नाम के लिए
संजय जैनकिसका नाम ऊँचा कर रहे हो
किसको नीचे गिरा रहे हो।
इंसान की नियत का अंदाजा
तुम कैसे लगा रहे हो।।
दुखी मन रखकर तुम कैसे
लोगों को खुशी दे सकते हो।
अपनों को अपनों से कैसे
तुम खेल खिला सकते हो।।
स्वार्थ का खेल जो खेलते है
कुछ दिनों तक फलते फूलते है।
अपने पराये के विश्वास से ही
खुदको स्थापित कर लेते है।।
बाजार का भाव कौन लगता है
कौन बाजार को चलाता है।
आँधियों में बहने वाला क्या
आँधियों को रोक सकता है।।
आज खुलकर हमें खेलना है
अपनी योग्यता को दिखाना है।
अपना नाम इसी से उठाना है
और एक पहचान बनाना है।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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