सिनीवाली, कुहू, राका और अनुमति पुत्रियों की कथा

लेखक: आनन्द हठीला
महर्षि अंगिरा की पत्नी श्रद्धा (जो कर्दम ऋषि और देवहूति की कन्या थीं) के गर्भ से सिनीवाली, कुहू, राका और अनुमति नाम की इन चार अत्यंत दिव्य और अलौकिक कन्याओं का जन्म हुआ था। इनके अलावा उनके दो प्रतापी पुत्र भी थे-उत्थ्य और साक्षात देवगुरु बृहस्पति।
ये चार कन्याएं कोई साधारण स्त्रियां नहीं थीं, बल्कि ये चंद्रमा की कलाओं, तिथियों और विशेष रात्रियों की अधिष्ठात्री देवियां मानी जाती हैं। इनके जन्म के बाद की कहानी ब्रह्मांड की समय-गणना, यज्ञों के नियम और खगोल विज्ञान से गहराई से जुड़ी हुई है।
सिनीवाली👉 सिनीवाली उस रात्रि की अधिष्ठात्री देवी हैं जब अमावस्या तिथि की शुरुआत होती है, यानी जब आकाश में चंद्रमा का बहुत ही बारीक हिस्सा (अंतिम कला) दिखाई देता है।शास्त्रों में इन्हें 'दृश्य-अमावस्या' की देवी कहा गया है। ऋग्वेद के सूक्तों में सिनीवाली देवी की विशेष स्तुति की गई है। इन्हें सुंदर बालों वाली, चौड़े नितम्बों वाली और मातृत्व की रक्षक देवी माना गया है। संतान प्राप्ति के लिए प्राचीन काल में ऋषि-मुनि यज्ञ के समय देवी सिनीवाली का आह्वान करते थे।
कुहू👉 कुहू साक्षात 'घोर अमावस्या' की रात की देवी हैं। जब आकाश में चंद्रमा पूरी तरह से अदृश्य हो जाता है और चारों ओर गहरा सन्नाटा और अंधकार होता है, उस तिथि को 'कुहू' कहा जाता है।तंत्र विज्ञान और गुप्त साधनाओं के लिए देवी कुहू की रात्रि को अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। पितरों के तर्पण और अमावस्या के श्राद्ध कर्मों में देवी कुहू की अनुमति और ऊर्जा बहुत आवश्यक मानी जाती है।
राकां👉 राका साक्षात पूर्णिमा की तिथि और उस चमकीली रात की अधिष्ठात्री देवी हैं। जब चंद्रमा अपनी सभी 16 कलाओं के साथ पूर्ण रूप से आकाश में चमकता है, उस संपूर्ण और सुंदर स्वरूप को 'राका' कहा जाता है।वेदों में इन्हें असीम समृद्धि, धन और आनंद देने वाली देवी माना गया है। पूर्णिमा के दिन जितने भी मंगल कार्य, व्रत या सत्यनारायण कथा जैसे अनुष्ठान होते हैं, वे सब देवी राका के प्रभाव में ही संपन्न माने जाते हैं।
अनुमति👉 अनुमति उस रात्रि या तिथि की देवी हैं जब पूर्णिमा पूरी होने वाली होती है, यानी चतुर्दशी के अंत और पूर्णिमा की शुरुआत की वह संधि-वेला जब चंद्रमा लगभग 99% गोल दिखाई देता है।अनुमति' शब्द का अर्थ ही होता है-आज्ञा या सम्मति देना। देवताओं को यज्ञों में जो आहुति दी जाती है,उसे स्वीकार करने की अनुमति' यही देवी प्रदान करती हैं। सुख,समृद्धि और बुद्धिमत्ता की प्राप्ति के लिए ऋषि-मुनि यज्ञ में इनके नाम से विशेष आहुतियां देते हैं।
इन चारों बहनों के जन्म के बाद,ब्रह्मा जी ने इन्हें आकाश मंडल में समय को बांधने और तिथियों के संचालन का कार्य सौंपा सनातन धर्म में कोई भी यज्ञ या अनुष्ठान तब तक फलित नहीं होता, जब तक वह सही तिथि और सही चंद्रमा की स्थिति में न किया जाए। इन चारों बहनों ने मिलकर मनुष्यों और ऋषियों के लिए दर्श' (अमावस्या का यज्ञ) और 'पूर्णमास' (पूर्णिमा का यज्ञ) की तिथियों को नियमबद्ध किया।
जब चंद्रमा बढ़ता है (शुक्ल पक्ष), तब 'अनुमति' और 'राका' देवताओं को तृप्त करती हैं। जब चंद्रमा घटता है (कृष्ण पक्ष), तब 'सिनीवाली' और 'कुहू' के माध्यम से पितृलोक को ऊर्जा और तृप्ति प्राप्त होती है।
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