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"विचारों की लपेटे में 'लपेटन'

"विचारों की लपेटे में 'लपेटन'

(बांकीपुर का चुनावी व्यंग्य)
भाग–१ : विचारों का पहला झोंका
— डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
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*"क्यों लपेटन! आजकल इतना विलंब से क्यों आने लगे हो? कुछ बोलते तक नहीं। क्या हो गया है तुम्हें?"*
डेगन की आवाज़ इतनी तेज़ थी कि बरामदे में बैठे दो मरीज भी चौंककर उधर देखने लगे। एक वृद्ध, जो अभी तक अपनी खाँसी दबाए बैठे थे, मुस्कराकर दूसरे से बोले—"लगता है आज कंपाउंडर बाबू की शामत आ गई।"
लपेटन चुपचाप सिर झुकाए सब सुनता रहा।

डेगन फिर बोला—
"अभी कितना समय हो रहा है, घड़ी देखी है? दस बज गए। कुछ ही देर में डॉक्टर साहब आ जाएँगे।
तुम्हारे आने से पहले ही दो-चार मरीज बाहर टहलते रहते हैं। मैं गाँव से आता हूँ। खेती-बाड़ी का काम आरंभ हो गया है। इन दिनों आने में कुछ देर हो जाना स्वाभाविक है। कई बार रास्ते में उपयोगी जड़ी-बूटियाँ दिखाई पड़ जाती हैं। उन्हें पहचानकर तोड़ने, उखाड़ने और संग्रह करने में समय लग जाता है। जिस दिन मैं देर से पहुँचूँ, उस दिन डॉक्टर साहब को स्वयं दवाखाना खोलना पड़ जाता है; जबकि तुम तो यहीं रहते हो। आखिर बात क्या है?
डॉक्टर साहब भी तुम पर कभी गुस्सा नहीं करते, क्योंकि तुम उनके लाडले जो ठहरे!"
लपेटन ने धीरे से कहा—

*"गलती हो गई, भईया..."*
"गलती? यह रोज-रोज की गलती है। पहले तो तुम घड़ी से पहले आ जाते थे, अब घड़ी तुम्हारा इंतज़ार करती है।"
लपेटन ने सिर और झुका लिया। उसके चेहरे पर अपराधबोध कम और किसी गहरे मानसिक बोझ की रेखाएँ अधिक थीं।
उसी समय बाहर बेंच पर बैठे एक मरीज ने कहा—

"लो, डॉक्टर साहब भी आ गए।"
मैंने आते ही दोनों की ओर देखा और मुस्कराते हुए कहा—
"अरे, तुम दोनों अभी तक यहीं खड़े हो? दवाखाने का भीतर वाला कक्ष अभी तक खुला क्यों नहीं? ताला अब भी लटक रहा है।
चलो, पहले साफ-सफाई करो। कई मरीज प्रतीक्षा कर रहे हैं।"

मैं दोनों को भली-भाँति पहचानता था।
डेगन पिछले तीस वर्षों से मेरे साथ था, जबकि लपेटन लगभग आठ वर्षों से। मेरे लिए दोनों केवल दवाखाने के सहायक नहीं, परिवार के सदस्य थे।
मरीज को मेरे चिकित्सा-कक्ष में आने से पहले ही लपेटन उसकी मनःस्थिति का अनुमान लगा लेता था। दवा निकालते समय उसने कभी किसी शीशी, बोतल या जार का स्थान नहीं बदला। फीस लेने में कभी बेईमानी नहीं की। यदि "हबड़ी" किसी अन्य काम में व्यस्त रहने के कारण चाय बनाने में देर कर देती, तो वह स्वयं चाय बना देता और तब तक मरीजों को धैर्यपूर्वक समझाकर बैठाए रखता।
ऐसा लड़का अचानक बदल जाए, यह सहज बात नहीं थी।
कुछ दिनों से उसकी भाव-भंगिमा बदली-बदली-सी दिखाई दे रही थी।

मैंने कुर्सी पर बैठते हुए धीमे स्वर में पूछा—

"सच-सच बताओ, बात क्या है?"
लपेटन ने कोई उत्तर नहीं दिया।
इतने में बाहर से आवाज़ आई—
"कंपाउंडर साहब! पहले मेरा नंबर लगा दीजिए। पता नहीं मुझे क्या हो गया है। एलोपैथ के बड़े-बड़े डॉक्टरों को दिखाया, पर कोई लाभ नहीं हुआ। दर्द दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है।"
वह आगे बोला—
"मैं झारखंड के गढ़वा जिले से आया हूँ। किशोरी बाबू ने आपका पता बताया है। उन्हें भी शायद ऐसी ही कोई बीमारी थी। यहाँ के उपचार से वे बिल्कुल स्वस्थ हो गए।"
देखते-देखते दोपहर के दो बजने को आए। प्रथम पाली का समय समाप्त होने वाला था।
मेरी दृष्टि बार-बार लपेटन पर ही जा टिकती।
वह जैसे किसी और ही संसार में खोया हुआ था।

मैंने आवाज़ दी—
"लपेटन... बाहर कुछ सुना? जल्दी से मरीज को भीतर बैठाओ और उसकी पर्ची बनाओ।"
वह जैसे नींद से जागा।
"जी... जी... डॉक्टर साहब, अभी।"
वह झटपट उठकर बाहर गया और मरीज को भीतर ले आया।
यह झारखंड के गढ़वा जिले से आया हुआ प्रथम पाली का अंतिम मरीज था।
नाड़ी तथा अन्य आवश्यक परीक्षणों के बाद उसे औषधि देकर विदा कर दिया गया। मरीज के जाते ही दवाखाने में कुछ देर के लिए शांति छा गई।
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