नित्य पूजा की आवश्यकता क्यों?

लेखक: आनन्द हठीला
ऋग्वेद में कहा गया है
ईयुष्टे ये पूर्वतरामपश्यन्व्युच्छन्तीमुषसं मत्यासः।
अस्माभिरू नु प्रतिचक्ष्याभूदो ते यन्ति ये अपरीषु पश्यान् ॥
-ऋग्वेद 1/I13/11
अर्थात् जो मनुष्य उषाकाल से पहले उठकर नित्य कर्म करके ईश्वर की उपासना करते हैं, वे बुद्धिमान और धर्माचरण करने वाले होते हैं, जो स्त्री-पुरुष ईश्वर का ध्यान करके परस्पर प्रीतिपूर्वक बोलते हैं, वे अनेक प्रकार के सुख प्राप्त करते हैं।
परमात्मा की नित्य स्तुति के महत्त्व को भगवान् वेदव्यास ने यूं बताया है।
तमेव चार्चयन् नित्यं भक्त्या पुरुषमव्ययम् ।
ध्यायन् स्तुवन्नमस्यंश्च यजमान स्तमेव च ॥
अनादि निधनं विष्णुं सर्वलोकमहेश्वरम् । लोकाध्यक्षं स्तुवन् नित्यं सर्वदुःखातिगो भवेत् ॥
-महाभारत अनुशासनपर्व 149/5-6
अर्थात् जो मनुष्य उस अविनाशी परम पुरुष का सदा भक्ति पूर्वक पूजन और ध्यान करता है तथा स्तवन और नमस्कार पूर्वक उसी की उपासना करता है, वह साधक उस अनादि, अनंत, सर्वव्यापी, सर्वलोक महेश्वर, अखिलाधिपति परमात्मा की नित्य स्तुति करता हुआ संपूर्ण दुखों से पार हो जाता है।
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति।
तदहं भक्त्युपढतमश्नामि प्रयतात्मनः ॥
-श्रीमद्भगवद्गीता 9/26
अर्थात जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेम से पत्र, पुष्य, फल, जल आदि अर्पण करता है, उस शुद्ध बुद्धि निष्काम प्रेमी भक्त का प्रेमपूर्वक अर्पण किया हुआ वह पत्र- पुष्पादि में सगुणरुप से प्रकट होकर प्रीति पूर्वक खाता हूं।
पद्मपुराण 5/84 में भगवान् के पुष्पों के संबंध में बताया गया है कि अहिंसा प्रथम पुष्प, इंद्रिय निग्रह दूसरा पुष्प, प्राणियों पर दया तीसरा पुष्प, क्षमा चौथा पुष्प, शांति पांचवां पुष्प, मन का निग्रह छठा पुष्प, च्यान सातवां पुष्प, सत्य आठवां पुष्प है। बाहरी गुलाबादि के और भी पुष्प हैं, लेकिन भगवान् तो भीतरी अहिंसा आदि पुष्पों से ही अधिक प्रसन्न होते हैं।
परमपिता परमेश्वर की पूजा-अर्चना करने से मन को शांति मिलती है, जाने-अनजाने हुए पापों से मुक्ति मिलती है, देवत्व का भाव मन में पैदा होता है, आत्मविश्वास बढ़ता है, सद्का्ों में मन लगता है, जीवन को एक नई रोशनी मिलती है, झुकने, समर्पण करने और अहंकार रहित होने की प्रेरणा मिलती है, बुराई से बचने में सहायता मिलती है, चिंता और तनाव से मन मुक्त होकर प्रसन्न रहता है। पर इन सबकी प्राप्ति तभी हो सकती है, जब सच्चे मन, श्रद्धा एवं भावना से पूजा की जाए। जैसे जमीन की गहराई में जाने से बहुमूल्य पदार्थों की प्राप्ति होती है, ठीक वैसे ही अंतर मन में उतरने से देव विभूतियां प्राप्त होती हैं। यूं तो देवी-देवताओं के पूजन की मूल भावना यही है कि जल की तरह निमंलता, विनम्रता, शीतलता, फूल की तरह हंसता-हंसाता जीवन, अक्षत की तरह अटूट निष्ठा, नैवेद्य की तरह मिठास-मधुरता से युक्त व्यक्तित्व, दीपक की तरह स्वयं जलकर दूसरों को प्रकाश देने वाला आचरण अपनाया जाए। भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः ।
-श्रीमद्भगवद्गीता 18/16
अर्थात् अपने अच्छे काम से भगवान की पूजा करके मनुष्य मुक्ति या परम आनंद को पाता है। स्वामी विवेकानंद ने कहा है-'सौंपे गए कार्य को उत्तम तरीके से निर्वाह करना ही परमात्मा की सच्ची पूजा है। एक बार चैतन्य महाप्रभु से पूजा से संतुष्ट एक श्रद्धालु ने पूछा-गुरुदेव! भगवान संपन्न लोगों की पूजा से संतुष्ट नहीं हुए। गोपियों की छाछ और विदुर के शाक उन्हें पसंद आए। लगता है पूजा के पदार्थों से ही उनकी प्रसन्नता का संबंध नहीं है। चैतन्य बोले-'ठीक समझे वत्स! प्रभु के ही बनाए हुए सभी पदार्थ हैं, फिर उसे किस बात की कमी? वास्तव में पूजा तो साधक के भाव जागरण की एक मनोवैज्ञानिक पद्धति है। जो-जो वस्तुएं भगवान् को पूजा के समय चढ़ाई जाती हैं, वे इस बात की प्रतीक हैं कि भगवान् किस प्रकार के भावसंपन्न व्यक्तियों के भावों को अंगीकार करते हैं।〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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