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कर्म के प्रति समर्पण होना चाहिए,

कर्म के प्रति समर्पण होना चाहिए,

पूजा का महत्व हृदय संजोना चाहिए।
बुद्धि का संतुलन बनाए रखना सदा,
सबके समन्वय से जीवन होना चाहिए।


आस्था विश्वास अपनी जगह है,
कर्म की प्रधानता अपनी जगह है।
कृष्ण ने विराट रूप दिखला बताया,
कर्म से फल प्राप्ति अपनी जगह है।


दिग्भ्रमित अर्जुन समर में खड़ा था,
व्याकुल व्यथित चहूं ओर तक रहा था।
कर्म से भी विचलित जब वह हो गया,
प्रार्थना ही उसके लिए सम्बल बड़ा था।


निराशा के क्षणों में, आतुरता से पुकारता,
क्या करूँ राह दिखाओ, कृष्ण को पुकारता।
हो गया नत मस्तक वह, आराध्य के सामने,
भक्ति समर्पण भाव, व्याकुलता से पुकारता।


तब कृष्ण ने उसे, विराट रूप दिखा दिया,
समर प्रांगण में, सत्य से अवगत करा दिया।
कर्म का सिद्धांत क्या, बुद्धि का प्रयोग कैसे,
आस्था विश्वास पूजा, महत्व भी बता दिया।

डॉ अ कीर्ति वर्द्धन
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