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सावन माह और आत्मलिंगम वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग

सावन माह और आत्मलिंगम वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग

सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारत की सनातन परंपरा मात्र पूजा-पद्धति की एक व्यवस्था नहीं, अपितु मन्वंतर काल से अक्षुण्ण प्रवाहित होती आ रही दार्शनिक, ऐतिहासिक एवं सामाजिक चेतना की अविरल धारा है। इस संस्कृति के केंद्र में भगवान शिव का तत्त्व स्थापित है, जिन्हें 'काल के भी काल' महाकाल और 'कल्याणकारी' माना गया है।
आषाढ़ के अंत के साथ ही जब श्रावण (सावन) मास का आगमन होता है, तो संपूर्ण आर्यावर्त शिवमय हो उठता है। सावन मास का प्रत्येक दिन, विशेषकर इसके सोमवार, प्रकृति और पुरुष के एकात्म भाव, तप, त्याग और लोक-कल्याण के उत्सव के रूप में मनाए जाते हैं। सावन का दूसरा सोमवार इस शृंखला में अत्यंत विशेष माना गया है, क्योंकि यह साधना की पराकाष्ठा, जल-अर्पण की परंपरा और समुद्र मंथन की लोक-कल्याणकारी कथा से सीधा संबंध रखता है।। सावन माह के दूसरे सोमवार की पौराणिक व ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, शैव-शाक्त व नाग संस्कृति के अंतरसंबंध, 12 ज्योतिर्लिंगों एवं उप-ज्योतिर्लिंगों के साम्राज्यिक , नाथ संप्रदाय के योगदान तथा बिहार-झारखंड के प्रमुख शैव तीर्थों (बैद्यनाथ, बासुकीनाथ, और अजगैबीनाथ है।
पौराणिक कालक्रम के अनुसार, सावन माह का सीधा संबंध मन्वंतर कालीन समुद्र मंथन से है। श्रीमद्भागवत पुराण एवं शिव पुराण के अनुसार, जब देवों और असुरों द्वारा क्षीरसागर का मंथन किया जा रहा था, तब चौदह रत्नों से पूर्व अत्यंत दाहक 'हलाहल' नामक विष निकला। इस विष की ज्वाला से तीनों लोक जलने लगे। सृष्टि की रक्षा हेतु भगवान शिव ने बिना किसी संकोच के उस विष का पान कर लिया और उसे अपने कंठ में रोक लिया, जिससे वे 'नीलकंठ' कहलाए। विष के तीव्र ताप से शिवजी के शरीर में उत्पन्न जलन को शांत करने के लिए सभी देवी-देवताओं ने उत्तरवाहिनी नदियों और पवित्र जलाशयों से लाकर उन पर जल अर्पित किया। यह घटना सावन मास में घटी थी। तभी से सावन के प्रत्येक सोमवार, विशेष रूप से द्वितीय सोमवार को, भगवान शिव पर जलाभिषेक और दुग्धाभिषेक करने की सनातन परंपरा का प्रादुर्भाव हुआ।
वैदिक एवं पौराणिक काल से निकलकर जब शिव-उपासना ऐतिहासिक कालखंडों में पहुँची, तो भारत के विभिन्न राजवंशों ने शैव स्थलों को स्थापत्य और संस्कृति के केंद्र के रूप में स्थापित किया।।गुप्त साम्राज्य (4वीं-6ठी शताब्दी ई.): गुप्त काल को हिंदू धर्म के पुनर्जागरण का युग माना जाता है। इस काल में त्रिपुरी, भूमरा, और नचना कुठार में प्रथम बार पत्थर के सुव्यवस्थित शिव मंदिरों का निर्माण हुआ। चोल एवं पल्लव राजवंश: दक्षिण भारत में चोल शासक राजा राज चोल प्रथम ने तंजौर में 'बृहदेश्वर मंदिर' का निर्माण कराकर शैव स्थापत्य को वैश्विक पहचान दी। राष्ट्रकूट साम्राज्य: राजा कृष्ण प्रथम ने एलोरा में एक ही चट्टान को ऊपर से नीचे काटकर विश्व प्रसिद्ध 'कैलाश मंदिर' का निर्माण कराया, जो स्थापत्य कला का अद्भुत चमत्कार है। परमार एवं चंदेल वंश: मालवा के राजा भोज ने धार और भोजपुर में भव्य शिव मंदिरों की नींव रखी, जबकि चंदेल शासकों ने खजुराहो में कंदरिया महादेव का निर्माण कराया। मराठा साम्राज्य एवं अहिल्याबाई होल्कर: 18वीं शताब्दी में जब मध्यकालीन आक्रमणों के कारण भारत के अधिकांश ज्योतिर्लिंग और शिव धाम क्षतिग्रस्त हो चुके थे, तब मालवा की महारानी पुण्यश्लोक अहिल्याबाई होल्कर ने सोमनाथ, काशी विश्वनाथ, ओंकारेश्वर, घृष्णेश्वर और त्र्यंबकेश्वर का पुनरुद्धार करवाकर सनातन संस्कृति को नया जीवन दिया।
. शैव, शाक्त एवं नाग संस्कृति - भारतीय धर्मदर्शन में शैव (शिव के उपासक), शाक्त (शक्ति/देवी की उपासक) और नाग संस्कृति कोई पृथक धाराएं नहीं हैं, बल्कि ये एक ही वैदिक सत्य के विभिन्न आयाम है। शिव 'चेतना' (पुरुष) हैं और शक्ति 'ऊर्जा' (प्रकृति)। बिना शक्ति के शिव 'शव' समान हैं और बिना शिव के शक्ति अनियंत्रित ऊर्जा है। सावन मास में जहाँ सोमवार को भगवान शिव की पूजा होती है, वहीं मंगलवार को देवी पार्वती के निमित्त 'मंगला गौरी व्रत' रखा जाता है। यह परंपरा शैव और शाक्त धारा के अटूट संबंध का प्रत्यक्ष प्रमाण है। 'अर्धनारीश्वर' रूप इसी दार्शनिक सत्य को अभिव्यक्त करता है।
नाग संस्कृति - नाग संस्कृति भारत की प्राचीनतम मूलनिवासी और लोक-संस्कृतियों में से एक रही है। भगवान शिव ने विषधर नागों को अपने गले का हार बनाकर यह संदेश दिया कि जो समाज में उपेक्षित, त्याज्य या विषैले माने जाते हैं, शिव उन्हें भी अपने हृदय से लगाते हैं। सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को 'नागपंचमी' के रूप में मनाना शैव और नाग संस्कृति के ऐतिहासिक समन्वय को दर्शाता है।
भारत की भौगोलिक एवं सांस्कृतिक एकता को एक सूत्र में पिरोने का कार्य 12 ज्योतिर्लिंगों ने किया है। ये ज्योतिर्लिंग केवल धार्मिक केंद्र नहीं हैं, बल्कि विभिन्न ऐतिहासिक साम्राज्यों के राजकीय संरक्षण के गवाह भी रहे हैं।.ज्योतिर्लिंग - सोमनाथगिर सोमनाथ, गुजरातचालुक्य (सोलंकी) राजवंश, अहिल्याबाई होल्कर एवं स्वतंत्र भारत में सरदार पटेल द्वारा पुनरुद्धार। मल्लिकार्जुनश्रीशैलम, आंध्र प्रदेशकाकतीय राजवंश, विजयनगर साम्राज्य (राजा हरिहर एवं बुक्का)।।महाकालेश्वरउज्जैन, मध्य प्रदेशअवंती साम्राज्य, परमार वंश, एवं सिंधिया राजवंश।
ओंकारेश्वर खंडवा, मध्य प्रदेशपरमार राजवंश तथा होल्कर साम्राज्य। केदारनाथरुद्रप्रयाग, उत्तराखंडआदि शंकराचार्य द्वारा पुनरुद्धार, कत्यूरी एवं गढ़वाल राजवंश। भीमाशंकर पुणे, महाराष्ट्र मराठा साम्राज्य (छत्रपति शिवाजी महाराज के पिता शाहजी भोसले व पेशवा काल)। काशी विश्वनाथ वाराणसी, उत्तर प्रदेशगुप्त काल, कल्याणी के चालुक्य, और अहिल्याबाई होल्कर (1777 ई.)। त्र्यंबकेश्वर नासिक, महाराष्ट्रपेशवा बालाजी बाजीराव (नानासाहेब पेशवा) द्वारा निर्मित। वैद्यनाथ देवघर, झारखंडगुप्त काल, गिद्धौर राजवंश (राजा पूरन मल)। नागेश्वर द्वारका, गुजरातस्थानीय सेतबंध राजवंश व गुप्तकालीन प्रभाव। रामेश्वरम रामनाथपुरम, तमिलनाडुचोल, पांड्य साम्राज्य एवं सेटुपति (रामनाड) राजा। घृष्णेश्वर औरंगाबाद (छत्रपति संभाजीनगर), महाराष्ट्रमालोजी राजे भोसले (शिवाजी महाराज के दादा) व अहिल्याबाई होल्कर है।
12 उप-ज्योतिर्लिंग - शिव पुराण (कोटिरुद्र संहिता) के अनुसार, मुख्य ज्योतिर्लिंगों के आभामंडल के अंतर्गत 12 उप-ज्योतिर्लिंगों की भी मान्यता है: अंतकेश (सोमनाथ का उप-ज्योतिर्लिंग) , रुद्रेश्वर (मल्लिकार्जुन का उप-ज्योतिर्लिंग) , दुग्धेश्वर (महाकालेश्वर का उप-ज्योतिर्लिंग) , कर्दमेश्वर (ओंकारेश्वर का उप-ज्योतिर्लिंग) , भूतेश्वर (केदारनाथ का उप-ज्योतिर्लिंग) , भीमेश्वर (भीमाशंकर का उप-ज्योतिर्लिंग) , त्रिलोचन (काशी विश्वनाथ का उप-ज्योतिर्लिंग) , बाणेश्वर (त्र्यंबकेश्वर का उप-ज्योतिर्लिंग) , वक्रेश्वर (वैद्यनाथ का उप-ज्योतिर्लिंग) , भुजंगेश्वर (नागेश्वर का उप-ज्योतिर्लिंग) , गुहेश्वर (रामेश्वरम का उप-ज्योतिर्लिंग) , व्याघ्रेश्वर (घृष्णेश्वर का उप-ज्योतिर्लिंग) है ।
नवनाथ (9 नाथ) एवं नाथ संप्रदाय - हठयोग, तंत्र और शिव-साधना को जन-जन तक पहुँचाने में नाथ संप्रदाय का योगदान ऐतिहासिक रहा है। नाथ परंपरा के आदिगुरु स्वयं भगवान शिव (आदिनाथ) माने जाते हैं।
मत्स्येंद्रनाथ (मछंदरनाथ): नाथ परंपरा के प्रथम मानुषी गुरु। इनका प्रभाव क्षेत्र नेपाल, असम (कामरूप) और दक्षिण भारत रहा। गोरखनाथ (गोरक्षनाथ): संप्रदाय के मुख्य संगठक। इनका केंद्र गोरखपुर (उत्तर प्रदेश), पंजाब, गढ़वाल और नेपाल रहा। गहनीनाथ (गाहणीनाथ): महाराष्ट्र के आलंदी और त्र्यंबकेश्वर क्षेत्र में हठयोग का प्रसार किया। (ये संत ज्ञानेश्वर के दादागुरु थे)। जालंधरनाथ: पंजाब (जालंधर शहर इन्हीं के नाम पर है) एवं हिमाचल प्रदेश। काणिफनाथ: बंगाल, ओडिशा और महाराष्ट्र के सीमावर्ती क्षेत्र। भर्तरीनाथ (राजा भर्तृहरि): उज्जैन (मध्य प्रदेश) एवं अलवर (राजस्थान)। रेवणनाथ: कर्नाटक और दक्षिण महाराष्ट्र क्षेत्र। नागनाथ: महाराष्ट्र (नागनाथ औंढा और मराठवाड़ा क्षेत्र)। चरपटीनाथ: हिमाचल प्रदेश (चंबा) और नेपाल का पर्वतीय क्षेत्रहै ।
नेपाल के मल्ल राजवंश, मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश, मारवाड़ के राठौड़ राजवंश (राजा मानसिंह के समय) और गढ़वाल के शाह शासकों ने नाथ सिद्धों को राजकीय संरक्षण प्रदान किया और अनेक नाथ मठों की स्थापना की।
झारखंड के सिद्ध पीठ: देवघर (बैद्यनाथ) एवं बासुकीनाथ - पूर्वी भारत में संताल परगना का क्षेत्र शैव साधना का सबसे बड़ा केंद्र है। यहाँ बैद्यनाथ धाम और बासुकीनाथ धाम की जोड़ी अद्वितीय है। झारखंड राज्य का देवघर जिला मुख्यालय देवघर में वैद्यनाथ मंदिर के गर्भगृह में रावणेश्वर ज्योतिर्लिंग स्थापित है । इन्हें बाबाधाम , बैजनाथ , बैजूनाथ , बोल बम कहा गया है । बिहार राज्य का भागलपुर जिले के जहांगरा व सुल्तानगंज स्थित उत्तरवाहिनी गंगा में शैव संस्कृति उपासक अजगैबीनाथ नाथ को साक्षी मानकर उत्तरवाहिनी गंगा में स्नान ध्यान एवं जलभर कर सावन कांवर यात्रा 105 किमी पैदल चल कर डाक बंब एवं सामान्य बंब के रूप में झारखंड राज्य का देवघर जिले के बाबा बैद्यनाथ का जलाभिषेक करते है । वैद्यनाथ धाम के बाबा वैद्यनाथ के जलाभिषेक करने के बाद श्रद्धालुओं द्वारा विभिन्न वाहनों के माध्यम से 45 किमी की यात्रा करने के बाद दुमका जिले का का जरमुंडी स्थित बाबा बासुकीनाथ पर उपासक जलाभिषेक कर अपनी मनोकामना पूर्ति करते हैं।
त्रेतायुग व रामायण काल में लंकापति रावण ने कैलाश पर कठोर तपस्या कर भगवान शिव से 'आत्मलिंग' प्राप्त किया। शिवजी ने शर्त रखी कि रास्ते में यदि इसे पृथ्वी पर रखा, तो यह वहीं स्थापित हो जाएगा। देवघर के समीप रावण को विष्णु जी की माया से तीव्र लघुशंका हुई। उसने लिंग 'बैजू' नामक ग्वाले (भगवान विष्णु/वरुण देव के अंश) को थमा दिया। भार अधिक होने पर ग्वाले ने लिंग भूमि पर रख दिया। रावण के अनेक प्रयासों के बाद भी लिंग उखड़ नहीं सका। 'वैद्यनाथ' नामकरण: रावण द्वारा काटे गए अपने दस सिरों का उपचार भगवान शिव ने एक वैद्य की भाँति किया, इसलिए यह 'वैद्यनाथ' कहलाए। स्थानीय संथाल परंपरा में 'बैजू ग्वाला' की भक्ति के कारण इन्हें 'बाबा बैजनाथ' भी कहा जाता है। ऐतिहासिक मंदिर निर्माण (1596 ई.): ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, वर्तमान मुख्य मंदिर के भव्य शिखर और प्रांगण का निर्माण गिद्धौर राजवंश के 5वें राजा राजा पूरन मल द्वारा 1596 ई. में कराया गया था। मंदिर के शीर्ष पर स्थित त्रिपुंड और पंचशूल इसी काल की स्थापत्य कला के प्रतीक हैं।
बाबा बासुकीनाथ धाम जरमुंडी, दुमका जिला, झारखंड (देवघर से लगभग 42 किमी) पर स्थित है ।पौराणिक पृष्ठभूमि: मान्यता है कि समुद्र मंथन में रस्सी बने नागराज वासुकी ने मंथन के पश्चात अपने शरीर के दाह और कष्ट को शांत करने के लिए यहाँ भगवान शिव की आराधना की थी। लोककथा के अनुसार, 'बासु' नाम के एक स्थानीय निर्धन चरवाहे को कंद-मूल खोदते समय एक शिला से रक्त बहता दिखा। उसने उसकी पूजा की, जिससे उस स्थान का नाम 'बासुकीनाथ' पड़ा।।मंदिर की वर्तमान संरचना का निर्माण 16वीं से 18वीं शताब्दी के मध्य स्थानीय जमींदारों एवं मराठा काल के दौरान हुआ।।'दीवानी' और 'फौजदारी' दरबार का सिद्धांत: देवघर (बैद्यनाथ): इसे शिव की 'दीवानी अदालत' माना जाता है, जहाँ भक्त अपनी मनोकामनाओं की अर्जी दाखिल करते हैं। बासुकीनाथ: इसे शिव की 'फौजदारी अदालत' कहा जाता है, जहाँ त्वरित सुनवाई और न्याय की मान्यता है। कांवड़ यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती जब तक भक्त बैद्यनाथ के बाद बासुकीनाथ में जल अर्पित न कर दें।
अजगैबीनाथ धाम (सुलतानगंज) - सावन मास में विश्व की सबसे लंबी पैदल धार्मिक यात्रा (105 किमी) सुलतानगंज से प्रारंभ होती है, जहाँ उत्तरवाहिनी गंगा से जल उठाकर कांवड़िया देवघर की ओर प्रस्थान करते हैं। अजगैबीनाथ मंदिर: स्थापना व निर्माण सुलतानगंज, भागलपुर जिला, बिहार (गंगा नदी के मध्य स्थित प्राकृतिक ग्रेनाइट चट्टान पर)। है। पौराणिक उत्पत्ति: भगवान शिव के 'अजगव' नामक धनुष के नाम पर इस स्थान का नाम 'अजगैबीनाथ' पड़ा। यह महर्षि जाह्नु (Jahnu) की तपोभूमि थी। जब भगीरथ के पीछे आ रही गंगा का वेग महर्षि के आश्रम को बहाने लगा, तो मुनि ने संपूर्ण गंगा का आचमन कर लिया। बाद में भगीरथ की प्रार्थना पर महर्षि ने अपनी जांघ काटकर गंगा को मुक्त किया, जिससे गंगा 'जाह्नवी' कहलाईं। यहाँ गंगा का उत्तर दिशा की ओर मुड़ना (उत्तरवाहिनी) इसे अत्यंत पवित्र बनाता है।
पाल काल (8वीं-12वीं शताब्दी): मंदिर का प्राथमिक ऐतिहासिक ढांचा और चट्टानों पर उकेरी गई मूर्तियाँ पाल राजवंश के समय की हैं। चट्टानों पर गुप्तकालीन शैली की नक्काशी भी दिखाई देती है।
आधुनिक पुनरुद्धार (1885 ई.): वर्तमान मंदिर के मुख्य ढांचे का जीर्णोद्धार 1885 ई. में रानी कलावती और बनैली/गिद्धौर रियासत के सहयोग से कराया गया था। प्राचीन नाम ('जहांगीरा'): सुलतानगंज का प्राचीन पौराणिक और ऐतिहासिक नाम 'जहांगीरा' था। यह शब्द वास्तव में संस्कृत के 'जह्नु-गिरि' (महर्षि जाह्नु का पर्वत) या 'जह्नु-गृह' का अपभ्रंश रूप है। : वैदिक काल में यह महर्षि जाह्नु के आश्रम के रूप में बसा जिसे जहांगरा , जाह्नू नगर कहा गया है । महाभारत काल में यह अंगराज कर्ण के अंग प्रदेश का भाग थ।
('सुलतानगंज'): मुस्लिम सल्तनत काल एवं मुगल काल (16वीं-17वीं सदी) के दौरान व्यापारिक और प्रशासनिक गतिविधियों के कारण 'जहांगीरा' के समीप के बाजारी क्षेत्र का नाम बदलकर 'सुलतानगंज' (सुलतान का बाजार) कर दिया गया, जो कालान्तर में संपूर्ण नगर का नाम बन गया।
सावन माह का दूसरा सोमवार केवल एक व्रत या पूजा का दिन नहीं है, बल्कि यह मन्वंतर काल से चली आ रही भारतीय चेतना, प्रकृति संरक्षण और समाज के अंतिम व्यक्ति तक को शिव-तत्त्व से जोड़ने का प्रतीक है। प्राचीन भारत के राजवंशों (गुप्त, चोल, राष्ट्रकूट, परमार, मराठा) ने मंदिर स्थापत्य के माध्यम से जिस सांस्कृतिक ताने-बाने को बुना था, वह आज भी सुलतानगंज से देवघर और बासुकीनाथ तक की कांवड़ यात्रा में जीवंत दिखाई देता है।।शैव, शाक्त, नाग और नाथ परंपराओं का यह संगम भारत की 'अनेकमेव अद्वैत' (विभिन्नता में एकता) की दार्शनिक भावना को सिद्ध करता है।. संदर्भ - व्यास, वेद. शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता एवं कोटिरुद्र संहिता). गीता प्रेस, गोरखपुर. श्रीमद्भागवत महापुराण (अष्टम स्कंध - समुद्र मंथन प्रसंग). गीता प्रेस, गोरखपुर., पी. सी. रॉय. चौधरी (1965). बिहार जिला गजेटियर: संताल परगना. बिहार सरकार, पटना., डॉ. राजबलि पांडेय . (2018). भारतीय हिंदू संस्कृति और इतिहास. मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली., उपिंदर. सिंह (2008). ए हिस्ट्री ऑफ एंशिएंट एंड अर्ली मेडिवल इंडिया: फ्रॉम द स्टोन एज टू द 12 थ सेंचुरी. पीयर्सन एजुकेशन. , आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी . नाथ संप्रदाय. राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली., झारखंड पर्यटन एवं सांस्कृतिक विकास बोर्ड. देवघर एवं बासुकीनाथ धाम का ऐतिहासिक व पुरातात्विक सर्वेक्षण दस्तावेज.
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