मानव सभ्यता के विकासक्रम में मित्रता
सत्येन्द्र कुमार पाठक
मानव चेतना और सभ्यता के उषाकाल से लेकर आज के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तथा मेटावर्स के युग तक, यदि किसी एक भावना ने मनुष्य को एकाकीपन के अंधकार से निकालकर सहअस्तित्व के प्रकाश में रखा है, तो वह 'मित्रता' है। मित्रता केवल दो व्यक्तियों का आपसी जुड़ाव भर नहीं है; यह वह अदृश्य सामाजिक गोंद है जिसने परिवारों, समाजों, संस्कृतियों और राष्ट्रों को एक सूत्र में पिरोकर रखा है। पौराणिक कालखंडों (मन्वंतरों) से लेकर आज के डिजिटल समाज तक, मित्रता का स्वरूप भले ही बदला हो, लेकिन इसकी आत्मा-निःस्वार्थ प्रेम, निष्ठा और संबल—आज भी उतनी ही शाश्वत और जीवंत है।
मित्रता के शाश्वत आदर्श का प्राचीन भारतीय मनीषा और मन्वंतर साहित्य में मित्रता को सर्वोच्च आध्यात्मिक और सामाजिक मूल्यों में गिना गया है। वैदिक ऋचाओं में ईश्वर से प्रार्थना की गई है—"मित्रस्य चक्षुषा समीक्षामहे" अर्थात् हम संसार के समस्त जीवों को मित्र की दृष्टि से देखें। प्राचीन ग्रंथों में मित्रता के जो उदाहरण स्थापित किए गए, वे आज भी प्रासंगिक ह त्रेतायुग में भगवान श्री राम और निषादराज गुह या सुग्रीव की मित्रता यह दर्शाती है कि सच्चा मित्र पद, प्रतिष्ठा, जाति या कुल देखकर नहीं, बल्कि हृदय की पवित्रता देखकर हाथ थामता है।: द्वापर युग में द्वारकाधीश श्रीकृष्ण और दरिद्र ब्राह्मण सुदामा का प्रसंग मित्रता की पराकाष्ठा है। यहाँ वैभव और अभाव के बीच का अंतर तिरोहित हो जाता है। कृष्ण अपने मित्र के चरणों को अश्रुओं से धोकर यह सिद्ध करते हैं कि मित्रता में अहंकार का कोई स्थान नहीं है।परिणाम जानते हुए भी मित्र का साथ न छोड़ना, कर्ण के चरित्र को मित्रता के इतिहास में अजर-अमर बनाता है। समय का चक्र बदला और हम औद्योगिक क्रांति से होते हुए सूचना क्रांति के युग में पहुँचे। आधुनिक जीवन की भागदौड़, भौतिकतावाद और एकल परिवारों के बढ़ते चलन ने मनुष्य को आत्मकेंद्रित बनाया है। ऐसे दौर में मित्रता का अवदान और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है:: आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और मनोविज्ञान यह स्वीकार करते हैं कि एक सच्चा मित्र अवसाद, तनाव और अकेलेपन के खिलाफ सबसे प्रभावी औषधि है।आज की मित्रता केवल साथ बैठने तक सीमित नहीं है, यह विचारों के आदान-प्रदान, पेशेवर मार्गदर्शन और नवाचार का माध्यम भी बन चुकी है। सोशल मीडिया और वर्चुअल प्लेटफॉर्म्स ने मित्रता को सीमाओं से परे कर दिया है। आज भारत में बैठा व्यक्ति महाद्वीप पार किसी अन्य देश के नागरिक से मित्रता कर विचार साझा कर रहा है। हालाँकि, इस युग में 'फॉलोअर्स' और 'असली मित्रों' के बीच का अंतर पहचानना एक नई चुनौती भी बनकर उभरा है।।विश्व में फैली हिंसा, सांस्कृतिक संघर्ष और वैमनस्य के बीच 'मित्रता' के विचार को संस्थागत रूप देने के लिए विश्व मित्रता दिवस की शुरुआत हुई।।ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: पहली बार 1958 में पराग्वे में 'वर्ल्ड फ्रेंडशिप क्रूसेड' द्वारा अंतर्राष्ट्रीय मित्रता दिवस का प्रस्ताव रखा गया था। इसके बाद, संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2011 में आधिकारिक तौर पर 30 जुलाई को 'अंतर्राष्ट्रीय मित्रता दिवस' घोषित किया। भारत सहित कई एशियाई देशों में यह अगस्त के पहले रविवार को पारंपरिक रूप से मनाया जाता है।।वैश्विक शांति एवं सांस्कृतिक सद्भाव: इसका उद्देश्य केवल व्यक्तिगत मित्रों को धन्यवाद देना नहीं, बल्कि भिन्न-भिन्न जातियों, धर्मों, भाषाओं और राष्ट्रों के बीच पुल का निर्माण करना है।: नई पीढ़ी को यह सिखाना कि विविधता को शत्रुता का कारण बनाने के बजाय मित्रता का अवसर बनाया जाए। युद्ध और विवादों से घिरी दुनिया में यह दिवस याद दिलाता है कि बड़े से बड़े वैश्विक संकट का समाधान केवल संवाद और मित्रवत दृष्टिकोण से ही संभव है। मन्वंतर काल के निश्छल सख्य-भाव से शुरू हुई मित्रता की यह यात्रा आज भले ही 'फ्रेंडशिप बैंड' और 'इमोजी' तक पहुँच गई हो, लेकिन संकट के समय हाथ थामने का भाव आज भी वही है। विश्व मित्रता दिवस हमें यह संकल्प लेने का अवसर देता है कि हम तकनीक के इस दौर में आभासी संबंधों से आगे बढ़कर आत्मीय संबंधों को सहेजेंगे। यदि हमें एक बेहतर, शांत और सहिष्णु विश्व का निर्माण करना है, तो हमें मन्वंतर काल की उस भावना को पुनर्जीवित करना होगा जहाँ हर अजनबी में एक मित्र छिपा होता है। सच्चा मित्र बनना और सच्चे मित्र को पहचानना ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।करपी , अरवल , बिहार 804419
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