भारत और कंबोडिया के शाश्वत सांस्कृतिक संबंध
सत्येन्द्र कुमार पाठक
संस्कृतियों का इतिहास केवल सीमाओं के नक्शों पर नहीं, बल्कि इंसानी दिलों, आस्थाओं और भाषा के ताने-बाने में लिखा जाता है। भारत और कंबोडिया का संबंध भी कुछ ऐसा ही है। यह कोई आधी सदी या एक सदी पुराना कूटनीतिक रिश्ता नहीं है, बल्कि दो हजार वर्षों से भी अधिक प्राचीन एक ऐसा जीवंत सेतु है, जो व्यापार से नहीं बल्कि 'आस्था और अपनत्व' से सिंचा गया है। जब हम विश्व हिंदी दिवस के वैश्विक मंच पर खड़े होकर इस संबंध को देखते हैं, तो इतिहास के पन्नों से एक बेहद आत्मीय तस्वीर उभरती है—मानो भारत यदि शरीर है, तो कंबोडिया उसकी आत्मा। इस सांस्कृतिक महायात्रा की जड़ें भारत के गौरवशाली अतीत 'मगध' से जुड़ी हैं।
बिहार की मगध , वैशाली भूमि, , केवल भौगोलिक स्थान नहीं बल्कि ज्ञान के वैश्विक केंद्र रहे हैं।
मगध की इसी धरती पर नालंदा जैसे विश्वविद्यालय फले-फूले। नालंदा से निकले बौद्ध भिक्षुओं और विद्वानों ने पैदल लंबी यात्राएं करके कंबोडिया की धरती पर ज्ञान, दर्शन और करुणा की गंगा बहाई। "यदि प्राचीन काल में नालंदा भारत का जाज्वल्यमान 'मस्तिष्क' था, तो कंबोडिया का अंकोर उसकी वह 'आँख' बना जिसने उस ज्ञान की रोशनी को पूरी दुनिया में फैलाया।"भारत और कंबोडिया (प्राचीन नाम: कंबुज) का यह संबंध केवल विचारों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह नामों और उपाधियों में भी गहराई से उतरा है। कंबुज की उत्पत्ति: मान्यता है कि कंबोडिया का प्राचीन नाम 'कंबुज' महर्षि कम्बु और अप्सरा मेरा के पावन मिलन से पड़ा। 'वर्मन' उपाधि की समानता: कंबोडिया के महान राजाओं के नामों में 'वर्मन' उपाधि (जैसे—जयवर्मन, सूर्यवर्मन) अनिवार्य रूप से जुड़ती थी। यह 'वर्मा' उपनाम आज भी बिहार और मगध के जनजीवन में रचा-बसा है। यह इस बात का जीवंत प्रमाण है कि हमारे नाम, संस्कृति और ऐतिहासिक रक्त-संबंधों में कितनी अद्भुत समानता है।
कंबोडिया की धरती पर कदम रखते ही भारत के सनातन स्वरूप के दर्शन होते हैं। दुनिया का सबसे बड़ा धार्मिक स्थल 'अंकोरवाट' कंबोडिया की शान है। सनातनी प्रतीक: भगवान विष्णु को समर्पित यह विशाल मंदिर भारत से बाहर सनातन संस्कृति का सबसे बड़ा ध्वजवाहक है।।पत्थरों पर उत्कीर्ण इतिहास: इस भव्य मंदिर की दीवारों पर रामायण और महाभारत के दृश्यों को पत्थरों पर इतनी जीवंतता से उकेरा गया है कि देखकर आँखें सजल हो उठती हैं।।रामकेर्ति का मंचन: आज भी कंबोडियाई समाज में 'रामकेर्ति' (कंबोडियाई रामायण) का मंचन वहां की सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा है। यह दर्शाता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम राम की चेतना भारत के साथ-साथ कंबोडिया के कण-कण में भी वास करती है।
सांस्कृतिक आदान-प्रदान का सबसे सशक्त माध्यम भाषा होती है। कंबोडिया की आधिकारिक भाषा 'खमेर' और उसकी लिपि का विकास भारत की ब्राह्मी लिपि से हुआ है। संस्कृत शब्दों का प्रभाव में आज भी खमेर भाषा में धर्म, कर्म, पूजा, मंदिर, गुरु जैसे हजारों संस्कृत शब्द अपने मूल या थोड़े बदले हुए रूप में रोज़मर्रा की बोलचाल में उपयोग किए जाते हैं। थेरवाद बौद्ध धर्म का : 12वीं सदी के आसपास कंबोडिया ने भारत से गए 'थेरवाद बौद्ध धर्म' को अंगीकार किया। आज कंबोडियाई समाज जिस अहिंसा, शील और करुणा के मार्ग पर चलता है, वह भगवान बुद्ध द्वारा मगध की धरती से दिया गया वही अमर संदेश है। हिंदी का सेतु और भविष्य की राह का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में जब हम 'विश्व हिंदी दिवस' मनाते हैं, तो हिंदी केवल एक भाषा नहीं रह जाती, बल्कि वह एक वैश्विक सेतु बन जाती है। यह एक ऐसा सेतु है जो वाराणसी की पतितपावनी गंगा को कंबोडिया की विशाल मेकांग नदी से जोड़ता है और गोस्वामी तुलसीदास जी की चौपाइयों को कंबोडिया की 'रामकेर्ति' से मिलाता है।आज भारत सरकार और भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण कंबोडिया के अंकोरवाट और अन्य प्राचीन मंदिरों के जीर्णोद्धार और संरक्षण में कंधे से कंधा मिलाकर काम कर रहे हैं। यह इस बात का प्रतीक है कि हम अपनी साझी विरासत और पूर्वजों के वैभव को मिलकर सहेज रहे हैं। मगध की धरती से निकला जो ज्ञान कभी अंकोर की दीवारों पर मुस्कराया था, आज समय की मांग है कि हम साहित्य, भाषा और आपसी प्रेम के माध्यम से उस सांस्कृतिक रिश्ते को इक्कीसवीं सदी में और अधिक सुदृढ़ और प्रगाढ़ बनाएं।
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