Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

"अज्ञात का आलोक"

"अज्ञात का आलोक"

पंकज शर्मा
किसे खोजता हूँ मैं?


जो मिला,
वह ठहर न सका।
जो नहीं मिला,
वही भीतर
सबसे अधिक उपस्थित है।


दुःख ने
मुझे उत्तर नहीं दिए,
केवल इतना किया—
कि प्रश्नों के वस्त्र
एक-एक कर
उतरते गए।


मैंने देखा,
विपत्ति बाहर नहीं,
पहले भीतर जन्म लेती है।
वहीं से
साहस भी
अपना प्रथम श्वास लेता है।


मैं अपने ही मौन का
पथिक हूँ।
हर शब्द
मुझे लौटाकर
उसी निस्तब्धता में रख देता है,
जहाँ अर्थ
अभी जन्म नहीं लेते।


शायद करुणा
दूसरों तक पहुँचने का नहीं,
स्वयं से लौट आने का मार्ग है।
जो अपने भीतर
कठोर नहीं रहा,
वही जगत को
कोमल दृष्टि दे सका।


मैंने हार को
पराजय नहीं माना।
वह तो
मेरे अहंकार का
धीरे-धीरे
विलीन हो जाना था।


अब मैं
प्रकाश नहीं माँगता।
केवल इतना चाहता हूँ—
कि अँधेरा
मुझसे भयभीत न हो,
और मैं
उससे अपरिचित न रहूँ।


यदि कोई अमृत है,
तो वह
किसी पात्र में नहीं,
स्वीकार की उस नीरवता में है
जहाँ मैं
स्वयं को भी
एक अनसुलझा रहस्य मानकर
मुस्करा सकता हूँ।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️
(शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ