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हर उपमा भी निखर जाती, तुम्हारे नाम के साथ

हर उपमा भी निखर जाती, तुम्हारे नाम के साथ

कुमार महेंद्र
मौन अधरों पर सजी जो,
मधुरिम झंकार हो तुम।
शारदे का वरदहस्त हो,
सुघड़-सा श्रृंगार हो तुम।
चाँदनी की श्वेत आभा,
झिलमिलाते तारों की बारात।
हर उपमा भी निखर जाती,तुम्हारे नाम के साथ।।


शब्द के सारे कोष रीते,
अर्थ भी निःशब्द हैं अब।
तुम बिना रचना किसी कवि की,
सज सकेगी भला कब?
पारिजातों-सी महकती,
भोर की मधुमय सौगात।
हर उपमा भी निखर जाती,तुम्हारे नाम के साथ।।


काव्य की उपमा विवश है,
रूप का वर्णन करे क्या?
सिंधु की उच्छल तरंगें,
नैन-सागर से डरे क्या?
लेखनी भी थम-सी जाती,
छू न पाती रूप-आकाश।
हर उपमा भी निखर जाती,तुम्हारे नाम के साथ।।


सृष्टि के कण-कण में ही,
सौंदर्य का संचार है।
इस धरा पर गूँज रहा,
प्रेम का उद्घोष अपार है।
विश्व की हर एक सुंदरता,
करती तुम पर नाज़।
हर उपमा भी निखर जाती,तुम्हारे नाम के साथ।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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