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गाँव की आज़ादी शहर की बंदिस

गाँव की आज़ादी शहर की बंदिस

संजय जैन

देखो देखो लोगों तुम सब
नये युग में प्रवेश कर लिए।
भूल गए अब पुराने युग को
और नये गोरख धंधे कर लिए।
आघुनिकता की चका चोंध में
हम खुदको कैसे ढाल लियें।।


गाँव की अपनी बड़ी-बड़ी
अटरियों वाखर को छोड़कर।
शहर के फ्लेट में अब हम
देखों कैसे आ गये।
समिति जगह में देखो तो
कैसे सब के सब समा गये।
खुली हवा में जीने वालें
प्रदूषण वाले शहर में आ गये।।
आधुनिकता की चका चोंध में
हम खुदको कैसे ढाल लियें।।


घर की सुख शांति भी अब
शोर गुल में समा गई।
घर के चूल्हा चकिया अब
चक्की गैस में समा गये।
चकिया चलाते वक्त गाँव में
महिलाओं के मीठे गीत अब
चक्की डी.जे. में समा गये।
अघुनिकता की चका चोंध में
हम खुदको कैसे ढाल लियें।।


ठंडी हवाओं के वो झोंके
गाँव में कैसे ठंडे लगते थे।
अब तो शहर में देखो तुम
एयरकंडीशर कमरा ठंडा कर रहे।
प्राकृतिक हवाओं का तुम देखो
कृत्रिम हवाओं से मुकाबला कर रहे।
अघुनिकता की चका चोंध में
हम खुदको कैसे ढाल लियें।।


शुध्द खाना पीना मिलता था
इसलिए हटे कटे रहते थे।
सुबह शाम गाय भैस का
शुद्ध दूध जो पीते थें।
पर अब तो तुम खुद देखो
कैसे डिब्बे का दूध पी रहे।
अघुनिकता की चका चोंध में
हम खुदको कैसे ढाल लियें।।


नई-नई बीमारियों के संग
कैसे तुम सब अब जी रहे।
प्राकृतिक वातावरण छोड़कर
कृत्रिम वातावरण में जी रहे।
अपनी खुदकी आज़ादी को
खुद ही गुलामी में ले गये।
आघुनिकता की चका चोंध में
हम खुदको कैसे ढाल लियें।।


जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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