सच्चे मन से प्रभु का स्मरण
लेखक: आनन्द हठीला

बहुत समय पहले की बात है। एक वृद्ध महात्मा प्रतिदिन की तरह प्रभात बेला में नदी के किनारे टहल रहे थे। चारों ओर शांति थी। मंद-मंद हवा बह रही थी, पक्षियों का मधुर कलरव वातावरण को पवित्र बना रहा था और नदी का निर्मल जल सूर्य की पहली किरणों से स्वर्णिम दिखाई दे रहा था। तभी महात्मा की दृष्टि नदी के किनारे एक विचित्र दृश्य पर पड़ी। उन्होंने देखा कि एक बड़ा कछुआ धीरे-धीरे नदी से बाहर निकला और किनारे पर आकर शांत होकर बैठ गया। उसी समय झाड़ियों के बीच से एक काला, विषैला बिच्छू बाहर आया। महात्मा ने सोचा कि अब यह बिच्छू कछुए को डंक मार देगा, लेकिन हुआ कुछ और ही। बिच्छू बिना किसी भय के कछुए की पीठ पर चढ़ गया और बिल्कुल शांत बैठ गया।
कुछ क्षण बाद कछुआ फिर से नदी में उतर गया और बिच्छू को अपनी पीठ पर बैठाकर धीरे-धीरे दूसरे किनारे की ओर तैरने लगा। यह अद्भुत दृश्य देखकर महात्मा आश्चर्यचकित रह गए। उनके मन में विचार आया कि प्रकृति का यह कैसा रहस्य है? आखिर एक विषैला बिच्छू और एक शांत स्वभाव का कछुआ साथ-साथ क्यों यात्रा कर रहे हैं? जिज्ञासा इतनी बढ़ गई कि महात्मा भी नदी में उतर गए और तैरते हुए उन दोनों के पीछे-पीछे दूसरे तट पर पहुँच गए।
दूसरे किनारे पर पहुँचते ही बिच्छू तुरंत कछुए की पीठ से उतर गया और तेज़ी से आगे बढ़ने लगा। महात्मा भी दूरी बनाकर उसके पीछे चलने लगे। कुछ दूर जाने पर उन्होंने देखा कि एक विशाल वटवृक्ष के नीचे एक भक्त आँखें बंद किए गहरी साधना में लीन बैठा था। उसके चेहरे पर अद्भुत शांति थी। वह संसार से बिल्कुल अनजान होकर केवल भगवान का नाम जप रहा था। महात्मा घबरा गए। उन्होंने सोचा, "यदि यह बिच्छू इस भक्त को डंक मार देगा तो इसकी साधना यहीं समाप्त हो जाएगी।" उन्होंने तुरंत अपनी लाठी कसकर पकड़ ली और मन ही मन निश्चय किया कि जैसे ही बिच्छू भक्त के पास पहुँचेगा, वह अपनी लाठी से उसे मार देंगे।
लेकिन तभी उनकी नज़र दूसरी दिशा में गई और उनके पैरों तले ज़मीन खिसक गई। झाड़ियों के बीच से एक विशाल, काला और अत्यंत विषैला साँप तेजी से उसी भक्त की ओर बढ़ रहा था। उसकी फुफकार सुनकर महात्मा का हृदय काँप उठा। अब उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि पहले किसे रोकें—बिच्छू को या साँप को। वह कुछ कर पाते, उससे पहले ही भगवान की अद्भुत लीला सामने आ गई।
जैसे ही साँप भक्त के बिल्कुल निकट पहुँचा, उसी क्षण बिच्छू बिजली की गति से आगे बढ़ा और उसने पूरी शक्ति से साँप को डंक मार दिया। विष का प्रभाव इतना तीव्र था कि साँप वहीं तड़पने लगा। कुछ ही क्षणों में उसका शरीर निढाल होकर भूमि पर गिर पड़ा। जिस साँप का डसना निश्चित था, वह स्वयं असहाय होकर पड़ा था और ध्यान में लीन भक्त को इस पूरी घटना का तनिक भी आभास नहीं हुआ। अपना कार्य पूरा करने के बाद बिच्छू शांत भाव से मुड़ा और उसी दिशा में लौट गया, जैसे वह केवल भगवान का आदेश पूरा करने आया हो।
महात्मा स्तब्ध रह गए। उन्होंने अपनी लाठी नीचे कर दी। अब उन्हें समझ में आ चुका था कि जिसे वे मारने जा रहे थे, वही तो भगवान का भेजा हुआ रक्षक था। यदि वे जल्दबाज़ी में बिच्छू को मार देते, तो आज उस भक्त का जीवन बच नहीं पाता। उनकी आँखों से श्रद्धा के आँसू बहने लगे और वे मन ही मन भगवान की अनंत लीला को प्रणाम करने लगे।
कुछ समय बाद जब भक्त की साधना पूर्ण हुई और उसने धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलीं, तब महात्मा ने उसे पूरी घटना विस्तार से सुनाई। उन्होंने बताया कि कैसे भगवान ने पहले कछुए को भेजा, फिर उसी की पीठ पर बिच्छू को बैठाकर नदी पार कराया और ठीक समय पर उसी बिच्छू से विषैले साँप का अंत करवाकर उसकी रक्षा की। यह सब सुनते ही भक्त की आँखें भर आईं। उसने सामने पड़े अचेत साँप को देखा, फिर आकाश की ओर हाथ जोड़ दिए। उसके होंठ काँप रहे थे और आँखों से केवल कृतज्ञता के आँसू बह रहे थे। वह बार-बार कह रहा था, "हे प्रभु! मैं तो आपकी भक्ति में लीन था। मुझे तो यह भी पता नहीं चला कि आपने मेरे लिए कितनी बड़ी रक्षा की।"
तभी उस भक्त के अंतर्मन में एक अत्यंत मधुर और करुणामयी वाणी गूँजी—"वत्स, जब एक अनजान महात्मा तुम्हारी रक्षा के लिए अपनी लाठी उठाने को तैयार हो सकते हैं, तब मैं तो तुम्हारा अपना हूँ। तुम मेरे स्मरण में लीन थे, इसलिए तुम्हारी रक्षा के लिए मेरी लाठी पहले से ही चल चुकी थी। मैंने कछुए को भेजा, मैंने बिच्छू को भेजा और मैंने ही संकट को तुम तक पहुँचने से पहले रोक दिया। जो अपने मन को पूरी श्रद्धा से मुझे समर्पित कर देता है, उसकी रक्षा का भार मैं स्वयं उठा लेता हूँ।"
यह दिव्य वाणी सुनते ही भक्त भाव-विभोर होकर भूमि पर दंडवत लेट गया। महात्मा भी प्रभु की इस अद्भुत लीला को देखकर नतमस्तक हो गए। उस दिन उन्हें अनुभव हो गया कि भगवान की कृपा केवल चमत्कारों में नहीं, बल्कि उन अदृश्य व्यवस्थाओं में भी छिपी होती है जिन्हें मनुष्य अपनी आँखों से देख नहीं पाता। कभी भगवान किसी मनुष्य को माध्यम बनाते हैं, कभी किसी पशु-पक्षी को, कभी किसी छोटी-सी घटना को और कभी ऐसे जीव को भी, जिससे हम केवल भय ही करते हैं। भगवान का हर माध्यम उनके भक्त की रक्षा के लिए ही कार्य करता है।
इसीलिए कहा गया है कि संकट चाहे कितना भी बड़ा क्यों न हो, यदि विश्वास अटल हो तो भगवान की कृपा उससे कहीं अधिक बड़ी होती है। उनकी लाठी दिखाई भले न दे, पर वह हर पल अपने भक्त की रक्षा में लगी रहती है। इसलिए कठिन समय में घबराइए मत, निराश मत होइए, केवल सच्चे मन से प्रभु का स्मरण कीजिए। जब समय आएगा, तब भगवान ऐसे रास्ते बनाएँगे जिनकी कल्पना भी आपका मन नहीं कर सकता। यही इस कथा का सबसे बड़ा संदेश है कि सच्ची श्रद्धा कभी व्यर्थ नहीं जाती और भगवान अपने भक्त को कभी अकेला नहीं छोड़ते।
॥ जय जय श्री राधे ॥ 🙏
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