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देख नखरे अब ईख नंदिनी के

देख नखरे अब ईख नंदिनी के

कुमार महेंद्र
चाय का कप रूठ बैठा,
रसोई में मिठास कहाँ?
बजट का धागा टूट रहा,
पहले जैसी बात कहाँ?
कल तक जो अपनी-सी लगती,
अब तीखे तेवर मनमानी के।
देख नखरे अब ईख नंदिनी के।।


जो पल भर में घुल जाती थी,
अब भाव बढ़ाकर बैठ गई।
काँच-पात्र की सीमा में,
ताव दिखाकर ऐंठ गई।
चाल-ढाल ही बदल गई है,
रंग निराले मृगनयनी के।
देख नखरे अब ईख नंदिनी के।।


गुड़-मिश्री भी ताक रहे हैं,
देख समय की करवट कैसी!
कल तक जो सबकी सहेली,
आज बनी है इतनी ऐंठी!
उड़ गए सबके होश अचानक,
बदल गए रंग-ढंग संगिनी के।
देख नखरे अब ईख नंदिनी के।।


पकवानों के मुख मुरझाए,
त्योहारों के रंग भी फीके।
मिठाइयों की महफ़िल सूनी,
बच्चों के सपने भी रीते।
महँगाई संग इठला रही,
हाव-भाव देखो अल्हड़ चीनी के।
देख नखरे अब ईख नंदिनी के।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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