्ति के गीत वातावरण को भावविभोर कर देते हैं। इन्हीं गीतों में एक गीत बचपन से हमारे कानों में पड़ता आया है—

"दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल,
साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल।"

गीत सुंदर है, भावपूर्ण है और महात्मा गांधी के अहिंसात्मक संघर्ष के प्रति सम्मान व्यक्त करता है। लेकिन क्या भारत की स्वतंत्रता का पूरा इतिहास वास्तव में इतना ही सरल था कि एक संत ने बिना तलवार और बिना ढाल के अंग्रेजों से आजादी प्राप्त कर ली?

इतिहास का ईमानदार उत्तर है-नहीं।

महात्मा गांधी का योगदान असाधारण था। उनके सत्याग्रह, अहिंसा, असहयोग, सविनय अवज्ञा और भारत छोड़ो आंदोलन ने ब्रिटिश शासन की नैतिक और राजनीतिक नींव को गहरी चुनौती दी। लेकिन भारत की स्वतंत्रता किसी एक व्यक्ति, एक आंदोलन या एक विचारधारा की देन नहीं थी।

भारत की आजादी एक ऐसी महान ऐतिहासिक यात्रा का परिणाम थी जिसमें हजारों ज्ञात-अज्ञात लोगों ने अपने प्राणों की आहुति दी, लाखों लोगों ने जेलें भरीं, करोड़ों भारतीयों ने आर्थिक और सामाजिक कष्ट सहे और अनेक धाराओं ने मिलकर ब्रिटिश साम्राज्य को यह एहसास करा दिया कि भारत पर अनंत काल तक शासन करना संभव नहीं है।

इसलिए स्वतंत्रता दिवस पर हमें केवल यह नहीं पूछना चाहिए कि आजादी किसने दिलाई?

हमें यह पूछना चाहिए-

आजादी के लिए किस-किस ने अपना सर्वस्व न्योछावर किया?


1857 से पहले भी प्रतिरोध की लंबी परंपरा

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को केवल 1857 से शुरू करना भी इतिहास को छोटा कर देना होगा। अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध भारत के विभिन्न क्षेत्रों में समय-समय पर अनेक विद्रोह हुए। संन्यासी विद्रोह, पाइक विद्रोह, संथाल विद्रोह, कोल विद्रोह, दक्षिण और पश्चिम भारत के अनेक स्थानीय प्रतिरोध तथा विभिन्न किसान और आदिवासी आंदोलनों ने ब्रिटिश सत्ता को लगातार चुनौती दी।

लेकिन 1857 का विद्रोह उस प्रतिरोध की सबसे व्यापक और विस्फोटक अभिव्यक्तियों में से एक था।

मेरठ से उठी चिंगारी देखते ही देखते दिल्ली, कानपुर, झांसी, अवध, बिहार और देश के अनेक हिस्सों तक पहुंच गई।

यह केवल सैनिक असंतोष नहीं था। इसके भीतर अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध व्यापक असंतोष, राजनीतिक स्वाभिमान, धार्मिक-सामाजिक आशंकाएं और विदेशी शासन से मुक्ति की आकांक्षा एक साथ दिखाई देती है।


मंगल पांडे से लेकर कुंवर सिंह तक

1857 की क्रांति की चर्चा मंगल पांडे के बिना अधूरी है।

मंगल पांडे ने अंग्रेजी सैन्य व्यवस्था के भीतर विद्रोह की वह चिंगारी दिखाई जिसने आगे चलकर एक बड़े विस्फोट का रूप लिया।

दिल्ली में बहादुर शाह जफर प्रतीकात्मक नेतृत्व के केंद्र बने। कानपुर में नाना साहेब और तात्या टोपे ने अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया। अवध में बेगम हजरत महल ने प्रतिरोध का नेतृत्व किया।

और झांसी में एक ऐसी वीरांगना सामने आई जिसकी तलवार आज भी भारतीय स्वाभिमान का प्रतीक है—

रानी लक्ष्मीबाई।

"मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी" की भावना भारतीय इतिहास में स्त्री-शक्ति, साहस और आत्मसम्मान की अमिट पहचान बन गई।

रानी लक्ष्मीबाई केवल झांसी की रानी नहीं थीं। वह उस भारत की प्रतीक बन गईं जिसने विदेशी सत्ता के सामने झुकने से इनकार कर दिया।


बिहार की धरती और वीर कुंवर सिंह

जब 1857 की क्रांति की बात होती है तो बिहार के महान योद्धा वीर बाबू कुंवर सिंह का स्मरण अनिवार्य है।

लगभग अस्सी वर्ष की आयु में उन्होंने अंग्रेजों के विरुद्ध हथियार उठाए। यह अपने आप में असाधारण था।

जिस उम्र में सामान्यतः व्यक्ति विश्राम की तलाश करता है, उस उम्र में कुंवर सिंह रणभूमि में उतर गए।

उनका जीवन हमें बताता है कि स्वतंत्रता की कोई आयु नहीं होती और राष्ट्र के सम्मान की कोई कीमत नहीं होती।

बिहार की धरती ने केवल कुंवर सिंह ही नहीं दिए। इस प्रदेश ने स्वतंत्रता आंदोलन में अनेक सेनानियों, क्रांतिकारियों और जननायकों को जन्म दिया जिन्होंने देश की आजादी के लिए अपना जीवन समर्पित किया।


जलियांवाला बाग - अंग्रेजी शासन का खूनी चेहरा

13 अप्रैल 1919।

अमृतसर का जलियांवाला बाग।

बैसाखी का दिन।

निहत्थे लोग।

और जनरल डायर के आदेश पर गोलियों की बौछार।

सैकड़ों लोग मारे गए। हजारों घायल हुए। उस घटना ने पूरे देश की आत्मा को झकझोर दिया।

जलियांवाला बाग केवल एक स्थान नहीं है। वह भारतीय इतिहास का ऐसा स्मारक है जहां आज भी ब्रिटिश साम्राज्यवाद की क्रूरता की गूंज सुनाई देती है।

उस नरसंहार ने यह स्पष्ट कर दिया कि अंग्रेजी शासन केवल कानून और प्रशासन का ढांचा नहीं था; उसके पीछे औपनिवेशिक शक्ति, दमन और हिंसा की कठोर व्यवस्था भी थी।

गांधी आए और संघर्ष का स्वरूप बदल गया

अब प्रश्न यह नहीं कि गांधी महान थे या नहीं।

गांधी महान थे।

लेकिन इतिहास के प्रति ईमानदार रहने के लिए यह भी स्वीकार करना होगा कि गांधी अकेले नहीं थे।

महात्मा गांधी ने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को एक ऐसी जनशक्ति प्रदान की जो अभूतपूर्व थी।

चंपारण सत्याग्रह से लेकर खेड़ा, अहमदाबाद, असहयोग आंदोलन, नमक सत्याग्रह और भारत छोड़ो आंदोलन तक गांधी ने सामान्य भारतीय को स्वतंत्रता संघर्ष से जोड़ दिया।

उन्होंने स्वतंत्रता को केवल नेताओं का विषय नहीं रहने दिया।

किसान जुड़ा।

मजदूर जुड़ा।

महिला जुड़ी।

विद्यार्थी जुड़ा।

व्यापारी जुड़ा।

गांव जुड़ा।

शहर जुड़ा।

भारत का आम नागरिक अंग्रेजी शासन के विरुद्ध खड़ा होने लगा।

यही गांधी की सबसे बड़ी शक्ति थी।


लेकिन क्या केवल अहिंसा से आजादी मिली?

यही वह प्रश्न है जिस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

भारत की स्वतंत्रता को केवल अहिंसा की उपलब्धि कहना उतना ही अधूरा है जितना उसे केवल सशस्त्र क्रांति का परिणाम कहना।

भारत का स्वतंत्रता आंदोलन अनेक धाराओं का संगम था।

एक ओर गांधी, नेहरू, पटेल, राजेंद्र प्रसाद, मौलाना आजाद जैसे नेता संवैधानिक, जनांदोलन और अहिंसात्मक संघर्ष को आगे बढ़ा रहे थे।

दूसरी ओर चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खां, राजगुरु, सुखदेव, खुदीराम बोस और अनगिनत क्रांतिकारी अपने अलग रास्ते पर अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दे रहे थे।

इन दोनों धाराओं के तरीके अलग थे, लेकिन लक्ष्य एक था—

भारत की स्वतंत्रता।

इसलिए किसी एक धारा को पूरी स्वतंत्रता का श्रेय देना इतिहास के साथ न्याय नहीं होगा।


भगत सिंह- जिसने मृत्यु को भी चुनौती दी

भगत सिंह की उम्र कितनी थी जब उन्होंने हंसते-हंसते फांसी का फंदा स्वीकार किया?

बहुत कम।

लेकिन विचारों की उम्र नहीं होती।

भगत सिंह ने ब्रिटिश शासन को चुनौती दी। उन्होंने क्रांति को केवल बंदूक और बम तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन के विचार से जोड़ा।

राजगुरु और सुखदेव के साथ उनका बलिदान भारतीय युवाओं के लिए अमर प्रेरणा बन गया।

23 मार्च 1931 को जब इन तीनों वीरों को फांसी दी गई, तब भारत ने तीन युवा शरीर खोए थे, लेकिन एक अमर विचार प्राप्त किया था।


चंद्रशेखर आजाद - आजाद थे, आजाद रहे

चंद्रशेखर आजाद ने अपना नाम ही अपनी प्रतिज्ञा बना लिया था।

अंग्रेजी पुलिस के हाथों जीवित पकड़े जाने के बजाय उन्होंने अंतिम गोली स्वयं पर चलाना स्वीकार किया।

उनका जीवन हमें यह संदेश देता है कि स्वतंत्रता केवल राजनीतिक अधिकार नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का प्रश्न भी है।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस और आजाद हिंद फौज

और फिर आते हैं नेताजी सुभाष चंद्र बोस।

उनका आह्वान था-

"तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा।"

उन्होंने आजाद हिंद फौज को संगठित किया और विदेशों से भारत की स्वतंत्रता के लिए सशस्त्र संघर्ष का प्रयास किया।

उनका प्रसिद्ध उद्घोष-
"जय हिंद"

आज भी भारतीय राष्ट्रभावना का हिस्सा है।

नेताजी की मृत्यु का प्रश्न आज भी इतिहास में चर्चा और विवाद का विषय रहा है। 1945 में विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु की आधिकारिक धारणा लंबे समय से रही, लेकिन उनकी मृत्यु को लेकर अनेक प्रश्न और जांचें भी हुईं। इसलिए यह कहना अधिक उचित है कि नेताजी का अंतिम जीवन-प्रसंग आज भी भारतीय इतिहास के सबसे चर्चित रहस्यों में से एक है।

एक महत्वपूर्ण तथ्य यह भी है कि किसी व्यक्ति को "स्वर्गीय" न कहे जाने को उसकी मृत्यु के सरकारी प्रमाण के रूप में देखना उचित नहीं होगा। नेताजी के निधन के संबंध में विभिन्न सरकारी जांचों और सार्वजनिक बहसों का अपना अलग इतिहास है।

लेकिन इन विवादों से परे एक सत्य निर्विवाद है-

नेताजी भारत की स्वतंत्रता के महानतम सेनानायकों में से एक थे।


अंग्रेजों को केवल सत्याग्रह ने नहीं, बदलती परिस्थितियों ने भी घेरा

द्वितीय विश्व युद्ध ने ब्रिटेन की आर्थिक और सैन्य शक्ति को कमजोर कर दिया।

भारत में लगातार बढ़ता जनदबाव, कांग्रेस के आंदोलनों, क्रांतिकारी गतिविधियों, आजाद हिंद फौज के प्रभाव और उसके सैनिकों पर चले मुकदमों से पैदा हुई जनभावना तथा 1946 के नौसैनिक विद्रोह जैसी घटनाओं ने भी ब्रिटिश शासन को गंभीर चुनौती दी।

ब्रिटेन स्वयं युद्ध से आर्थिक रूप से कमजोर हो चुका था।

ऐसे वातावरण में भारत पर लंबे समय तक औपनिवेशिक शासन बनाए रखना कठिन होता गया।

इसलिए भारत की स्वतंत्रता को समझने के लिए हमें गांधी के साथ-साथ भगत सिंह को भी पढ़ना होगा।

हमें नेहरू के साथ सुभाष को भी पढ़ना होगा।

हमें पटेल के साथ राजेंद्र प्रसाद को भी पढ़ना होगा।

हमें कांग्रेस के साथ क्रांतिकारियों को भी पढ़ना होगा।

हमें सैनिकों के साथ किसानों और मजदूरों को भी याद करना होगा।

हमें उन लाखों अज्ञात लोगों को भी नमन करना होगा जिनका नाम इतिहास की किताबों में शायद नहीं है, लेकिन जिनके बलिदान के बिना स्वतंत्रता का इतिहास अधूरा है।

गांधी ने आजादी की फसल काटी - या उसे जनआंदोलन में बदला?

यह कहना कि भारत के वीरों ने स्वतंत्रता की फसल उगाई और गांधी ने उसे काट लिया—भावनात्मक दृष्टि से प्रभावशाली हो सकता है, लेकिन इतिहास की दृष्टि से यह थोड़ा सरलीकरण होगा।

गांधी ने केवल तैयार फसल नहीं काटी।

उन्होंने भारतीय समाज के विशाल हिस्से को स्वतंत्रता आंदोलन की मुख्यधारा में जोड़ा।

उन्होंने अंग्रेजों की नैतिक वैधता को चुनौती दी।

उन्होंने भारतीयों को यह विश्वास दिया कि बिना हिंसा के भी साम्राज्यवादी सत्ता को चुनौती दी जा सकती है।

लेकिन साथ ही यह भी सत्य है कि स्वतंत्रता केवल गांधी के कारण नहीं आई।

भारत की आजादी अनेक धाराओं, अनेक आंदोलनों और अनेक बलिदानों का सामूहिक परिणाम थी।

यही इतिहास का अधिक संतुलित और न्यायपूर्ण निष्कर्ष है।


"राष्ट्रपिता" का प्रश्न

महात्मा गांधी को भारत में सम्मानपूर्वक "राष्ट्रपिता" कहा जाता है। नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा गांधी के लिए इस संबोधन का प्रयोग इतिहास में विशेष रूप से उल्लेखित है।

लेकिन यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भारत सरकार ने किसी संवैधानिक या औपचारिक राजकीय आदेश द्वारा गांधी को "राष्ट्रपिता" की उपाधि प्रदान नहीं की है।

इसलिए गांधी के प्रति सम्मान और ऐतिहासिक तथ्य-दोनों को अलग-अलग समझना चाहिए।

गांधी राष्ट्र के महानतम नेताओं में से एक थे।

लेकिन स्वतंत्रता का इतिहास केवल गांधी का इतिहास नहीं है।

यह पूरे राष्ट्र का इतिहास है।


15 अगस्त 1947 -आजादी के साथ विभाजन का दर्द

15 अगस्त 1947 भारत के लिए उत्सव का दिन था।

लेकिन उसी स्वतंत्रता की सुबह के साथ विभाजन का भयानक दर्द भी जुड़ा था।

भारत और पाकिस्तान का निर्माण हुआ।

सांप्रदायिक हिंसा ने लाखों लोगों को प्रभावित किया।

लाखों लोग विस्थापित हुए।

असंख्य परिवार बिछड़ गए।

कितने लोग मारे गए, कितनी महिलाओं ने अपनी अस्मिता खोई, कितने बच्चों ने अपने माता-पिता खोए—उस त्रासदी का पूरा दर्द शब्दों में व्यक्त करना कठिन है।

इसलिए स्वतंत्रता दिवस केवल उत्सव का दिन नहीं है।

यह आत्ममंथन का दिन भी है।


आजादी मिली है, लेकिन क्या हम स्वतंत्र हैं?

75, 79 या 100 वर्ष की यात्रा का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं होना चाहिए कि देश ने कितनी सड़कें बनाई, कितने पुल बनाए या कितनी आर्थिक प्रगति की।

हमें यह भी पूछना होगा-

क्या गरीब सम्मान के साथ जी रहा है?

क्या किसान सुरक्षित है?

क्या मजदूर सम्मानित है?

क्या महिला वास्तव में सुरक्षित और स्वतंत्र है?

क्या युवा को अवसर मिल रहा है?

क्या शिक्षा सभी की पहुंच में है?

क्या राजनीति समाज को जोड़ रही है या बांट रही है?

क्या जाति के नाम पर समाज को विभाजित किया जा रहा है?

क्या धर्म को राजनीति की सीढ़ी बनाया जा रहा है?

क्या सत्ता जनता की सेवा कर रही है या जनता सत्ता की सेवा करने के लिए मजबूर है?

यदि इन प्रश्नों के उत्तर हमारे मन को संतुष्ट नहीं करते, तो हमें समझना होगा कि राजनीतिक स्वतंत्रता के बाद भी सामाजिक और मानसिक स्वतंत्रता की यात्रा अभी जारी है।


जातिवाद और साम्प्रदायिकता - स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी चुनौतियां

आज स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर हमें एक संकल्प अवश्य लेना चाहिए।

हम जाति के नाम पर समाज को नहीं बांटेंगे।

हम धर्म के नाम पर नफरत नहीं फैलाएंगे।

हम भाषा के नाम पर किसी भारतीय को छोटा नहीं समझेंगे।

हम क्षेत्र के नाम पर किसी को पराया नहीं मानेंगे।

भारत की शक्ति उसकी विविधता में है।

जो राजनीति समाज को जोड़ती है वह राष्ट्रनिर्माण करती है।

जो राजनीति समाज को बांटती है, वह चाहे कितने ही बड़े राष्ट्रवादी नारे लगाए, अंततः राष्ट्र को कमजोर करती है।

देशभक्ति केवल झंडा फहराने का नाम नहीं है।

देशभक्ति का अर्थ है-

ईमानदारी से कर देना।

अपने काम को पूरी निष्ठा से करना।

किसी कमजोर का अधिकार न छीनना।

भ्रष्टाचार का विरोध करना।

महिला का सम्मान करना।

बच्चों को शिक्षा देना।

पर्यावरण की रक्षा करना।

संविधान और कानून का सम्मान करना।

और सबसे महत्वपूर्ण-

अपने से अलग विचार रखने वाले व्यक्ति के अस्तित्व और अधिकार का सम्मान करना।


स्वतंत्रता सेनानियों को सच्ची श्रद्धांजलि क्या होगी?

यदि हम वास्तव में भगत सिंह को श्रद्धांजलि देना चाहते हैं तो केवल उनकी तस्वीर पर माला चढ़ाना पर्याप्त नहीं है।

यदि हम गांधी को श्रद्धांजलि देना चाहते हैं तो केवल उनकी प्रतिमा पर फूल चढ़ाना पर्याप्त नहीं है।

यदि हम नेताजी को श्रद्धांजलि देना चाहते हैं तो केवल "जय हिंद" बोलना पर्याप्त नहीं है।

यदि हम रानी लक्ष्मीबाई, कुंवर सिंह, मंगल पांडे, राजगुरु, सुखदेव, बिस्मिल, अशफाकउल्ला खां, खुदीराम बोस और हजारों अन्य ज्ञात-अज्ञात स्वतंत्रता सेनानियों को नमन करना चाहते हैं तो हमें उनके आदर्शों को अपने जीवन में उतारना होगा।

स्वतंत्रता सेनानियों की सबसे बड़ी श्रद्धांजलि यही होगी कि हम उस भारत को मजबूत बनाएं जिसके लिए उन्होंने अपना जीवन दिया।

आजादी किसी एक की जागीर नहीं

यह बात आज विशेष रूप से कहने की आवश्यकता है-

भारत की आजादी किसी एक दल की जागीर नहीं है।

यह किसी एक विचारधारा की संपत्ति नहीं है।

यह किसी एक जाति की उपलब्धि नहीं है।

यह किसी एक धर्म की विजय नहीं है।

यह किसी एक नेता की निजी उपलब्धि नहीं है।

यह उन करोड़ों भारतीयों की सामूहिक विरासत है जिन्होंने किसी न किसी रूप में स्वतंत्रता संघर्ष में योगदान दिया।

इसलिए स्वतंत्रता दिवस पर राजनीतिक श्रेय की लड़ाई लड़ना स्वतंत्रता सेनानियों के बलिदान का अपमान है।

आज जरूरत इस बात की है कि हम इतिहास को अपनी सुविधा के अनुसार काट-छांटकर प्रस्तुत करने के बजाय उसे उसकी संपूर्णता में स्वीकार करें।


आइए, इस स्वतंत्रता दिवस पर एक नया संकल्प लें

आइए इस 15 अगस्त को केवल यह न कहें कि-

भारत माता की जय।

बल्कि यह भी तय करें कि भारत माता के किसी बेटे को भूखा नहीं सोने देंगे।

किसी बेटी को भय में नहीं जीने देंगे।

किसी बच्चे को शिक्षा से वंचित नहीं होने देंगे।

किसी गरीब का अधिकार नहीं छीनेंगे।

किसी निर्दोष को जाति या धर्म के नाम पर घृणा का शिकार नहीं बनने देंगे।

राजनीति को समाज को जोड़ने का माध्यम बनाएंगे, तोड़ने का नहीं।

और उन असामाजिक एवं विभाजनकारी शक्तियों का लोकतांत्रिक तरीके से विरोध करेंगे जो जातिवाद, साम्प्रदायिकता, नफरत और हिंसा के माध्यम से भारतीय समाज को कमजोर करने का प्रयास करती हैं।


अंतिम प्रश्न

जब अगली बार हम वह गीत सुनें-

"दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल..."

तो गीत की भावना का सम्मान करें, लेकिन इतिहास को भूलें नहीं।

याद रखें-

किसी ने सत्याग्रह किया।

किसी ने जेल काटी।

किसी ने गोली खाई।

किसी ने फांसी का फंदा चूमा।

किसी ने अपना घर छोड़ा।

किसी ने संपत्ति गंवाई।

किसी ने परिवार खोया।

किसी ने रणभूमि में तलवार उठाई।

किसी ने कलम से अंग्रेजी सत्ता को चुनौती दी।

और किसी अनाम भारतीय ने बिना किसी इतिहास की किताब में अपना नाम दर्ज कराए स्वतंत्रता की लड़ाई में अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया।

भारत की स्वतंत्रता किसी एक व्यक्ति की कहानी नहीं है।

यह करोड़ों भारतीयों के त्याग, तपस्या, संघर्ष, सत्याग्रह, विद्रोह और बलिदान की सामूहिक गाथा है।

इसलिए स्वतंत्रता दिवस पर हमारा पहला कर्तव्य है-

हर ज्ञात-अज्ञात स्वतंत्रता सेनानी को नमन।

दूसरा कर्तव्य है-

इतिहास को ईमानदारी से याद करना।

और तीसरा कर्तव्य है—

ऐसा भारत बनाना जिसके लिए अगली पीढ़ी को हम पर गर्व हो।

आइए, इस स्वतंत्रता दिवस पर हम संकल्प लें—

न जाति हमें बांटेगी,
न धर्म हमें लड़ाएगा,
न भाषा हमें अलग करेगी,
न राजनीति हमें विभाजित करेगी।

हम सबसे पहले भारतीय हैं।

और भारत की एकता, अखंडता, लोकतंत्र तथा सामाजिक सद्भाव की रक्षा करना ही स्वतंत्रता सेनानियों के प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि है।

जय हिंद।
वंदे मातरम्।

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