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वतन के खातिर

वतन के खातिर

रचना -डॉ अनमोल कुमार

वतन के खातिर जिएंगे, 
वतन के खातिर मर जाएंगे,
सीमा पर सीना तान के, 
दुश्मन के दांत खट्टे कर जाएंगे।


तिरंगे की शान में अपनी जान लुटा देंगे,
माँ की मिट्टी के कर्ज को, 
खून से चुका देंगे।


ना डर है मौत से हमें, 
ना पीछे हटने की चाह,
वतन की मिट्टी में ही मिल जाए, 
यही आखिरी पनाह।


"जय हिंद" की गूंज से, 
आसमान भी हिल जाए,
शहीदों की कुर्बानी से, 
ये वतन सदा खिल जाए।
भारत माता की जय!
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