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“निंदिया न आए”

“निंदिया न आए”

✍️ रचना — डॉ. रवि शंकर मिश्र “राकेश”

*मुखड़ा*
अरे रामा निंदिया न आए सारी रात,
जागल होय भिनसार रे हरि।।
अरे रामा निंदिया न आए सारी रात,
जागल होय भिनसार रे हरि।।


*अंतरा १*
हरे रामा सेजिया सजाई फूलन से रामा,
हरे रामा मोर पिया गए परदेस,
सेजिया सूनी ए हरि।।


अरे रामा निंदिया न आए सारी रात,
जागल होय भिनसार रे हरि।।


*अंतरा २*
हरे रामा दीपक जराई मैं तो अँधियारी रामा,
हरे रामा मोर पिया गए परदेस,
अँखियाँ रोईं ए हरि।।


अरे रामा निंदिया न आए सारी रात,
जागल होय भिनसार रे हरि।।


*अंतरा ३*
हरे रामा चँदवा निकसल अँगना रामा,
हरे रामा मोर पिया गए परदेस,
जिया अकेला होय ए हरि।।


अरे रामा निंदिया न आए सारी रात,
जागल होय भिनसार रे हरि।।


*अंतरा ४*
हरे रामा चले पुरवइया अँचरा उड़ावे रामा,
हरे रामा मोर पिया गए परदेस,
मनवा डोले ए हरि।।


अरे रामा निंदिया न आए सारी रात, जागल होय भिनसार रे हरि।।
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