नये दौर में पिता पूछ रहे
डॉ अ कीर्ति वर्द्धननये दौर में पिता पूछ रहे, लड़की लड़के दोनों से,
शादी किस से तुमको करनी, पूछ रहे हैं दोनों से।
कोई दोस्त तुम्हारा हो, जिससे तुमको प्यार हुआ,
किस धर्म का दोस्त तुम्हारा, नहीं पूछते दोनों से।
मात पिता की पसन्द से शादी, दौर पुराना चला गया,
छोटी उम्र में शादी- गौना, वह दौर पुराना चला गया।
गली गाँव पहचान में शादी, रिश्तों की मर्यादा रहती,
बड़ों के निर्णय में सहमति, दौर पुराना चला गया।
पहले शादी प्यार बाद में, समझौते का भाव साथ में,
सात जन्म का बंधन होता, समर्पण भाव सदा साथ में।
मतभेद भी अक्सर होते, पर मन भेद की जगह नहीं थी,
परिवार हित सर्वोपरि होते, संस्कारों का संरक्षण साथ में।
नये दौर में जाँच परख कर, अब शादी के निर्णय होते,
उम्र बढ़ी अधेड़ हो गये, तब भी कब सही निर्णय होते।
बेहतरीन से बेहतर की चाहत, पेंडुलम से डावाँडोल रहे,
प्यार मोहब्बत भौतिक सुख, अहंकार भरे निर्णय होते।
शादी होती थी मर्यादाओं की, जन्म जन्म के बंधन की,
पारिवारिक संस्कारों- रिश्तों, संस्कृतियों के बंधन की।
रहन- सहन भाषा- बोली, सबको विस्तार मिला करता,
धन प्रतिष्ठा से ज़्यादा, शादी आत्माओं के बंधन की।
मर्यादाओं के शादी बंधन, लोग अधिकतर निभा रहे,
जाँच परख कर प्यार मोहब्बत, गारंटी नहीं टिका रहे।
वर्तमान में रिश्ते नाते, जैसे बिन गारंटी चीनी सामान,
चल गये तो उम्र बिता दें, नहीं कोर्ट कचहरी खिचा रहे।
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