पत्थरों की कहानी
संजय जैनमैं कागज पर लिखता था
उसे फाड़ता और मिटाता था।
अपनी यादों को फिर मैं
दिल दिमाग में रखता था।
पर समय ने धीरे-धीरे हमारी
असलियत को दिखा दिया।
और मुझे पत्थरों पर लिखना
उसने जो सिखा दिया।।
अब मुझको भी तो देखो
पत्थर सा हो गया हूँ।
अपने लिखने कहने पर
बिल्कुल ही अटल हूँ।
वर्षो तक पत्थर दिलके
साथ जीया और मरा हूँ।
इसलिए पत्थर सा हो गया हूँ
और उससे ही प्यार करता हूँ।।
हम तो नरमी दिखाते रहे
फूल पत्थरों पर चढ़ाते रहे।
पर वो कभी पिघले ही नही
और उम्र भर रुलाते रहे।
देख कठोर स्वभाव को उनके
हम भी पत्थर से हो गये।
जो न हँसता है न रोता है
लग जाने पर दर्द देता है।।
पत्थरों पर लिखा और गुदा
सालों साल अमर रहता है।
जो देश समाज और खुदकी
कहानी स्वयं ही कहता है।
इसलिए तो कठोर दिल इंसान
लम्बें समय तक याद रहता है।
जो अपने युग की गाथाएँ भी
स्वयं ही लोगों से कहता है।।
जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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