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"उस पार कौन है"

"उस पार कौन है"

पंकज शर्मा
ऐ मृत्यु, मुझे तो बस अब तेरा इंतज़ार है—
तू आएगी—यह जानता हूँ;
पर यह नहीं जानता
कि आने के बाद
क्या कुछ शेष रहेगा?


मैंने जीवन को छुआ—
तो वह हथेली पर ठहरी हुई
जल की एक काँपती रेखा निकला;
पकड़ना चाहा तो फिसल गया,
छोड़ दिया तो
स्मृति बनकर भीतर उतर गया।


कितने नाम पहनकर
मैं स्वयं को पुकारता रहा—
पुत्र, पिता, मित्र, लेखक, यात्री...
पर उन सभी नामों के पीछे
जो मौन खड़ा था,
क्या वही मेरा होना था?


सामने झील है—
जल में काँपता सूर्य
क्या सचमुच डूब रहा है,
या केवल मेरी दृष्टि का
एक भ्रमित निष्कर्ष है?
यदि दृश्य ही सत्य नहीं,
तो अदृश्य को सत्य कहने का
मेरे पास क्या प्रमाण है?
मृत्यु—क्या तू भी ऐसी ही
किसी अज्ञात सीमा का नाम है,
जहाँ पहुँचकर
‘मैं’ का प्रश्न ही शेष नहीं रहता?


मैंने उत्तर खोजे—
तो प्रश्न और गहरे होते गए;
जिसे सत्य समझा,
वह किसी दूसरी दृष्टि से
केवल संभावना निकला।
शायद जानना ही संभव नहीं,
और अज्ञात को स्वीकार लेना ही
ज्ञान की अंतिम विनम्रता है।


अब तुझसे न जीवन माँगता हूँ,
न मृत्यु से मुक्ति।
जो अज्ञात है, उसे अज्ञात ही रहने दूँगा—
जब आना, निःशब्द आना;
मैं भी उस क्षण
अपने भीतर के अंतिम शोर से
मुक्त होना चाहता हूँ।
न कोई दावा होगा, न कोई निष्कर्ष—
केवल मौन होगा...
और शायद उसी मौन में
पहली बार ज्ञात होगा—
उस पार कौन है।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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