सुख दुःख जीवन के दो पहलू,
बचपन में यह जान सके ना।सुख की अनुभूति में जीते हम,
दुःख का मतलब जान सके ना।
सुख की लहरों पर जीवन में,
विश्राम के पल कब आये?
एक पल के दुःख की अनुभूति,
आज तलक बिसरा पाये ना।
अवरोध मिले जब राहों में,
नये मार्ग खोजना सीखा।
उसमें जिस सुख को पाया,
उससे पहले पाये ना।
सुख का मीठा बहुत चखा था,
दुःख का स्वाद पता न था।
कभी कसैला खारा खाया,
खट्टा खा मीठे का मीठा पता न था।
बचपन ने हमको सिखलाया,
सीख समझकर आगे बढ़ना।
सुख दुःख में समभाव रहे हम,
सच्चाई का पता न था।
डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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