"उन्नति का पथ"
पंकज शर्माभीतर से उठता
एक मौन प्रश्न—
क्या यह बोध
केवल भूल का
संकेत है,
या बदलने का
पहला साहस?
जब ग्लानि
अँधेरा बनकर
मुझमें उतरती है,
मैं स्वयं ही
अपना न्यायाधीश
बन जाता हूँ।
और चेतना
कटघरे में खड़ी
रह जाती है।
पर आत्मचिंतन
दंड नहीं—
एक धीमा प्रकाश है।
वह दोष नहीं गिनता,
बस दिखाता है
कहाँ से
दिशा बदलनी है।
स्वयं को तोड़ना
क्या कभी
निर्माण हो सकता है?
शायद नहीं।
अपने भीतर उतरना,
टूटे हुए को समझना—
यही पुनः
गठित होने की
पहली शर्त है।
कोई अदृश्य सत्ता
मेरा लेखा रखती है
या नहीं—
मैं नहीं जानता।
पर भीतर का यह
निष्पक्ष मंथन
मुझसे पूछता है—
तुम जो थे,
क्या उससे आगे
बढ़ सकते हो?
इसलिए
स्वयं को दंड मत दो।
स्वीकारो—
जो हुआ, उसे भी;
जो हो सकेगा, उसे भी।
क्योंकि आत्म-परिमार्जन
स्वयं से पलायन नहीं,
स्वयं तक लौटने की
एक कठिन यात्रा है।
और शायद
उन्नति का अर्थ भी यही है—
अपने ही भीतर
एक थोड़ा अधिक
सजग मनुष्य
होते जाना।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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