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विचारों का श्रृंगार, ख़ुद के लिए!

विचारों का श्रृंगार, ख़ुद के लिए!

रचना - डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"

करती रहती हैं श्रृंगार ख़ुद के लिए,
फिर क्यों इतना इकरार ख़ुद के लिए?

आईना भी देखकर मुस्काए अगर,
समझिए कोई है तैयार ख़ुद के लिए!

कपड़े पहनें बार - बार बदलकर नए,
जाएँ सज-धजकर बाज़ार ख़ुद के लिए।

हमने पूछा, इतनी तैयारी किसलिए?
बोलीं अरे! रोज है त्योहार ख़ुद के लिए!

कहती हैं, मैं क्यों मायूस रहूँ,
खुश हूँ मैं हर बार ख़ुद के लिए।

'राकेश' ने कहा, ये बात मान ली पर, 
बचाकर रखिए थोड़ा प्यार ख़ुद के लिए!

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