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माँ कामाख्या की यात्रा : गुप्त नवरात्रि में शक्ति, साधना और श्रद्धा का अद्भुत अनुभव

माँ कामाख्या की यात्रा : गुप्त नवरात्रि में शक्ति, साधना और श्रद्धा का अद्भुत अनुभव

-डॉ. राकेश दत्त मिश्र

भारतीय सनातन संस्कृति में तीर्थयात्रा केवल किसी पवित्र स्थान तक पहुँचने का नाम नहीं है, बल्कि यह आत्मा की यात्रा, श्रद्धा की परीक्षा और ईश्वर के प्रति समर्पण का माध्यम भी है। जब यात्रा माँ आदिशक्ति के परम पावन शक्तिपीठ माँ कामाख्या धाम की हो, वह भी गुप्त नवरात्रि के पावन अवसर पर, तब उसका आध्यात्मिक महत्व अनेक गुना बढ़ जाता है। यह यात्रा हमारे लिए केवल दर्शन का अवसर नहीं रही, बल्कि श्रद्धा, धैर्य, साधना और आत्मचिंतन का एक अविस्मरणीय अनुभव बन गई।

दिनांक 13 जुलाई को मैं (डॉ. राकेश दत्त मिश्र) अपने बड़े भैया श्री सच्चिदानन्द मिश्र एवं प्रेमसागर पाण्डेय, मामा श्री शैलेन्द्र मिश्र, मामी श्रीमती किरण मिश्र, मित्र श्री राजीव कुमार झा के साथ पटना से कैपिटल एक्सप्रेस द्वारा माँ कामाख्या के दर्शन के लिए प्रस्थान किया। पूरी यात्रा के दौरान मन में माता के दर्शन की उत्सुकता और गुप्त नवरात्रि में माँ की विशेष कृपा प्राप्त करने की भावना बनी रही।

लगभग चौबीस घंटे की यात्रा के पश्चात 14 जुलाई की रात्रि लगभग 11:30 बजे हम कामाख्या पहुँचे। रात काफी हो चुकी थी और गुप्त नवरात्रि के कारण लाखों श्रद्धालु वहाँ पहले से ही उपस्थित थे। होटल ढूँढ़ना अत्यंत कठिन कार्य सिद्ध हो रहा था। काफी प्रयास और खोजबीन के बाद एक छोटा-सा होटल मिला, जहाँ हमने अपना सामान रखा और रात्रि विश्राम किया। उसी समय यह अनुभव हो गया कि गुप्त नवरात्रि में माँ कामाख्या की यात्रा सामान्य दिनों की अपेक्षा कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होती है।

गुप्त नवरात्रि का आध्यात्मिक महत्व

भारतीय सनातन परंपरा में वर्ष भर चार नवरात्रियाँ आती हैं। चैत्र और शारदीय नवरात्रि सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं, जिन्हें देशभर में बड़े उत्साह और सार्वजनिक रूप से मनाया जाता है। इसके अतिरिक्त माघ और आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक मनाई जाने वाली नवरात्रियों को गुप्त नवरात्रि कहा जाता है।

'गुप्त' अर्थात गोपनीय, आंतरिक और एकांत में की जाने वाली साधना। यही कारण है कि इन नवरात्रियों का विशेष महत्व उन साधकों के लिए माना जाता है जो आत्मिक उन्नति, शक्ति-साधना, तंत्र, मंत्र, योग और ध्यान के माध्यम से ईश्वर की अनुभूति प्राप्त करना चाहते हैं।

जहाँ चैत्र और शारदीय नवरात्रि में विशाल पंडाल, सार्वजनिक पूजा और उत्सव का वातावरण रहता है, वहीं गुप्त नवरात्रि की साधना व्यक्तिगत और अत्यंत अनुशासित मानी जाती है। साधक अपने गुरु के मार्गदर्शन में मंत्र-जप, ध्यान, हवन और विशेष अनुष्ठान करते हैं।

गुप्त नवरात्रि का सबसे अधिक महत्व शाक्त एवं तांत्रिक परंपरा में है। इस अवधि में विशेष रूप से दशमहाविद्याओं की उपासना की जाती है-

1. महाकाली

2. तारा

3. षोडशी (त्रिपुरसुंदरी)

4. भुवनेश्वरी

5. भैरवी

6. छिन्नमस्ता

7. धूमावती

8. बगलामुखी

9. मातंगी

10. कमला

मान्यता है कि इन महाविद्याओं की आराधना साधक को आत्मबल, विवेक, आध्यात्मिक शक्ति तथा अंतर्मन की शुद्धि प्रदान करती है।

असम के गुवाहाटी स्थित माँ कामाख्या शक्तिपीठ को शाक्त एवं तांत्रिक साधना का सर्वोच्च केंद्र माना जाता है। गुप्त नवरात्रि के दौरान यहाँ देश-विदेश से हजारों साधक, संत, तांत्रिक एवं श्रद्धालु पहुँचते हैं। सम्पूर्ण नीलांचल पर्वत मानो साधना, मंत्रोच्चार और आध्यात्मिक ऊर्जा से आलोकित हो उठता है।

दर्शन की तैयारी और लंबी प्रतीक्षा

15 जुलाई की सुबह हम माता के दर्शन के उद्देश्य से मंदिर पहुँचे। वहाँ जाकर जानकारी मिली कि गर्भगृह में दर्शन हेतु पहले पर्ची (टोकन) लेना अनिवार्य है। हमें बताया गया कि पर्ची प्राप्त करने के लिए शाम चार बजे से ही लाइन लगानी पड़ती है तथा रात्रि बारह बजे के बाद काउंटर खुलता है।

मैं और मेरे मित्र राजीव कुमार झा ने निर्णय लिया कि चाहे जितनी प्रतीक्षा करनी पड़े, पर्ची लेकर ही लौटेंगे। शाम को जब हम लाइन में पहुँचे तो संयोगवश ट्रेन के सहयात्री कुणाल से भी पुनः भेंट हो गई। हम सभी एक साथ पर्ची के लिए कतार में लग गए।

पर्ची मिलने से पूर्व हमने माँ के विभिन्न स्वरूपों के दर्शन किए। माँ काली, बगलामुखी, छिन्नमस्ता तथा तारा के मंदिरों में दर्शन कर मन अत्यंत प्रसन्न हो उठा। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो सम्पूर्ण नीलांचल पर्वत माँ की दिव्य शक्तियों से स्पंदित हो रहा हो।

रात्रि लगभग 12:30 बजे हमें दर्शन की पर्ची प्राप्त हुई।

सात घंटे की तपस्या के बाद माँ के दर्शन


16 जुलाई की प्रातः लगभग 6 बजे हम पुनः दर्शन के लिए निर्धारित कतार में पहुँच गए। यहाँ एक ऐसा अनुभव भी हुआ जिसने मन को विचलित किया। श्रद्धालुओं की अत्यधिक संख्या के कारण व्यवस्था काफी अव्यवस्थित प्रतीत हुई। दर्शनार्थियों को लोहे के संकरे बैरिकेडों में लंबे समय तक रोके रखा जाता था। लगभग सात घंटे तक हम उसी कतार में खड़े रहे।

यद्यपि यह प्रतीक्षा कठिन थी, परंतु मन में केवल एक ही भावना थी-"जब माँ बुलाती हैं, तब धैर्य भी साधना बन जाता है।"

प्रतीक्षा के दौरान हमने मंदिर परिसर में होने वाली पशु-बलि की परंपरा भी देखी। श्रद्धालुओं की आस्था के अनुसार पशुओं की बलि देकर उनके मस्तक माँ भगवती को अर्पित किए जाते हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है और शक्तिपीठ की धार्मिक परंपराओं का एक अंग मानी जाती है।

लगभग सात घंटे की प्रतीक्षा के बाद अंततः वह क्षण आया, जिसकी प्रतीक्षा में हम इतने दूर से आए थे। माँ कामाख्या के गर्भगृह में प्रवेश करते ही मन स्वतः भाव-विभोर हो उठा। शब्द मौन हो गए और केवल श्रद्धा शेष रह गई। माँ के श्रीचरणों में शीश झुकाकर जीवन, परिवार और समाज की मंगलकामना की तथा उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की।

गर्भगृह से बाहर निकलते समय हमने उन पशुओं के मस्तक भी देखे जिन्हें बलि स्वरूप अर्पित किया गया था। उन्हें देखकर मन में एक अद्भुत अनुभूति हुई। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो उनमें अभी भी जीवन का स्पंदन विद्यमान हो। यह दृश्य हमारी आस्था और आश्चर्य दोनों का विषय बना। इसे हमने माँ की दिव्य लीला के रूप में अनुभव किया।
तांत्रिक साधना का दुर्लभ दृश्य

रात्रि में माँ की भव्य आरती का दर्शन अत्यंत मनोहारी था। दीपों की ज्योति, शंखध्वनि, घंटों का निनाद और मंत्रोच्चार पूरे वातावरण को अलौकिक बना रहे थे। वहीं दूसरी ओर अनेक तांत्रिक एवं साधक एकांत स्थानों पर अपनी विशेष साधनाओं में लीन थे। गुप्त नवरात्रि के कारण सम्पूर्ण कामाख्या धाम का वातावरण साधना और आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत दिखाई दे रहा था।

इसी यात्रा के दौरान हमें निग्राचार्य, माँ रेणुका तथा अनेक संत-महात्माओं के दर्शन और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का भी सौभाग्य मिला। विशेष रूप से माँ रेणुका के दर्शन करते समय ऐसा अनुभव हुआ मानो स्वयं माँ भगवती साक्षात् हमारे सम्मुख विराजमान हों। उनके तेजस्वी व्यक्तित्व और वात्सल्यपूर्ण आशीर्वाद ने हमारे मन पर अमिट छाप छोड़ दी।
साधना अगले २४ जुलाई तक चलने वाली है अब यात्रा से ज्यादा साधना पर जोड़ देना है इस वास्ते बड़े भैया श्री  प्रेमसागर पाण्डेय माँ कामख्या के चरणों में साधना में लीन है |

यात्रा से मिली सीख

हर तीर्थयात्रा केवल दर्शन नहीं कराती, बल्कि जीवन का कोई न कोई महत्वपूर्ण संदेश भी देती है। माँ कामाख्या की इस यात्रा ने हमें धैर्य, अनुशासन, श्रद्धा और आत्मसमर्पण का महत्व सिखाया।

एक व्यावहारिक अनुभव भी हमें प्राप्त हुआ, जिसे हम सभी श्रद्धालुओं के साथ साझा करना चाहते हैं। आज अधिकांश प्रमुख मंदिरों में दर्शन हेतु ऑनलाइन बुकिंग की व्यवस्था उपलब्ध है। यदि श्रद्धालु पहले से ऑनलाइन दर्शन-पंजीकरण करा लें, तो अनावश्यक कठिनाइयों, लंबी प्रतीक्षा और असुविधा से काफी हद तक बचा जा सकता है। इसलिए भविष्य में किसी भी प्रमुख तीर्थ की यात्रा पर जाने से पूर्व दर्शन की ऑनलाइन व्यवस्था की जानकारी अवश्य प्राप्त कर लें।
गुप्त नवरात्रि हमें यह शिक्षा देती है कि वास्तविक साधना बाहरी प्रदर्शन में नहीं, बल्कि मन की एकाग्रता, संयम और ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण में निहित है। आज का मनुष्य बाहरी उपलब्धियों की दौड़ में अपने भीतर झाँकना भूलता जा रहा है। गुप्त नवरात्रि हमें आत्मचिंतन, आत्मसंयम और आध्यात्मिक संतुलन की ओर लौटने की प्रेरणा देती है।

माँ कामाख्या की यह यात्रा हमारे जीवन की एक अविस्मरणीय आध्यात्मिक धरोहर बन गई। माँ के चरणों में यही प्रार्थना है कि वे हम सभी पर अपनी कृपा बनाए रखें, हमें सद्बुद्धि, साहस, करुणा और धर्म के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करें।

॥ या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

-डॉ. राकेश दत्त मिश्र
संपादक, दिव्य रश्मि
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