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पित्र ने इत्र सा हमें मित्र दिया ,

पित्र ने इत्र सा हमें मित्र दिया ,

जो जीवित चलचित्र बन ग‌ए ।
संग में हो ग‌ए हम भी चर्चित ,
घृत सा सुगंधित चरित्र हो ग‌ए ।।
मित्र होता प्रीत का प्रतीक ,
दो जिस्म और एक जान ।
एक तो होता होमियोपैथ ,
तो दूसरा आयुर्वेद महान ।।
तन से हो जाते हैं वे दूर भी ,
दिल से पास ही वे होते हैं ।
एक को जब लगता है चोट ,
तो दूसरे मित्र खूब रोते हैं ।।
यही होता है सच्ची मित्रता ,
नहीं जिसमें दाग होता है ।
दोनों हृदय से पावन निर्मल ,
कब स्वार्थ का आग होता है ।।
नहीं होता ऊॅंच नीच का भाव ,
न अमीरी गरीबी बनाता दूरी ।
राजा रंक खुल गले हैं मिलते ,
न होता किसी की मजबूरी ।।


पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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