हर उपमा भी निखर जाती, तुम्हारे नाम के साथ
कुमार महेंद्रमौन अधरों पर सजी जो,
मधुरिम झंकार हो तुम।
शारदे का वरदहस्त हो,
सुघड़-सा श्रृंगार हो तुम।
चाँदनी की श्वेत आभा,
झिलमिलाते तारों की बारात।
हर उपमा भी निखर जाती,तुम्हारे नाम के साथ।।
शब्द के सारे कोष रीते,
अर्थ भी निःशब्द हैं अब।
तुम बिना रचना किसी कवि की,
सज सकेगी भला कब?
पारिजातों-सी महकती,
भोर की मधुमय सौगात।
हर उपमा भी निखर जाती,तुम्हारे नाम के साथ।।
काव्य की उपमा विवश है,
रूप का वर्णन करे क्या?
सिंधु की उच्छल तरंगें,
नैन-सागर से डरे क्या?
लेखनी भी थम-सी जाती,
छू न पाती रूप-आकाश।
हर उपमा भी निखर जाती,तुम्हारे नाम के साथ।।
सृष्टि के कण-कण में ही,
सौंदर्य का संचार है।
इस धरा पर गूँज रहा,
प्रेम का उद्घोष अपार है।
विश्व की हर एक सुंदरता,
करती तुम पर नाज़।
हर उपमा भी निखर जाती,तुम्हारे नाम के साथ।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com
#NEWS,
#hindinews