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रुद्राक्ष : शिवाश्रु का पावन प्रसाद

रुद्राक्ष : शिवाश्रु का पावन प्रसाद

कुमार महेंद्र
रुद्र-तपस्या का दिव्य प्रतिफल,
करुणा-कण बन झरे अश्रुधार।
धरा-वक्ष पर जब वे बिखरे,
अंकुरित हुआ रुद्राक्ष अपार।
दिव्य चेतना का साकार बिंब,
भक्ति-पथ का शुभ निनाद।
रुद्राक्ष, शिवाश्रु का पावन प्रसाद।।


सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत,
मन-प्राणों का दिव्य प्रकाश।
विपदा में बन अटल सुरक्षा,
आस्था का अटूट विश्वास।
सत्य, धर्म, करुणा के पथ पर,
जग में जगाए नव विराग।
रुद्राक्ष, शिवाश्रु का पावन प्रसाद।।


आत्मबोध का आलोक-पुंज,
अंतःकरण का निर्मल द्वार।
शिव-स्मरण से पावन होता,
जीवन का प्रत्येक विचार।
कलाई, कंठ, हृदय सुशोभित,
धारण करे, मन पाए आह्लाद।
रुद्राक्ष, शिवाश्रु का पावन प्रसाद।।


सात्त्विक जीवन, शुद्ध आचरण,
विवेक बने सच्ची पहचान।
तज अंधविश्वास, अपनाओ
ज्ञान, संयम और विज्ञान।
एकमुखी से इक्कीसमुखी तक,
महिमा जिसकी रहे अगाध।
रुद्राक्ष, शिवाश्रु का पावन प्रसाद।।


मानवता का मंगल-संदेश,
शिव की असीम कृपा का सार।
अंतरमन में ज्योति जगाकर,
कर दे जीवन सदा उदार।
श्रद्धा, सेवा, साधना, समता—
यही शिव-पथ रहे निर्बाध।
रुद्राक्ष, शिवाश्रु का पावन प्रसाद।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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