माँ लक्ष्मी मंदिर के ऊपर उड़ने वाले पक्षियों का एक झुंड 200 वर्षों से एक ही आकृति बनाता आ रहा है

लेखक आनंद हठिला
कोल्हापुर नहीं, इंदौर के पास एक छोटा सा गाँव है - कमलपुरा। वहाँ एक बहुत पुराना माँ लक्ष्मी का मंदिर है, जो किसी राजा ने नहीं, एक साहूकार की विधवा ने बनवाया था। मंदिर छोटा है, पर बहुत जागृत माना जाता है।
इस मंदिर की सबसे अजीब बात मंदिर नहीं, उसके ऊपर का आसमान है।
पिछले 200 वर्षों से, हर साल, दिवाली के ठीक 7 दिन पहले, शाम को 5:32 बजे, पक्षियों का एक झुंड आता है। लगभग 100-150 पक्षी। वे कोई साधारण पक्षी नहीं, एक खास तरह के तोते और मैना के बीच के पक्षी, जिन्हें गाँव वाले "लक्ष्मी पाखी" कहते हैं।
वे आते हैं और मंदिर के ठीक ऊपर, 10 मिनट तक एक ही आकृति बनाते हैं - एक कमल के फूल की। बिल्कुल वैसा ही कमल जैसा माँ लक्ष्मी के हाथ में होता है। हर साल, बिना चूके, बिना बदले, वही कमल। न एक पंख ज्यादा, न एक पंख कम।
अंग्रेजों ने 1890 में इसे नोट किया था। एक अंग्रेज अफसर, कैप्टन जेम्स, ने अपनी डायरी में लिखा - "There is a flock of birds over Laxmi temple, making a lotus every year, same time, I cannot explain it."
वैज्ञानिक आए, कैमरे लगे, पर कोई समझ नहीं पाया। पक्षी हर साल वही कमल कैसे बनाते हैं? उन्हें कौन सिखाता है?
कहानी 200 साल पुरानी है।
जब यह मंदिर बना था, तब उसे बनाने वाली विधवा, जिसका नाम था लक्ष्मी बाई, बहुत गरीब हो गई थी। मंदिर तो बन गया, पर मूर्ति के लिए पैसे नहीं बचे। मूर्तिकार ने कहा - "बिना सोने के कमल के, लक्ष्मी माँ अधूरी लगेंगी।"
लक्ष्मी बाई रोई। उसके पास सोना नहीं था। उसने अपने आंगन में एक कमल का तालाब बनाया और रोज़ एक कमल तोड़कर माँ के चरणों में रखती - "सोने का कमल नहीं, असली कमल ही सही।"
एक दिन एक भयंकर तूफान आया। तालाब का सारा कमल उजड़ गया। लक्ष्मी बाई टूट गई। वह मंदिर में बैठकर रोने लगी - "माँ, अब तो असली कमल भी नहीं बचा।"
तभी मंदिर की खिड़की से पक्षियों का एक झुंड अंदर आया, उनके मुँह में कमल के बीज थे। उन्होंने बीज तालाब में गिराए और चले गए। लक्ष्मी बाई ने देखा - यह चमत्कार है।
पर कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। लक्ष्मी बाई की मृत्यु के बाद, जब मंदिर बंद होने लगा, तो वे पक्षी हर साल आने लगे। दिवाली से 7 दिन पहले, जैसे लक्ष्मी बाई आती थी, वैसे ही वे आते और मंदिर के ऊपर कमल बनाते - जैसे कह रहे हों - "हम हैं, मंदिर बंद मत करो। तुम्हारी लक्ष्मी बाई का कमल हम बनाएंगे।"
गाँव वालों ने इसे परंपरा मान लिया।
एक साल, 1975 में, गाँव के कुछ लोगों ने मंदिर की जमीन बेचने की सोची। उसी साल दिवाली से 7 दिन पहले पक्षी नहीं आए। पूरा गाँव घबरा गया। शाम 5:32 बजी, आसमान खाली। लोग रोने लगे।
उसी रात गाँव के मुखिया को सपने में लक्ष्मी बाई दिखीं - "मेरा कमल रोकोगे, तो लक्ष्मी रोकेगी।"
अगले दिन सुबह जमीन बेचने का फैसला रद्द हुआ। शाम को 5:32 पर पक्षी वापस आए और इस बार उन्होंने दो कमल बनाए - एक बड़ा, एक छोटा, जैसे माँ और बेटी।
तब से कोई मंदिर की जमीन की तरफ देखता भी नहीं।
आज भी यदि आप कमलपुरा जाएँ, दिवाली से 7 दिन पहले, तो 5:32 पर मंदिर के सामने भीड़ लगी होती है। लोग आसमान देखते हैं। और ठीक 5:32 पर, कहीं दूर से एक आवाज आती है - पक्षियों की। और फिर वे आते हैं और कमल बनाते हैं। बच्चे ताली बजाते हैं।
वैज्ञानिक कहते हैं - यह मैग्नेटिक फील्ड है, यह पक्षियों की याददाश्त है। गाँव वाले कहते हैं - यह लक्ष्मी बाई की अंतिम इच्छा है, जो पक्षियों ने पूरी की।
शास्त्री जी, जो उज्जैन से यहाँ आए थे, उन्होंने कहा - "पक्षी कमल नहीं बनाते, वे तुम्हें याद दिलाते हैं कि असली लक्ष्मी सोने में नहीं, उस कमल में है जो हर साल बिना बोले, बिना पैसे के, सिर्फ प्रेम से बनाया जाता है।"
200 साल से वही आकृति। क्योंकि कुछ प्रेम इतने सच्चे होते हैं कि वे पक्षियों को भी अपना आकार दे देते हैं।
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com
#NEWS,
#hindinews