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शंभू के इस स्वयं भू पर

शंभू के इस स्वयं भू पर


अरुण दिव्यांश
शंभू के इस स्वयं भू पर ,
हरि रूपी हीरे का हार ले ।
हार ले तू हार मत जाना ,
हरि चरण तू सब वार दे ।।
हरि हीरे का हर हार लिए ,
देख तुम्हें ही बुला रहा है ।
खोए पड़े किस दुनिया में ,
हरि हर को भूला रहा है ।।
हरि हार हर मोड़ मिलते ,
हर हरि हर के ही रूप में ।
तप हरि के तप में जितना ,
उतना ही निखरे अनूप में ।।
हरि हीरा हार का होड़ ये ,
हरि हीरा हार ये हरा नहीं ।
सीता हरण किया रावण ,
हरि हीरा हार ये हरा नहीं ।।
हरि हीरा हार हाॅंड़ी हींड़ा ,
हरि हींड़ते हारा यह हाड़ ।
हरि रूप शाम श्याम मिले ,
जिन मुख निकसा प्यार ।।
शब्दार्थ : हाॅंड़ी = पतीला ( मिट्टी का बर्तन ) , हींड़ा = खोजा , हाड़ = हड्डी ।


पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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