पित्र ने इत्र सा हमें मित्र दिया ,
जो जीवित चलचित्र बन गए ।संग में हो गए हम भी चर्चित ,
घृत सा सुगंधित चरित्र हो गए ।।
मित्र होता प्रीत का प्रतीक ,
दो जिस्म और एक जान ।
एक तो होता होमियोपैथ ,
तो दूसरा आयुर्वेद महान ।।
तन से हो जाते हैं वे दूर भी ,
दिल से पास ही वे होते हैं ।
एक को जब लगता है चोट ,
तो दूसरे मित्र खूब रोते हैं ।।
यही होता है सच्ची मित्रता ,
नहीं जिसमें दाग होता है ।
दोनों हृदय से पावन निर्मल ,
कब स्वार्थ का आग होता है ।।
नहीं होता ऊॅंच नीच का भाव ,
न अमीरी गरीबी बनाता दूरी ।
राजा रंक खुल गले हैं मिलते ,
न होता किसी की मजबूरी ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8



0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com
#NEWS,
#hindinews