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"बरखा का प्रेम-संदेश"

"बरखा का प्रेम-संदेश"

पंकज शर्मा
​तप्त धरा की देहरी ऊपर,
आई बरखा की नव चेतना।
मिट्टी की सौंधी खुशबू ने,
हवाओं में घोली वेदना।

​पत्ता-पत्ता झूम उठा है,
शाखें लचकती अमराई में।
हरी चुनरिया ओढ़ प्रकृति,
मुस्काती अपनी तरुणाई में।

​दामिनी के नर्तन से अम्बर,
एक सजीला रूप दिखाता।
प्रियतम की बाहों में सिमटकर,
मन का मयूर हर्षित हो जाता।

​चूड़ी-बिंदिया और हरी चुनर,
सावन का अनुपम रंग सजाती।
भीगी हवा की हर इक सरगम,
हृदय में प्रीति का दीप जलाती।

​निस्वार्थ भाव से बरसती बूंदें,
परमेश्वर की करुणा दर्शातीं।
घटाएं बनकर शिव का संकल्प,
धरा की सदियों की प्यास बुझातीं।

​कण-कण में है उस असीम का वास,
प्रकृति का पावन उत्सव यही सिखाता।
त्याग और नेह की यह अविरल धारा,
आत्मा को उस परमात्मा से मिलाता।

. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ 
 (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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