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"लोकतंत्र के गद्दार"

"लोकतंत्र के गद्दार"

रचना - डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"

लोकतंत्र पर हावी हो रहे, देखो आज गद्दार,
मूक बनी सब सहती जाती, कैसी यह सरकार।
संविधान की शपथ उठाकर, ये जो बैठे आज,
वही कर रहे खुलेआम अब, बहुमत का तिरस्कार।

भारत माँ की शपथ तुम्हें है, मत सहना अत्याचार॥
*अंतरा – १*
अवसरवादी राजनीति का, करते जो व्यापार,
जनहित की हर बात छोड़कर, खोजें सिर्फ़ तकरार।
सत्ता चाहे हाथ न आए, करते फिर भी चीत्कार,
राष्ट्रहित से ऊपर रखते, अपना दल-अधिकार॥

भारत माँ की शपथ तुम्हें है, मत सहना अत्याचार॥
*अंतरा – २*
संसद से लेकर चौपालों तक, शब्द बने हथियार,
मर्यादा की सीमा लाँघें, करते कटु प्रहार।
जनता सब पहचान रही है, कौन सच्चा दिलदार,
वोट पड़ेगा कर्मों पर ही, नारे हैं बेकार॥


भारत माँ की शपथ तुम्हें है, मत सहना अत्याचार॥
*अंतरा – ३*
जब-जब भारत आगे बढ़ता, दिखते चेहरे लाचार,
उन्नति की हर नई कहानी, लगती इनको भार।
विकास की राहें रोकने, रचते नित षड्यंत्र अपार,
फिर कहते हैं लोकतंत्र के, हम ही पहरेदार॥


भारत माँ की शपथ तुम्हें है, मत सहना अत्याचार॥
*अंतरा – ४*
जनता ने जो शक्ति सौंपी, वह जनमत का अख्तियार,
उसका आदर करना सीखो, यही देश का सत्कार।
कुर्सी केवल साधन होती, मत समझो आधार,
सेवा से ही नाम अमर है, नहीं छलों का हार॥


भारत माँ की शपथ तुम्हें है, मत सहना अत्याचार॥
*अंतरा – ५*
टूट न जाए जन-विश्वास, कर लो अभी सुधार,
नफ़रत की खेती छोड़ो अब, बोओ प्रेम अपार।
मतभेदों का हक़ सबको है, रहे विचार-विचार,
किन्तु राष्ट्र सर्वोपरि होगा, यही अमर उद्गार॥


भारत माँ की शपथ तुम्हें है, मत सहना अत्याचार॥
*समापन*
भारत माँ की ओर उठे जो, आँखें - फोड़ने को रहो तैयार',
जन-जन की आवाज़ यही है, सत्य रहे साकार।
लोकतंत्र की पावन धरती, नहीं बने बाज़ार,राष्ट्र प्रथम, 
फिर दल की बातें— यही समय की पुकार॥

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