क्रांति की पावन भूमि बिहार
सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारत का स्वतंत्रता संग्राम त्याग, अदम्य साहस, अनगिनत शहादतों और पराक्रम की एक ऐसी अमर गाथा है, जिसमें बिहार की पावन धरा ने सदैव एक केंद्रीय और मार्गदर्शक भूमिका निभाई है। पूर्व में गंगा, सोन, गंडक और कोसी की धाराओं से सिंचित बिहार केवल ज्ञान, संस्कृति और धर्म की भूमि ही नहीं रहा, बल्कि यह विदेशी हुकूमत के विरुद्ध क्रांति का सबसे मजबूत गढ़ भी रहा। 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के प्रथम बिगुल से लेकर 1942 के 'भारत छोड़ो आंदोलन' की अंतिम तथा निर्णायक ज्वाला तक, बिहार के हर जिले, हर गांव और हर शहर के वीरों एवं वीरांगनाओं ने अपनी मातृभूमि को ब्रिटिश दासता से मुक्त कराने के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया। ब्रिटिश साम्राज्य शासन की दमनकारी नीतियों, आर्थिक शोषण, जल-जंगल-जमीन पर कब्जे और अमानवीय अत्याचारों के विरुद्ध बिहार में जन-आंदोलन का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह स्वतंत्रता की प्राप्ति तक कभी मंद नहीं पड़ा। बाबू वीर कुंवर सिंह का 80 वर्ष की आयु में दिखाया गया अभूतपूर्व शौर्य, डॉ. राजेंद्र प्रसाद की बौद्धिक निष्ठा, जयप्रकाश नारायण की क्रांतिकारी रणनीति और हजारों गुमनाम शहीदों का रक्त आज भी भारतीय इतिहास के पन्नों में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है।
. 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम: मगध, भोजपुर और उत्तर बिहार की हुंकार - 1857 का विद्रोह भारतीय उपमहाद्वीप में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन के खिलाफ पहला संगठित जन-उभार था। बिहार में इस क्रांति ने एक अत्यंत उग्र और व्यापक रूप धारण किया था। बाबू वीर कुंवर सिंह (जगदीशपुर): जगदीशपुर के 80 वर्षीय परमार राजपूत जमींदार बाबू वीर कुंवर सिंह 1857 की क्रांति के सबसे वयोवृद्ध किंतु सबसे वीर सेनानायक थे। उन्होंने आरा, छपरा, गाजीपुर, आजमगढ़ और बलिया तक अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए। गुरिल्ला (छापामार) युद्ध कला में माहिर कुंवर सिंह ने ब्रिटिश सेनापति मिलमैन, मार्क और डन्बार की सेना को कई बार परास्त किया। गंगा नदी पार करते समय जब ब्रिटिश सेना की गोली उनकी बांह में लगी, तो उन्होंने बिना झिझक अपनी तलवार से अपनी बांह काटकर गंगा मैया को समर्पित कर दी। 23 अप्रैल 1858 को अंग्रेजों को खदेड़कर अपने जगदीशपुर किले पर वापस तिरंगा (स्वतंत्र झंडा) फहराने के बाद, अत्यधिक रक्तस्राव के कारण 26 अप्रैल 1858 को वे अमर हो गए। बाबू अमर सिंह: कुंवर सिंह के अनुज बाबू अमर सिंह ने अपने भ्राता की मृत्यु के पश्चात क्रांति की मशाल को बुझने नहीं दिया। उन्होंने कैमूर की पहाड़ियों में अपनी एक समानांतर सरकार स्थापित की और रोहतास तथा कैमूर क्षेत्र में लंबे समय तक अंग्रेजों के खिलाफ छापामार युद्ध जारी रखा। बाद में गिरफ्तार किए जाने पर अंग्रेजों द्वारा दी गई भीषण मानसिक व शारीरिक यातनाओं के कारण गोरखपुर जेल में उनका निधन हो गया। अमर शहीद निशान सिंह: रोहतास के निशान सिंह, जो वीर कुंवर सिंह के मुख्य सेनापति थे, को अंग्रेजों ने बंदी बनाकर सासाराम में सरेआम तोप के मुंह से बांधकर उड़ा दिया था, ताकि जनता में खौफ पैदा किया जा सके।
3 जुलाई 1857 को पटना में क्रांति का बिगुल बजा। पटना के गुरहट्टा मोहल्ले के एक साधारण पुस्तक विक्रेता पीर अली खान ने गुप्त रूप से स्वतंत्रता सेनानियों का संगठन तैयार किया और अंग्रेजों पर धावा बोल दिया। इसमें ब्रिटिश अफीम एजेंट डॉ. लायल मारा गया। अंग्रेज कमिश्नर टेलर ने दमन चक्र चलाते हुए पीर अली और उनके 14 साथियों को गिरफ्तार कर लिया। भारी यातनाएं दिए जाने के बावजूद पीर अली ने अपने साथियों के नाम उजागर नहीं किए। अंततः उन्हें पटना में सरेआम फांसी दे दी गई।
मगध क्षेत्र का जन-विद्रोह: बाबू जीवधर सिंह (अरवल) व गया के क्रांतिवीर - बाबू जीवधर सिंह (खमैनी, अरवल): अरवल जिले के खमैनी गांव के निवासी बाबू जीवधर सिंह मगध क्षेत्र में क्रांति के सबसे बड़े नेता थे। वे बाबू वीर कुंवर सिंह के घनिष्ठ सहयोगी थे। जीवधर सिंह ने जहानाबाद, औरंगाबाद, अरवल और गया क्षेत्र में अंग्रेजों की सत्ता उखाड़ फेंकी। उन्होंने गया सेंट्रल जेल पर आक्रमण कर सैकड़ों बंदियों को रिहा कराया और पलामू के जंगलों तक 900 क्रांतिकारियों की सेना के साथ अंग्रेजों पर सतत हमले किए। अप्रैल 1859 में अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर फांसी की सजा दे दी। राजा हेत नारायण सिंह व जोधर सिंह: औरंगाबाद और गया के टिकारी तथा पाली क्षेत्र के जमींदारों एवं किसानों ने ब्रिटिश खजाने को लूटा और अंग्रेजी मालगुजारी व्यवस्था को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया।
तिरहुत और मुजफ्फरपुर में सैन्य विद्रोह जुलाई 1857 में मुजफ्फरपुर में स्थित 12वीं कैवेलरी के भारतीय सैनिकों ने अंग्रेजों के खिलाफ बगावत कर दी। कई अंग्रेज अधिकारियों को मार गिराया गया। हालांकि, बाद में ब्रिटिश सेना की अतिरिक्त टुकड़ियों ने इस विद्रोह को कुचल दिया और दर्जनों विद्रोही सैनिकों को फांसी पर लटका दिया। बंग-भंग, क्रांतिकारी राष्ट्रवाद और आरंभिक शहादतें (1900–1915) - 20वीं सदी के प्रारंभ में बिहार क्रांतिकारी राष्ट्रवाद का एक प्रमुख केंद्र बनकर उभरा। देश के युवा अपने प्राणों की आहुति देकर भारत माता को आजाद कराने के संकल्प के साथ आगे आए ।मुजफ्फरपुर बम कांड और खुदीराम बोस तथा प्रफुल्ल चाकी का आत्मबलिदान बंगाल के अत्याचारी और क्रूर ब्रिटिश मजिस्ट्रेट डगलस किंग्सफोर्ड को मार गिराने की जिम्मेदारी दो तरुण क्रांतिकारियों—खुदीराम बोस और प्रफुल्ल चंद्र चाकी को सौंपी गई। घटना (30 अप्रैल 1908): मुजफ्फरपुर के क्लब से बाहर निकल रही किंग्सफोर्ड की गाड़ी समझकर दोनों युवाओं ने उस पर बम फेंक दिया। हालांकि, उस गाड़ी में किंग्सफोर्ड नहीं था, बल्कि दो ब्रिटिश महिलाएं (कैनेडी परिवार की माता-पुत्री) थीं, जिनकी इस हमले में मृत्यु हो गई। प्रफुल्ल चाकी की शहादत (1 मई 1908): घटना के बाद प्रफुल्ल चाकी भागकर मोकामा रेलवे स्टेशन पहुंचे। वहां पुलिस सब-इंस्पेक्टर नंदलाल बनर्जी ने उन्हें पहचान लिया। अंग्रेजों द्वारा पकड़े जाने और यातनाएं सहने के स्थान पर प्रफुल्ल चाकी ने अपनी ही रिवॉल्वर से खुद को गोली मारकर अपनी मातृभूमि के लिए प्राण त्याग दिए। खुदीराम बोस की फांसी (11 अगस्त 1908): खुदीराम बोस को वैनी रेलवे स्टेशन (अब खुदीराम बोस पूसा) से गिरफ्तार कर लिया गया। मुजफ्फरपुर जेल में उन पर मुकदमा चलाया गया और अंग्रेजी जज सी. डी. बीचक्रॉफ्ट ने उन्हें फांसी की सजा सुनाई। 11 अगस्त 1908 को मात्र 18 वर्ष 8 महीने की आयु में हाथ में भगवद्गीता लेकर खुदीराम बोस हँसते-हँसते फांसी के फंदे पर झूल गए। वे भारतीय स्वाधीनता संग्राम के सबसे कम उम्र के अमर शहीदों में से एक बने।
चंपारण सत्याग्रह (1917) और असहयोग आंदोलन (1920–1922) - बिहार केवल सशस्त्र क्रांति का ही केंद्र नहीं था, बल्कि इसने महात्मा गांधी के 'अहिंसा और सत्याग्रह' के सिद्धांत को धरातल पर उतारकर राष्ट्रीय राजनीति की दिशा को बदल दिया। चंपारण सत्याग्रह (1917): गांधी जी का प्रथम सफल प्रयोग - राजकुमार शुक्ल का योगदान: चंपारण के स्वाभिमानी किसान नेता राजकुमार शुक्ल ने ब्रिटिश नील बागान मालिकों द्वारा थोपी गई दमनकारी 'तीनकठिया प्रणाली' (जिसके तहत किसानों को अपनी जमीन के 3/20 भाग पर जबरन नील की खेती करनी पड़ती थी) के खिलाफ आवाज उठाई। वे लखनऊ कांग्रेस अधिवेशन (1916) में महात्मा गांधी से मिले और उन्हें चंपारण आने के लिए राजी किया। गांधी जी का आगमन और बिहार के दिग्गज नेता: अप्रैल 1917 में जब गांधी जी बिहार आए, तब डॉ. राजेंद्र प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिंह, ब्रजकिशोर प्रसाद, रामनवमी प्रसाद और आचार्य जे.बी. कृपलानी जैसे युवाओं ने उनका साथ दिया। सत्याग्रह के बल पर ब्रिटिश सरकार को झुकना पड़ा, चंपारण एग्रेरियन कमेटी बनी और तीनकठिया प्रथा को हमेशा के लिए समाप्त कर दिया गया। इसी आंदोलन की सफलता के बाद रवींद्रनाथ टैगोर ने मोहनदास करमचंद गांधी को 'महात्मा' की उपाधि दी थी। असहयोग आंदोलन (1920–1922) और किसान चेतना - मजरूल हक और 'दी सर्चलाइट': असहयोग आंदोलन के दौरान पटना में मजरूल हक ने 'सदाकत आश्रम' की स्थापना की और 'द मदरलैंड' नामक अखबार निकालकर राष्ट्रीय चेतना फैलाई। किसान आंदोलन (स्वामी सहजानंद सरस्वती व यदुनंदन शर्मा):नियामतपुर , बेलागंज गया और बिहटा (पटना) में स्वामी सहजानंद सरस्वती ने 'बिहार प्रांतीय किसान सभा' की स्थापना की। अरवल, सोनभद्र वंशीसूर्यपुर, जहानाबाद, बक्सर और गया क्षेत्र में पंडित यदुनंदन शर्मा, चक्रधर मिश्र (फखरपुर, अरवल) और अन्य नेताओं ने जमींदारी उत्पीड़न और ब्रिटिश मालगुजारी के खिलाफ किसानों को संगठित कर आंदोलन को अभूतपूर्व शक्ति दी।
सविनय अवज्ञा आंदोलन और 'नंगी हड़ताल' (1930) - 1930 में महात्मा गांधी के डांडी मार्च के साथ ही संपूर्ण बिहार में सविनय अवज्ञा आंदोलन की प्रचंड लहर दौड़ गई। चूंकि बिहार एक भू-वेष्टित (landlocked) प्रदेश था, इसलिए यहाँ समुद्र के पानी से नमक बनाने के स्थान पर 'नमक कानून' और 'चौकीदारी कर' न देने का आंदोलन चलाया गय सारण व छपरा: सारण जिला नमक सत्याग्रह का प्रमुख केंद्र बना। छपरा जेल में बंद स्वतंत्रता सेनानियों ने विदेशी वस्त्रों के बहिष्कार की मांग को लेकर स्वदेशी कपड़े पहनने से मना कर दिया और नंगे रहकर 'नंगी हड़ताल' की। इस दौरान पुलिस ने कैदियों पर अमानवीय लाठीचार्ज किया और कोड़ों की सजा दी। पटना, मुंगेर व भागलपुर: पटना के नाकहा पिंड पर पंडित जवाहरलाल नेहरू और डॉ. राजेंद्र प्रसाद की मौजूदगी में नमक कानून तोड़ा गया। मुंगेर के गोगरी और भागलपुर के बिहपुर में पुलिस ने सत्याग्रहियों पर बर्बर लाठीचार्ज किया, जिसमें श्रीकृष्ण सिंह (बिहार के प्रथम मुख्यमंत्री) और अनुग्रह नारायण सिंह गंभीर रूप से घायल हुए।. 1942 का 'भारत छोड़ो आंदोलन': अगस्त क्रांति और दमन का दौर में 8 अगस्त 1942 को बॉम्बे में महात्मा गांधी ने "करो या मरो" का नारा दिया। 9 अगस्त की सुबह ही गांधी जी सहित देश के तमाम बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद बिहार में आंदोलन की कमान युवाओं, छात्रों और किसानों ने संभाल ली। 1942 का वर्ष बिहार के इतिहास में सर्वाधिक खूनी किंतु शौर्यपूर्ण वर्ष रहा।
गठन • तारापुर गोलीकांड (13 शहीद) हुए थे ।
पटना सचिवालय गोलीकांड: सात अमर तरुण शहीद (11 अगस्त 1942) - 11 अगस्त 1942 को पटना कलेक्टरेट और सचिवालय भवन पर तिरंगा फहराने के लिए हजारों छात्रों का जुलूस निकला। पटना के ब्रिटिश जिलाधिकारी डब्ल्यू. जी. आर्चर ने पुलिस को गोलियां चलाने का आदेश दे दिया। पुलिस की गोलियों के सामने सीना तानकर एक-एक कर छात्र आगे बढ़ते रहे और झंडा फहराने का प्रयास करते रहे। इस गोलीबारी में बिहार के विभिन्न जिलों के 7 तरुण छात्र शहीद हुए: उमाकांत प्रसाद सिंह (राममोहन राय सेमिनरी, मूल निवासी: नरेंद्रपुर, सारण) , रामानंद सिंह (राममोहन राय सेमिनरी, मूल निवासी: शहादत नगर, पटना) , सतीश प्रसाद झा (पटना कॉलेजिएट, मूल निवासी: खडहरा, भागलपुर) , जगतपति कुमार (बिहार नेशनल कॉलेज, मूल निवासी: खराटी, औरंगाबाद) , देवीपद चौधरी (राममोहन राय सेमिनरी, मूल निवासी: सिल्हट / सारण) , राजेन्द्र सिंह (पटना हाई स्कूल, मूल निवासी: बनवारीचक, सारण)।रामगोविंद सिंह (पुनपुन हाई स्कूल, मूल निवासी: दशरथा, पटना) इन सात शहीदों के अमर बलिदान की स्मृति में आज भी पटना सचिवालय के सामने 'सप्त मूर्ति' (शहीद स्मारक) विराजमान है।
जयप्रकाश नारायण (जेपी) और 'आजाद दस्ता' - 1942 के आंदोलन के दौरान जयप्रकाश नारायण को हजारीबाग सेंट्रल जेल में बंद कर दिया गया था। 9 नवंबर 1942 (दीपावली की रात) को जेपी अपने सहयोगियों (रामानंद मिश्रा, योगेंद्र शुक्ल, सूरज नारायण सिंह, गुलाबी सोनार आदि) के साथ हजारीबाग जेल की ऊंची दीवार लांघकर फरार हो गए। आजाद दस्ता का गठन: जेपी नेपाल के जंगलों (राजबिलास जंगल) पहुंचे और वहां युवाओं को छापामार युद्ध, हथियारों के प्रयोग और ब्रिटिश संचार प्रणालियों (रेल पटरियां, तार प्रणाली, डाकघर) को ध्वस्त करने का प्रशिक्षण देने के लिए 'आजाद दस्ता' का गठन किया। जेपी के इस भूमिगत आंदोलन ने पूरे देश में क्रांति की ज्वाला को बुझने नहीं दिया।
बिहार के प्रमुख जिलों में शहादते, दमन व यातनाएँ (1857–1942) - 1857 से 1942 के दौरान बिहार का कोई भी जिला ऐसा नहीं था, जहां के वीरों ने रक्त न बहाया हो। नीचे प्रमुख जिलों में हुई प्रमुख शहादतों और अंग्रेजों द्वारा ढाए गए जुल्मों का विस्तृत विवरण दिया गया है: मुजफ्फरपुर व वैशाली अमर शहीद जुब्बा सहनी (16 अगस्त 1942): मुजफ्फरपुर के मीनापुर थाने पर 16 अगस्त 1942 को क्रांतिकारियों ने हमला बोला। जुब्बा सहनी के नेतृत्व में जनता ने अत्याचारी पुलिस अधिकारी वालास को थाने के भीतर ही जिंदा जला दिया। बाद में जुब्बा सहनी को गिरफ्तार कर लिया गया और 11 मार्च 1944 को भागलपुर जेल में फांसी दे दी गई।वैशाली: हाजीपुर और लालगंज में रेलवे स्टेशनों पर कब्जा करने के दौरान पुलिस फायरिंग में दर्जनों युवा शहीद हुए और अक्षयवट राय जैसे नेताओं को कठोर कारावास की सजा मिली।।. सीतामढ़ी व दरभंगा।अमर शहीद रामफल मंडल (23 अगस्त 1943): सीतामढ़ी के बाजपट्टी में 24 अगस्त 1942 को आंदोलनकारियों पर ब्रिटिश पुलिस ने गोलियां चलाईं। जवाब में रामफल मंडल और उनके सहयोगियों ने अंग्रेज अधिकारियों (अनुमंडलाधिकारी और पुलिस इंसपेक्टर) को मार गिराया। रामफल मंडल को गिरफ्तार कर 23 अगस्त 1943 को भागलपुर जेल में फांसी दे दी गई। मुंगेर, भागलपुर व संथाल परगना।तारापुर गोलीकांड (18 अगस्त 1942): मुंगेर जिले के तारापुर थाने पर तिरंगा फहराने पहुंचे निहत्थे देशभक्तों पर ब्रिटिश पुलिस ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं। इस भीषण गोलीकांड में 13 देशभक्त मौके पर ही शहीद हो गए।।भागलपुर: सतीश चंद्र झा और अन्य नेताओं के नेतृत्व में युवाओं ने कलेक्टरेट पर धावा बोला। भागलपुर सेंट्रल जेल अंग्रेजों के दमन और यातनाओं का सबसे बड़ा केंद्र बना, जहाँ हज़ारों सेनानियों को कोड़े मारे गए।चंपारण (पूर्वी व पश्चिमी) बेतिया गोलीकांड (24 अगस्त 1942): भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान बेतिया में विशाल जुलूस पर ब्रिटिश सेना ने मशीन गन से फायरिंग की, जिसमें 15 से अधिक निहत्थे नागरिक और छात्र शहीद हो गए। सुगौली और रक्सौल में रेल लाइनें उखाड़ने पर सैकड़ों लोगों को अमानवीय शारीरिक यातनाएं दी गईं।। सारण, सीवान व गोपालगंज।जगलाल चौधरी व छपरा का जन-उभार: छपरा में जगलाल चौधरी के नेतृत्व में जनता ने पुलिस थानों और डाकघरों पर कब्जा कर लिया। अंग्रेजों ने गांव के गांव जला दिए और जगलाल चौधरी को वर्षों तक जेल की सींकचों में बंद रखकर यातनाएं दीं। सीवान (महेंद्रनाथ गोप): सीवान में पुलिस फायरिंग में कई युवा शहीद हुए। गया, नवादा, औरंगाबाद, जहानाबाद व अरवल गया व हिसुआ (1942): गया और नवादा के हिसुआ में डाकघरों और पुलिस स्टेशनों पर धावा बोलने के दौरान पुलिस गोलीबारी में कई सत्याग्रही शहीद हुए। गया सेंट्रल जेल में बंद कैदियों को पत्थरों की गिट्टी तोड़ने और कोड़े सहने का कठोर श्रम कराया जाता था। जहानाबाद व अरवल: अरवल के खभैनी, मगध और कुर्था क्षेत्रों में रेल पटरियाँ उखाड़ने तथा तार सेवाएं ठप करने पर ब्रिटिश सेना ने गांवों में सामूहिक जुर्माने ठोके, घरों की कुर्की की और किसानों की फसलें जला दीं।भोजपुर, बक्सर, रोहतास व कैमूर बक्सर व डुमरांव (1942): डुमरांव और बक्सर में पुलिस स्टेशन पर तिरंगा फहराने के प्रयास में कपिलदेव सिंह और उनके साथी पुलिस की गोलियों के शिकार होकर शहीद हुए।
विक्रमगंज (रोहतास): रोहतास के विक्रमगंज में सेना की गोलीबारी में कई आंदोलनकारी मारे गए । अमर शहीद चुलहाई यादव (मधेपुरा): 1942 के आंदोलन में मधेपुरा और सहरसा में कलेक्ट्रेट पर हमला बोलते समय चुलहाई यादव और उनके साथियों ने अंग्रेजों की गोलियों का सामना करते हुए वीरगति प्राप्त की।
. नारी शक्ति: बिहार की अमर वीरांगनाएँ - बिहार के स्वतंत्रता संग्राम की सबसे महान विशेषताओं में से एक थी—महिलाओं का अभूतपूर्व और साहसिक योगदान। पुरुषों के जेल चले जाने या शहीद हो जाने के बाद बिहार की नारियों ने न केवल आंदोलन का नेतृत्व संभाला, बल्कि पुलिस की गोलियों का सीना तानकर सामना भी किया ।
प्रभावती देवी जयप्रकाश नारायण की धर्मपत्नी। उन्होंने महात्मा गांधी के साबरमती आश्रम में रहकर गांधीवादी आदर्शों को अपनाया। पटना में 'महिला चरखा समिति' की स्थापना की। 1930, 1932 और 1942 के आंदोलनों में वे कई बार जेल गईं और पुलिस की बर्बरता सही।।तारा रानी श्रीवास्तव सीवान जिले की अमर वीरांगना। 1942 में अपने पति फूलन प्रसाद श्रीवास्तव के साथ सीवान थाने पर तिरंगा फहराने निकलीं। पुलिस फायरिंग में उनके पति को गोली लग गई। उन्होंने अपनी साड़ी से पति के घाव को बांधा और पति के शव को पीछे छोड़कर तिरंगे को हाथ में लिए आगे बढ़कर थाने पर झंडा फहरा दिया। रामदुलारी सिन्हा बिहार में छात्र आंदोलनों और स्वतंत्रता संग्राम में अग्रणी भूमिका निभाई। स्वतंत्रता के बाद वे देश की प्रमुख नेता बनीं और बिहार की पहली महिला राज्यपाल के रूप में सेवाएं दीं।
सरस्वती देवी हजारीबाग क्षेत्र में महिलाओं को संगठित कर 1930 के नमक सत्याग्रह और 1942 के आंदोलन का नेतृत्व किया। उन्हें अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार कर बार-बार जेल भेजा गया। अनीस फातिमा पटना की साहसी मुस्लिम महिला, जिन्होंने पर्दा प्रथा को तोड़कर असहयोग और सविनय अवज्ञा आंदोलन में भाग लिया। उन्होंने विदेशी वस्त्रों की दुकानों पर धरना दिया और समाज सुधारक के रूप में कार्य किया।. स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजों द्वारा 1857 से 1942 के बीच ब्रिटिश हुकूमत ने बिहार के स्वतंत्रता सेनानियों के मनोबल को तोड़ने के लिए दमन की सभी सीमाएं लांघ दी थीं: तोप से उड़ाना व सरेआम फांसी: 1857 में विद्रोहियों में खौफ पैदा करने के लिए निशान सिंह जैसे वीरों को तोप के मुंह से बांधकर उड़ा दिया जाता था और पीर अली जैसे नायकों को चौराहे पर सरेआम फांसी पर लटकाया जाता था।
सश्रम कारावास और कोड़ों की सजा: 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन और 1942 की अगस्त क्रांति में पकड़े गए युवाओं को नग्न करके बेत (कोड़े) मारे जाते थे। भागलपुर, गया और पटना सेंट्रल जेलों में सेनानियों से कड़ा शारीरिक श्रम कराया जाता था।।बाबू वीर कुंवर सिंह से लेकर जयप्रकाश नारायण और जगलाल चौधरी तक, अंग्रेजों ने स्वतंत्रता सेनानियों की जमीनों को जब्त कर लिया, फसलों में आग लगा दी और उनके पैतृक मकानों को तोपों व बुलडोजरों से ढहा दिया। सामूहिक जुर्माना और आगजनी:में 1942 में जब बिहार की जनता ने रेल पटरियां उखाड़ दीं और थानों पर कब्जा किया, तो अंग्रेज सेना (जैसे गोरखा और ब्रिटिश रेजिमेंट) ने जहानाबाद, अरवल, सारण, मुंगेर और चंपारण के कई गांवों को चारों तरफ से घेरकर जला दिया और पूरे-पूरे गांवों पर भारी 'सामूहिक जुर्माना'ठोक दिया ।
1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम में जगदीशपुर की मिट्टी से उठी वीर कुंवर सिंह की ललकार से लेकर 1942 के पटना सचिवालय गोलीकांड में अपने प्राण आहुत करने वाले सात किशोर छात्रों के बलिदान तक, बिहार का इतिहास राष्ट्रभक्ति, शौर्य और स्वाभिमान का एक अमर गाथाकोश है।।बिहार के वीर सपूतों और वीरांगनाओं ने यह साबित कर दिया कि स्वतंत्रता की कीमत चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो—चाहे वह प्राणों की आहुति हो, फांसी का फंदा हो, कालापानी की सजा हो या फिर कोड़ों की मार—वे मातृभूमि के आंचल को ब्रिटिश दासता से मुक्त कराने के लिए पीछे नहीं हटने वाले थे।
आज जब हम एक स्वतंत्र, लोकतांत्रिक और समृद्ध भारत में सांस ले रहे हैं, तो यह बिहार के इन अमर शहीदों—बाबू वीर कुंवर सिंह, बाबू अमर सिंह, पीर अली, खुदीराम बोस, प्रफुल्ल चाकी, मंगल पांडे, बाबू जीवधर सिंह, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, जयप्रकाश नारायण, जुब्बा सहनी, रामफल मंडल, तारा रानी श्रीवास्तव, प्रभावती देवी और उन तमाम अनगिनत गुमनाम नायकों के पावन त्याग और शहादत का ही फल है।
"शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले, वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा।"
अमर शहीदों का यह बलिदान युगों-युगों तक भारतवर्ष के जन-मन को राष्ट्रसेवा और देशभक्ति की प्रेरणा देता रहेगा।
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