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प्रातः वंदन शुभम शुभ, हो सर्वत्र उजाला

प्रातः वंदन शुभम शुभ, हो सर्वत्र उजाला

कुमार महेंद्र
नई किरण धरती पर उतरी,
ले सुख-संदेश सुहाना।
महक उठा अम्बर का कोना,
पावन हुआ जमाना।
मिट जाए जीवन का तम सब,
टूटे भ्रम का जाला।
प्रातः वंदन शुभम शुभ, हो सर्वत्र उजाला।।


कलियों ने घूँघट खोले हैं,
चिड़ियों ने छेड़ा गान।
शीतल मंद पवन ने जग में,
फूँका नव उत्साह-प्राण।
स्नेह-सुधा से भीग उठे मन,
धुल जाए हर काला।
प्रातः वंदन शुभम शुभ, हो सर्वत्र उजाला।।


कर्म-पथों पर बढ़ें निरंतर,
तजकर आलस-जाल।
मेहनत की स्याही से लिख लें,
स्वर्णिम अपना भाल।
दूर क्षितिज पर दमक रहा है,
भानु-रूप मतवाला।
प्रातः वंदन शुभम शुभ, हो सर्वत्र उजाला।।


नदियाँ कल-कल गान सुनाएँ,
झरनों में संगीत।
प्रकृति सिखाती हर पल हमको,
जीवन का सच्चा मीत।
मन का आँगन निर्मल हो तो,
खुशियों ने घर डाला।
प्रातः वंदन शुभम शुभ, हो सर्वत्र उजाला।।


ज्ञान-दीप की दिव्य प्रभा से,
महके यह संसार।
हर मस्तक पर तिलक विजय का,
बरसे हर्ष अपार।
जीवन बन जाए तब जैसे,
पुष्पों की शुभ माला।
प्रातः वंदन शुभम शुभ, हो सर्वत्र उजाला।।


हर प्राणी के उर में जागे,
ममता, दया, सद्भाव।
मिटें द्वेष के घोर अँधेरे,
महके प्रेमिल अनुराग।
मानवता के पावन पथ पर,
बहे स्नेह की मधुशाला।
प्रातः वंदन शुभम शुभ, हो सर्वत्र उजाला।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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