श्रीशिव प्रोक्तं श्रीसूर्य अष्टकम् 

(हिंदी अर्थ सहित)
लेखक आनंद हठिलासूर्यदेव की आराधना को बहुत महत्त्वपूर्ण माना गया है। प्रतिदिन सूर्योदय के समय जल अर्पित करने से सूर्यदेव की कृपा प्राप्ति होती है। रविवार के दिन जो भी व्यक्ति सूर्योदय के समय तांबे के लोटे में रोली मिला हुआ जल सूर्यदेव को चढ़ाता है और सूर्याष्टकम का पाठ करता है, उसके सभी ग्रह दोष खत्म हो जाते हैं और ऐसा होते ही जीवन में समस्त दृष्टियों से पूर्णता प्राप्त होने लगती है।
सूर्यदेव की पूजा के लिए रविवार का दिन श्रेष्ठ रहता है। सूर्य देव की पूजा-अर्चना करने से सभी कष्ट दूर होते हैं। जो व्यक्ति सूर्यदेव की उपासना करता है, उसकी कुंडली में यदि ग्रह दोष है तो वह भी दूर हो जाता है। सूर्यदेव सम्पूर्ण जगत में शक्ति और ऊर्जा के भंडार हैं। उनकी ऊर्जा द्वारा ही सारे संसार के कार्य पूरे होते हैं।
इस स्तोत्र का नित्य पाठ करने से रोगों से मुक्ति मिलती है। कठिन से कठिन असाध्य रोगों में भी जल्दी लाभ होने लगता है।नौकरी का योग बनने लगता है। व्यापार में भी सफलता प्राप्त होती है। मानसिक विकास होता है। सकारात्मक सोच उत्पन्न होती है। व्यक्ति हर समय ऊर्जावान बना रहता है। वह कुसंगति से बचा रहता है। उसकी तामसिक भावना नष्ट हो जाती है।
वस्त्र आसन सफेद तथा दिशा पूर्व हो । नित्य ब्रह्म मुहूर्त अथवा सूर्योदय के समय इसका पाठ करना सर्वश्रेष्ठ है ।
आदिदेव नमस्तुभ्यं प्रसीद मम भास्कर।
दिवाकर नमस्तुभ्यं प्रभाकर नमौऽस्तु ते।।१।।
सप्ताश्वरथमारूढं प्रचण्डं कश्यपात्मजम्।
श्वेतपद्मधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्।।२।।
लोहितं रथमारूढं सर्वलोकपितामहम्।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्।।३।।
त्रैगुण्यं च महाशूरं ब्रह्मविष्णुमहेश्वरम्।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्।।४।।
बृंहितं तेजः पुञ्ज च वायुमाकाशमेव च।
प्रभुं च सर्वलोकानां तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्।।५।।
बन्धूकपुष्पसंकाशं हारकुण्डलभूषितम्।
एकचक्रधरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्।।६।।
तं सूर्यं जगत्कर्तारं महातेजः प्रदीपनम्।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्।।७।।
तं सूर्यं जगतां नाथं ज्ञानविज्ञानमोक्षदम्।
महापापहरं देवं तं सूर्यं प्रणमाम्यहम्।।८।।
।। इति श्रीशिव प्रोक्तं सूर्याष्टकं सम्पूर्णम् ।।
भावार्थ-
हे आदिदेव भास्कर आपको प्रणाम है, आप मुझ पर प्रसन्न हों, हे दिवाकर! आपको नमस्कार है, हे प्रभाकर। आपको प्रणाम है।
सात घोड़ों वालें रथ पर आरूढ़, हाथ में श्वेत कमल धारण किये हुए प्रचण्ड तेजस्वी कश्यप कुमार सूर्य को मैं प्रणाम करता हूँ।
लोहित वर्ण रथारूढ़ सर्वलोक पितामह महापाप हारी सूर्य देव को मैं प्रणाम करता हूँ।
जो त्रिगुणमयी ब्राह्मा, विष्णु और शिव रूप हैं, उन महापाप हारी महान बीर सूर्यदेव को मैं नमस्कार करता हूँ।
जो बड़े हुए तेज के पुंज हैं और वायु तथा आकाश स्वरूप हैं, उन समस्त लोकों के अधिपति सूर्य को मैं प्रणाम करता है।
जो बन्धूक के पुष्प समान रक्तवर्ण और हार तथा कुण्डलों से विभूषित हैं, उन एक चक्रधारी सूर्यदेव को मैं प्रणाम करता हूँ।
महान तेज के प्रकाशक, जगत के कर्ता, महापाप हारी उन सूर्य भगवान को मैं नमस्कार करता हूँ।
उन सूर्यदेव को जो जगत के नायक है, ज्ञान, विज्ञान तथा मोक्ष को भी देते हैं, साथ ही जो बड़े-बड़े पापों को भी हर लेते हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ।
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