"अज्ञात का आलोक"
पंकज शर्माकिसे खोजता हूँ मैं?
जो मिला,
वह ठहर न सका।
जो नहीं मिला,
वही भीतर
सबसे अधिक उपस्थित है।
दुःख ने
मुझे उत्तर नहीं दिए,
केवल इतना किया—
कि प्रश्नों के वस्त्र
एक-एक कर
उतरते गए।
मैंने देखा,
विपत्ति बाहर नहीं,
पहले भीतर जन्म लेती है।
वहीं से
साहस भी
अपना प्रथम श्वास लेता है।
मैं अपने ही मौन का
पथिक हूँ।
हर शब्द
मुझे लौटाकर
उसी निस्तब्धता में रख देता है,
जहाँ अर्थ
अभी जन्म नहीं लेते।
शायद करुणा
दूसरों तक पहुँचने का नहीं,
स्वयं से लौट आने का मार्ग है।
जो अपने भीतर
कठोर नहीं रहा,
वही जगत को
कोमल दृष्टि दे सका।
मैंने हार को
पराजय नहीं माना।
वह तो
मेरे अहंकार का
धीरे-धीरे
विलीन हो जाना था।
अब मैं
प्रकाश नहीं माँगता।
केवल इतना चाहता हूँ—
कि अँधेरा
मुझसे भयभीत न हो,
और मैं
उससे अपरिचित न रहूँ।
यदि कोई अमृत है,
तो वह
किसी पात्र में नहीं,
स्वीकार की उस नीरवता में है
जहाँ मैं
स्वयं को भी
एक अनसुलझा रहस्य मानकर
मुस्करा सकता हूँ।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️
(शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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