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बिहार में ईशा फाउंडेशन का बढ़ता विस्तार: जनहित, आध्यात्मिक पर्यटन या सरकारी जमीन की नई नीति?

बिहार में ईशा फाउंडेशन का बढ़ता विस्तार: जनहित, आध्यात्मिक पर्यटन या सरकारी जमीन की नई नीति?

  • 99 वर्ष की लीज से लेकर एक रुपये की टोकन राशि तक-भूमि आवंटन, शवदाह गृह और प्रस्तावित योग केंद्र पर उठते सवाल
लेखक रमेश कुमार एक सामाजिक कार्यकर्ता है |

बिहार में आध्यात्मिकता, योग और धार्मिक पर्यटन के नाम पर बड़े संस्थानों को सरकारी भूमि उपलब्ध कराने की नीति अब चर्चा का विषय बनती जा रही है। इसी क्रम में सद्गुरु जग्गी वासुदेव से जुड़े ईशा फाउंडेशन की बिहार में बढ़ती गतिविधियां और राज्य सरकार के साथ हुए समझौते गंभीर सार्वजनिक विमर्श का विषय हैं।

ईशा फाउंडेशन स्वयं को एक गैर-लाभकारी आध्यात्मिक संगठन के रूप में प्रस्तुत करता है। इसकी स्थापना 1992 में जग्गी वासुदेव ने की थी और इसका मुख्यालय कोयंबटूर, तमिलनाडु में है। संगठन योग, आध्यात्मिकता, पर्यावरण संरक्षण, ग्रामीण विकास, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में विभिन्न कार्यक्रम चलाने का दावा करता है।

लेकिन सवाल यह है कि बिहार में इस संस्था को जिस पैमाने पर सरकारी भूमि और सरकारी परियोजनाओं से जोड़ा जा रहा है, क्या उसके लिए पर्याप्त पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई गई है?

क्या यह केवल आध्यात्मिक और सामाजिक सेवा का विस्तार है, या इसके पीछे सार्वजनिक संपत्ति और सार्वजनिक धन के इस्तेमाल से जुड़ा कोई बड़ा आर्थिक मॉडल भी विकसित हो रहा है?

यही वह प्रश्न है, जिसका जवाब बिहार की जनता को मिलना चाहिए।
ईशा फाउंडेशन आखिर करता क्या है?

ईशा फाउंडेशन का प्रमुख कार्यक्षेत्र योग और आध्यात्मिकता है। संस्था ईशा योग, इनर इंजीनियरिंग, हठ योग, भूतशुद्धि और ध्यान जैसी गतिविधियों का संचालन करती है।

कोयंबटूर स्थित ईशा परिसर इसका प्रमुख केंद्र है, जहां ध्यानलिंग और आदियोगी से जुड़े आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

इसके अलावा संस्था पर्यावरण के क्षेत्र में Project GreenHands, Rally for Rivers और Cauvery Calling जैसे अभियानों से जुड़ी रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और खेल से संबंधित कार्यक्रम भी संस्था द्वारा संचालित किए जाने की जानकारी सामने आती है।

ईशा विद्या के माध्यम से ग्रामीण बच्चों की शिक्षा तथा ईशा ग्रामोत्सवम के माध्यम से ग्रामीण खेल एवं सामुदायिक गतिविधियों का भी संचालन किया जाता है।

महाशिवरात्रि पर कोयंबटूर में होने वाला ईशा का विशाल आयोजन भी देश-दुनिया में चर्चित है।

अर्थात ईशा फाउंडेशन का प्रभाव केवल योग तक सीमित नहीं है। यह आध्यात्मिकता, पर्यावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और बड़े जन-आयोजनों तक फैला हुआ एक व्यापक संस्थागत नेटवर्क है।
सवाल ईशा फाउंडेशन की गतिविधियों पर नहीं, सरकारी संसाधनों पर है

यदि कोई गैर-लाभकारी संस्था अपने संसाधनों से योग, शिक्षा, स्वास्थ्य या पर्यावरण के क्षेत्र में काम करती है तो उसका स्वागत होना चाहिए।

लेकिन लोकतंत्र में असली सवाल तब पैदा होता है जब सरकारी भूमि, सरकारी निवेश और सार्वजनिक संसाधन किसी निजी संस्था अथवा गैर-सरकारी संगठन को दीर्घकालीन लीज पर उपलब्ध कराए जाते हैं।

बिहार में ईशा फाउंडेशन से जुड़े प्रस्तावों को लेकर यही सवाल उठ रहा है।

उपलब्ध विवरण के अनुसार, पिछले लगभग एक वर्ष में बिहार सरकार और ईशा फाउंडेशन के बीच कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं को लेकर समझौते/प्रस्ताव सामने आए हैं।

इनमें सबसे चर्चित है- 
तारापुर में 15.01 एकड़ जमीन का मामला

मुंगेर जिले के तारापुर में लगभग 15.01 एकड़ सरकारी भूमि को 99 वर्ष की लीज पर मात्र एक रुपये की टोकन राशि पर दिए जाने की बात सामने आई है।

बताया गया है कि यहां आधुनिक सांस्कृतिक, धार्मिक एवं पर्यटन केंद्र विकसित किया जाना प्रस्तावित है। इस परियोजना को शिव परिपथ तथा सुल्तानगंज-देवघर कांवर यात्रा मार्ग से जोड़कर पर्यटन की संभावनाओं को बढ़ाने की बात कही जा रही है।

यहां 112 फीट ऊंची आदियोगी प्रतिमा स्थापित करने का प्रस्ताव भी चर्चा में है।

सरकार का तर्क हो सकता है कि इससे पर्यटन, रोजगार, होटल व्यवसाय, परिवहन, स्थानीय हस्तशिल्प और छोटे कारोबार को बढ़ावा मिलेगा।

लेकिन जनता का सवाल भी उतना ही महत्वपूर्ण है-

99 साल की लीज और मात्र एक रुपये की टोकन राशि तय करने के पीछे भूमि का वास्तविक बाजार मूल्य क्या था?

क्या अन्य संस्थाओं को भी इसी प्रकार की सुविधा उपलब्ध है?

क्या इस भूमि के लिए कोई खुली निविदा, प्रतिस्पर्धी प्रक्रिया अथवा सार्वजनिक अभिरुचि आमंत्रित की गई?

और सबसे महत्वपूर्ण—इस निर्णय की आर्थिक एवं प्रशासनिक शर्तें सार्वजनिक क्यों नहीं होनी चाहिए?
छह शहरों में एक रुपये की टोकन राशि पर शवदाह गृह

ईशा फाउंडेशन से जुड़ा दूसरा बड़ा मामला शवदाह गृहों का है।

बताया गया है कि बिहार के छह शहरों में आधुनिक गैस/LPG आधारित शवदाह गृहों के निर्माण एवं संचालन के लिए भूमि दीर्घकालीन लीज पर उपलब्ध कराई गई है।

प्रस्तावित विवरण के अनुसार—

प्रस्तावित विवरण के अनुसार—

स्थान   भूमि      लीज अवधि          टोकन राशि
पटना, दीघा           2.11 एकड़     33 वर्ष₹1
गया           1 एकड़     33 वर्ष₹1
छपरा               1 एकड़     33 वर्ष₹1
सहरसा            1 एकड़    33 वर्ष₹1
भागलपुर             1 एकड़   33 वर्ष₹1
बेगूसराय             1 एकड़     33 वर्ष₹1

अर्थात लगभग सात एकड़ भूमि को आधुनिक शवदाह गृहों के लिए उपलब्ध कराने की बात सामने आती है।

सरकार की दृष्टि से इसका उद्देश्य लकड़ी आधारित दाह संस्कार से होने वाले प्रदूषण को कम करना और आधुनिक, स्वच्छ एवं व्यवस्थित शवदाह व्यवस्था उपलब्ध कराना हो सकता है।

लेकिन यहां भी सवाल यह है-

क्या इतनी बड़ी सार्वजनिक भूमि का उपयोग केवल एक रुपये की टोकन राशि पर करने के निर्णय की पूरी जानकारी बिहार की जनता के सामने रखी गई है?
बांसघाट का ₹90 करोड़ का सवाल

पटना के बांसघाट में अत्याधुनिक शवदाह सुविधा विकसित करने पर लगभग ₹90 करोड़ के सरकारी निवेश की चर्चा है।

यदि यह निवेश सरकारी धन से हुआ है और संचालन किसी बाहरी संस्था को दिया गया है, तो यह जानना जनता का अधिकार है कि—

निर्माण पर कुल कितनी राशि खर्च हुई?


संचालन का अनुबंध किन शर्तों पर दिया गया?


संचालन अवधि कितनी है?


प्रति शव कितना शुल्क निर्धारित है?


अतिरिक्त सेवाओं और सामग्री की कीमत कौन तय करता है?


सरकार को इससे कितनी आय प्राप्त होती है?


संस्था को कितनी राशि मिलती है?


बिजली, गैस, रखरखाव और कर्मचारियों का खर्च कौन वहन करता है?


क्या प्रत्येक वर्ष इसका स्वतंत्र ऑडिट होता है?

यदि प्रति शव शुल्क लिया जाता है, तो उसका पूरा वित्तीय मॉडल भी सार्वजनिक होना चाहिए।

सरकारी निवेश और निजी/गैर-सरकारी संचालन के बीच आर्थिक संबंध जितना स्पष्ट होगा, उतना ही जनता का विश्वास मजबूत होगा।
शवदाह गृह: पारदर्शिता सबसे जरूरी

शवदाह गृह कोई सामान्य व्यावसायिक सुविधा नहीं है। यह नागरिकों की मृत्यु, अंतिम संस्कार और धार्मिक-सामाजिक भावनाओं से जुड़ा अत्यंत संवेदनशील विषय है।

इसलिए यहां पारदर्शिता के सामान्य नियमों से भी अधिक मजबूत व्यवस्था होनी चाहिए।

प्रत्येक शव के संबंध में—

मृत्यु प्रमाणपत्र की पुष्टि,


शव लाने वाले व्यक्ति की पहचान,


परिजनों का विवरण,


शवदाह की तारीख और समय,


शवदाह रसीद,


भुगतान का विवरण,


CCTV रिकॉर्ड,


आवश्यकतानुसार फोटो रिकॉर्ड,


लावारिस शव के मामले में पुलिस एवं प्रशासनिक रिकॉर्ड,

जैसी सूचनाओं का विधिसम्मत रिकॉर्ड सुरक्षित रहना चाहिए।

विशेष रूप से लावारिस शवों के मामले में पहचान और दस्तावेजी प्रक्रिया पूरी तरह डिजिटल एवं ऑडिट योग्य होनी चाहिए।

यह किसी संस्था पर आरोप लगाने का प्रश्न नहीं है। यह सार्वजनिक व्यवस्था में जवाबदेही और सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रश्न है।
बीमा और संपत्ति से जुड़ी आशंकाओं पर भी स्पष्ट व्यवस्था जरूरी

मृत्यु के बाद जीवन बीमा, बैंक खाते, संपत्ति और अन्य कानूनी अधिकारों को लेकर विवाद उत्पन्न होते रहे हैं। ऐसे मामलों में शव की सही पहचान और मृत्यु से जुड़े दस्तावेजों का सुरक्षित रिकॉर्ड अत्यंत महत्वपूर्ण होता है।

इसलिए यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि शवदाह गृह में किसी भी व्यक्ति की पहचान, मृत्यु प्रमाणपत्र और अंतिम संस्कार से संबंधित दस्तावेजों में कोई अनियमितता न हो।

यदि किसी लावारिस शव का अंतिम संस्कार किया जाता है तो उसकी पूरी प्रक्रिया पुलिस एवं स्थानीय प्रशासन की निगरानी में दर्ज होनी चाहिए।

यह सवाल किसी संस्था विशेष के विरुद्ध आरोप नहीं, बल्कि एक मजबूत सार्वजनिक सुरक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है।
अस्थियों और अवशेषों का क्या होता है?

भारतीय परंपरा में अंतिम संस्कार के बाद राख एवं अस्थियों का धार्मिक महत्व है। कई परिवार अंतिम संस्कार की प्रक्रिया में सोना, चांदी अथवा अन्य धातु का उपयोग भी करते हैं।

ऐसी स्थिति में शवदाह के बाद प्राप्त अवशेषों की व्यवस्था को लेकर भी स्पष्ट नियम होने चाहिए।

यदि किसी शवदाह गृह में धातु अथवा अन्य अवशेष प्राप्त होते हैं तो—

वे किसके अधिकार में जाते हैं?

उनका रिकॉर्ड कौन रखता है?

क्या उनका कोई नीलामी अथवा निस्तारण नियम है?

क्या उसकी राशि किसी सरकारी खाते में जमा होती है?

इन सवालों के जवाब सार्वजनिक किए जाने चाहिए।

इसी प्रकार शवदाह के बाद प्राप्त राख या अन्य अवशेषों के किसी व्यावसायिक उपयोग की अनुमति है या नहीं—इस संबंध में भी स्पष्ट नियम और निगरानी व्यवस्था होनी चाहिए।
120 एकड़ का प्रस्तावित योग केंद्र

ईशा फाउंडेशन का बिहार में लगभग 120 एकड़ भूमि पर बड़ा योग एवं आध्यात्मिक केंद्र विकसित करने का प्रस्ताव भी चर्चा में है।

इसमें ध्यान केंद्र, स्वास्थ्य सुविधाएं और 112 फीट की आदियोगी प्रतिमा जैसे प्रस्ताव बताए जा रहे हैं।

यदि सरकार इसके लिए लगभग 100 एकड़ या उससे अधिक भूमि की तलाश कर रही है, तो बिहार के सामने एक व्यापक नीति संबंधी सवाल खड़ा होता है।

बिहार में आज भी बड़ी संख्या में परिवारों के पास आवास के लिए पर्याप्त भूमि नहीं है।

ऐसे में सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि—

सरकारी भूमि के आवंटन में प्राथमिकता का आधार क्या है?

क्या पहले गरीब, भूमिहीन और आवासविहीन परिवारों की आवश्यकता पूरी होगी या बड़े संस्थानों को दीर्घकालीन लीज पर भूमि उपलब्ध कराना प्राथमिकता बनेगा?

सरकार के पास निश्चित रूप से विकास की अपनी नीति हो सकती है, लेकिन उस नीति में सामाजिक न्याय और सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा भी उतनी ही महत्वपूर्ण होनी चाहिए।
सवाल सम्राट चौधरी से ही क्यों?

वर्तमान बिहार सरकार में मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी हैं और तारापुर क्षेत्र से जुड़ी राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियों के कारण इस परियोजना को लेकर राजनीतिक चर्चा स्वाभाविक है।

लेकिन किसी भी परियोजना को केवल राजनीतिक चश्मे से देखना पर्याप्त नहीं होगा।

मुख्यमंत्री और संबंधित विभागों को सार्वजनिक रूप से बताना चाहिए कि—

ईशा फाउंडेशन को भूमि उपलब्ध कराने के लिए कौन-सी नीति लागू की गई?

भूमि का बाजार मूल्य कितना था?

लीज राशि एक रुपये क्यों निर्धारित की गई?

99 वर्ष की लीज का औचित्य क्या है?

क्या कैबिनेट अथवा सक्षम प्राधिकरण से इसकी स्वीकृति ली गई?

क्या अन्य संस्थाओं के लिए भी समान अवसर उपलब्ध कराया गया?

सरकार और संस्था के बीच हुए MOU की पूरी शर्तें क्या हैं?

इन सवालों का जवाब देना किसी संस्था का विरोध नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही है।
सामाजिक संस्था या आर्थिक मॉडल?

ईशा फाउंडेशन स्वयं को गैर-लाभकारी संगठन के रूप में प्रस्तुत करता है। उसके सामाजिक और पर्यावरणीय कार्यों का अपना महत्व है।

लेकिन किसी भी गैर-लाभकारी संस्था के बारे में यह मान लेना कि उसकी हर गतिविधि स्वतः गैर-व्यावसायिक है, उचित नहीं होगा।

जहां कार्यक्रमों के लिए शुल्क लिया जाता है, बड़े आयोजन होते हैं, पेशेवर इवेंट मैनेजमेंट एजेंसियां जुड़ती हैं, कलाकारों को भुगतान होता है और बड़ी मात्रा में आर्थिक लेनदेन होता है, वहां आय-व्यय की पारदर्शिता जरूरी हो जाती है।

बिहार में ईशा फाउंडेशन द्वारा आयोजित कार्यक्रमों के संबंध में भी यह सार्वजनिक होना चाहिए कि—

आयोजन का कुल खर्च कितना हुआ?


प्रतिभागियों से कितना शुल्क लिया गया?


प्रायोजकों से कितनी राशि मिली?


कलाकारों को कितना भुगतान किया गया?


इवेंट मैनेजमेंट पर कितना खर्च हुआ?


प्राप्त राशि का कितना हिस्सा सामाजिक कार्यों में गया?


संबंधित परियोजनाओं का ऑडिट किस संस्था ने किया?

यदि संस्था वास्तव में गैर-लाभकारी मॉडल पर काम कर रही है तो ऐसी पारदर्शिता उसके पक्ष में ही जाएगी।
बिहार में स्थानीय संस्थाओं की क्षमता पर भी विचार हो

एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या बिहार में ऐसी स्वयंसेवी संस्थाएं, धार्मिक ट्रस्ट, सामाजिक संगठन या गैर-लाभकारी कंपनियां नहीं हैं जो सरकारी परियोजनाओं का संचालन कर सकें?

यदि सरकार बड़े प्रोजेक्ट के लिए ईशा फाउंडेशन जैसी बाहरी संस्था को आमंत्रित करती है तो उसके चयन का आधार स्पष्ट होना चाहिए।

क्या कोई Expression of Interest (EOI) जारी हुआ?

क्या प्रतिस्पर्धी चयन हुआ?

क्या तकनीकी एवं वित्तीय क्षमता का मूल्यांकन हुआ?

क्या स्थानीय संस्थाओं को आवेदन का अवसर मिला?

यदि जवाब हां है तो पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक की जानी चाहिए।
हाईकोर्ट के न्यायाधीश की निगरानी में जांच की मांग क्यों?

इन परियोजनाओं को लेकर उठ रहे सवालों का समाधान राजनीतिक बयानबाजी से नहीं हो सकता।

यदि सरकार का दावा है कि सभी आवंटन नियमों के अनुसार हुए हैं, तो स्वतंत्र जांच से स्थिति और साफ हो सकती है।

इसलिए एक स्वतंत्र जांच की मांग उठना स्वाभाविक है, जिसमें किसी सक्षम न्यायिक अधिकारी की निगरानी हो तथा भूमि आवंटन, MOU, वित्तीय लेनदेन, परियोजना चयन, संचालन अनुबंध और सार्वजनिक धन के उपयोग की जांच की जाए।

जांच में धार्मिक-सामाजिक क्षेत्र के प्रतिष्ठित व्यक्तियों, विशेषज्ञों तथा आवश्यकतानुसार विभिन्न राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को परामर्शी भूमिका दी जा सकती है।

लेकिन जांच का उद्देश्य किसी व्यक्ति या संस्था को पहले से दोषी ठहराना नहीं, बल्कि सच को दस्तावेजों के आधार पर सामने लाना होना चाहिए।
असली मुद्दा ईशा फाउंडेशन नहीं, सार्वजनिक संपत्ति है

यहां एक बात स्पष्ट होनी चाहिए।

ईशा फाउंडेशन योग सिखाता है या आध्यात्मिकता का प्रचार करता है—यह उसका अधिकार है।

वह पर्यावरण संरक्षण करता है—यह स्वागतयोग्य है।

वह शिक्षा और स्वास्थ्य में काम करता है—यह भी अच्छी पहल है।

लेकिन सरकारी जमीन और जनता के पैसे का इस्तेमाल होने पर सवाल पूछना हर नागरिक और पत्रकार का अधिकार है।

किसी संस्था की लोकप्रियता उसके लिए सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल की स्वतः पात्रता नहीं बन सकती।

इसी तरह किसी संस्था की आलोचना करने का अर्थ उसके सामाजिक कार्यों को नकारना भी नहीं है।
जनता को चाहिए जवाब, प्रचार नहीं

बिहार में ईशा फाउंडेशन के बढ़ते विस्तार को लेकर सरकार को एक White Paper जारी करना चाहिए, जिसमें निम्नलिखित जानकारी सार्वजनिक हो—

ईशा फाउंडेशन को अब तक कितनी सरकारी जमीन दी गई?


किस जिले में कितनी भूमि दी गई?


भूमि का सर्किल रेट और बाजार मूल्य कितना था?


लीज की अवधि कितनी है?


लीज राशि और अन्य शर्तें क्या हैं?


सभी MOU की प्रतियां सार्वजनिक क्यों न की जाएं?


सरकार ने अब तक कितना पैसा खर्च किया?


संस्था को संचालन से कितनी आय होती है?


सरकार को कितनी राशि प्राप्त होती है?


सभी परियोजनाओं का स्वतंत्र ऑडिट कौन करता है?


शवदाह गृहों में प्रत्येक अंतिम संस्कार का डिजिटल रिकॉर्ड कैसे रखा जाता है?


लावारिस शवों के लिए क्या SOP लागू है?


प्रस्तावित 120 एकड़ योग केंद्र के लिए भूमि चयन की प्रक्रिया क्या है?

यदि इन प्रश्नों का जवाब साफ-साफ मिल जाता है तो विवाद स्वतः समाप्त हो जाएगा।
निष्कर्ष : आध्यात्मिकता का सम्मान, सार्वजनिक संपत्ति की भी रक्षा

बिहार की धरती आध्यात्मिकता, ज्ञान, संस्कृति और लोकतांत्रिक चेतना की धरती है। यहां महावीर, बुद्ध, गुरु गोविंद सिंह और अनेक संतों की परंपरा रही है।

इसलिए बिहार में योग और आध्यात्मिक पर्यटन को बढ़ावा देने की पहल का विरोध केवल विरोध के लिए नहीं होना चाहिए।

लेकिन विकास के नाम पर सरकारी भूमि का दीर्घकालीन हस्तांतरण, एक रुपये की टोकन राशि, करोड़ों रुपये का सरकारी निवेश और निजी/गैर-सरकारी संस्थाओं को संचालन की जिम्मेदारी—इन सभी मामलों में पूर्ण पारदर्शिता आवश्यक है।

सवाल यह नहीं कि ईशा फाउंडेशन अच्छा है या बुरा।

सवाल यह है कि—
क्या बिहार की सार्वजनिक संपत्ति का इस्तेमाल सार्वजनिक हित की सर्वोच्च प्राथमिकता के साथ हो रहा है?
क्या सरकारी जमीन के आवंटन में समान अवसर और पारदर्शिता बरती गई है?
क्या जनता के करोड़ों रुपये के निवेश का पूरा आर्थिक हिसाब जनता के सामने है?

और सबसे बड़ा सवाल-
क्या आध्यात्मिकता और जनसेवा के नाम पर सार्वजनिक संसाधनों के उपयोग के लिए बिहार में एक स्पष्ट, समान और पारदर्शी नीति है?

इन सवालों का उत्तर सरकार को देना ही होगा।

क्योंकि सरकारी जमीन किसी व्यक्ति, दल या संस्था की निजी संपत्ति नहीं होती। वह जनता की संपत्ति है।और जनता की संपत्ति का हिसाब मांगना किसी के खिलाफ अभियान नहीं-लोकतंत्र की बुनियादी जिम्मेदारी है।


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