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"स्वतंत्रता : एक अधूरा प्रश्न"

"स्वतंत्रता : एक अधूरा प्रश्न"

पंकज शर्मा
आठ दशक हो गए।
कहा गया—
हम स्वतंत्र हैं।


मैंने चारों ओर देखा—
ध्वज स्वतंत्र था,
आकाश स्वतंत्र था,
पर आदमी
अब भी अपनी छोटी-सी जरूरत के लिए
किसी दरवाज़े पर खड़ा था।




वह भूखा नहीं था—
उसे अनाज मिल रहा था।
वह स्वतंत्र था—
उसे अनाज लेने के लिए
एक व्यवस्था पर निर्भर रहना था।


मैंने सोचा,
भूख से बच जाना
क्या स्वतंत्र हो जाना है?
या भूख से इतना मुक्त होना
कि आदमी अपने श्रम से
अपना अन्न उगा सके?




बच्चा स्कूल गया,
पर शिक्षा नहीं मिली।
युवा पढ़ता रहा,
फिर नौकरी की पंक्ति में
अपना प्रमाणपत्र लिए खड़ा रहा।


बीमार आदमी
अस्पताल पहुँचा,
फिर अपनी बची हुई जमा-पूँजी को
इलाज के सामने
धीरे-धीरे मरते देखता रहा।




कहा गया—
देश आगे बढ़ रहा है।


सड़क चौड़ी हुई,
इमारत ऊँची हुई,
बाज़ार बड़ा हुआ,
आँकड़े चमकने लगे।


मैंने उस आदमी को खोजा
जिसके लिए यह सब था।
वह कहीं दिखाई नहीं दिया—
शायद वह
आँकड़ों में था।




व्यवस्था में
दरवाज़े बहुत हैं।
हर दरवाज़े पर
एक आदमी बैठा है।


काम वही होता है
जो नियम से होना चाहिए,
लेकिन नियम के साथ
कुछ और भी चाहिए।


मैंने पूछा—
यह रिश्वत है?
उत्तर मिला—
इसे सुविधा कहिए।




सत्ता बदलती रही,
कुर्सियाँ बदलती रहीं,
नारे बदलते रहे।


पर आदमी का परिचय
अब भी पूछा जाता है—
तुम्हारे पीछे कौन है?


योग्यता चुप खड़ी रहती है,
संबंध आगे बढ़ जाता है।
और न्याय
फिर किसी अगली तारीख़ पर
मिलता है।




फिर भी हम कहते हैं—
हम स्वतंत्र हैं।


हाँ,
विदेशी शासन नहीं है।
पर क्या स्वतंत्रता
केवल इतनी थी?


क्या नागरिक का
निर्भय होना,
सम्मान से जीना,
अपने श्रम पर खड़ा होना
उसकी स्वतंत्रता में
शामिल नहीं था?




शायद स्वतंत्रता
एक दिन में मिली थी,
पर पूरी नहीं हुई।


वह अभी बन रही है—
हर उस हाथ में
जो कृपा नहीं,
अधिकार माँगता है;
हर उस बच्चे में
जिसे अवसर मिलता है;
हर उस नागरिक में
जो प्रश्न पूछने से नहीं डरता।


जिस दिन
इस देश का सबसे साधारण आदमी
किसी के रहमो-करम पर नहीं,
अपने अधिकार और श्रम पर
खड़ा होगा—


शायद उसी दिन
हम स्वतंत्रता का अर्थ
सचमुच समझेंगे।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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