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“तिरंगे की छाँव”


🌧️ राष्ट्रीय कजरी गान 🌧️

“तिरंगे की छाँव”

रचना - डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
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*मुखड़ा*
हरे रामा लहर-लहर लहराए तिरंगा रामा,
देसवा की आन-बान-शान ए हरि।।
हरे रामा लहर-लहर लहराए तिरंगा रामा,
देसवा की आन-बान-शान ए हरि।।


*अंतरा १*
हरे रामा बरफ गिरत है हिमालय के चोटियन रामा,
हरे रामा पहरा देवत वीर सिपाही भाई रामा,
दुश्मन के काँपे परान ए हरि।।


हरे रामा लहर-लहर लहराए तिरंगा रामा,
देसवा की आन-बान-शान ए हरि।।


*अंतरा २*
हरे रामा खेतन में जागे हमार अन्नदाता रामा,
हरे रामा माटी से सोना उपजावे दिन-राती रामा,
भारत के ईहे त जान ए हरि।।


हरे रामा लहर-लहर लहराए तिरंगा रामा,
देसवा की आन-बान-शान ए हरि।।


*अंतरा ३*
हरे रामा आजु के बिटिया काहू से ना कम हई रामा,
नभ में उड़ावे जहाज, बढ़ावे देश के मान ए हरि।।


हरे रामा लहर-लहर लहराए तिरंगा रामा,
देसवा की आन-बान-शान ए हरि।।


*अंतरा ४*
हरे रामा गंगा-जमुनिया के पावन ई धरती रामा,
हरे रामा मिलजुल के गावे सब कजरी-मल्हार रामा,
गूँजे ईहे पैगाम ए हरि।।


हरे रामा लहर-लहर लहराए तिरंगा रामा,
देसवा की आन-बान-शान ए हरि।।
सबके ईहे अभिमान ए हरि।।जय हिंद!
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