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"स्वत्व-प्रभात"

"स्वत्व-प्रभात"

पंकज शर्मा
टूट गए बंधन सारे,
शिथिल हुईं श्रृंखलाएँ।
तम के उर में भोर जगी,
हँसने लगीं दिशाएँ।
दास-विवशता दूर हुई,
जागा जन-मन-गान—
पंद्रह अगस्त लिख गया,
स्वाधीनता का मान॥

आत्म-तेज के सम्मुख झुका,
साम्राज्य-बल का मान।
जाग उठा जन-जन के भीतर,
भारत का स्वाभिमान।
धधक उठी प्रतिरोध-ज्वाला,
टूटा भय का जाल—
वीरों के संकल्पों ने,
बदल दिया भूगोल॥

नेताजी की रण-हुंकार,
आजाद का अडिग प्रण।
भगतसिंह की हँसती फाँसी,
बिस्मिल का पावन यज्ञ।
वीरों के रक्त से सिंचा,
भारत का स्वाधीन विहान—
त्याग, शौर्य, बलिदानों से,
दीप्त हुआ हिंदुस्तान॥


गूँज उठीं दसों दिशाएँ,
जय-जय भारत-गान।
लाल किले पर फहरा उठा,
अपना तिरंगा महान।
कण-कण में नवजीवन जागा,
मिटा दासता-त्रास—
स्वतंत्र धरा ने फिर देखा,
अपना स्वर्णिम प्रकाश॥


शत-शत नमन शहीदों को,
जिनने दिए प्राण।
जिनके रक्त से लिखी गई,
भारत की गौरव-गाथा महान।
जलियाँवाला की धरती ने,
देखे कितने बलिदान—
उनकी अमर शपथ से ही,
ऊँचा है हिंदुस्तान॥


फाँसी के फंदे चूमे,
हँसकर वरा कारागार।
मातृभूमि के चरणों में,
अर्पित जीवन-संसार।
उनके त्याग की ज्योति जले,
युग-युग रहे अविराम—
अमर रहे पंद्रह अगस्त,
अमर रहे भारत-नाम॥


🫡🇮🇳प्रिय मित्रों बलिदानों से मिली स्वतंत्रता को केवल उत्सव नहीं, अपने स्वाभिमान, कर्तव्य एवं चरित्र से सार्थक करने का संकल्प ही राष्ट्र के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि है। स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ!🇮🇳🫡


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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